Saturday, January 22, 2022

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यूपी के राजनीतिक घटनाक्रम के दूरगामी संकेत

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सिर्फ़ 6 दिन में प्रदेश की राजनीति में हवा का रुख कैसे मोड़ा जा सकता है उसका ताजा उदाहरण अभी उत्तर प्रदेश में देखने को मिल रहा है।

उत्तर प्रदेश समेत 5 राज्यों में चुनाव की घोषणा हुई तब तक प्रदेश का राजनीतिक माहौल पूरी तरह भाजपा के पक्ष में था, लेकिन अब ऐसा नहीं है। सब से पहले जायजा लेते हैं 8 जनवरी से पहले के उत्तरप्रदेश के राजनीतिक चित्र का!

भाजपा: प्रधानमंत्री मोदी ने 16 नवंबर से लेकर 2 जनवरी तक पिछले डेढ़ महीने के दौरान यूपी के हर इलाके में रैली की है। पूर्वांचल से लेकर पश्चिमी उत्तरप्रदेश तक मोदी की ताबड़तोड़ 14 चुनावी रैलियां आयोजित की गईं। उनकी आखिरी रैली लखनऊ में 9 जनवरी को प्रस्तावित थी। बताया जा रहा था कि इस रैली के बाद ही चुनाव आयोग इलेक्शन की तारीखों का ऐलान करेगा लेकिन कोरोना की थर्ड वेव की तेजी के बहाने इस रैली को कैंसिल करा दिया गया,  नतीजतन चुनाव आयोग ने भी 10 जनवरी के बजाए 8 जनवरी को ही इलेक्शन की तारीखें घोषित कर दीं। इसे संयोग कहेंगे या कुछ और, मोदी ने जिस मेरठ में आखिरी सभा की थी, वहीं से मतदान की शुरुआत होगी! उत्तर प्रदेश के 11 जिले मेरठ, अलीगढ़, आगरा, मथुरा, शामली, मुजफ्फरनगर, बागपत, गाजियाबाद, गौतम बुद्ध नगर, हापुड़, और बुलंदशहर में पहले चरण में 10 फरवरी को चुनाव होना है। मोदी ने अपनी आखिरी रैली इन्हीं में से एक मेरठ में की थी। मेरठ के इर्द-गिर्द बागपत, मुजफ्फरनगर, गाजियाबाद, हापुड़, बुलंदशहर, शामली और गौतम बुद्ध नगर आते हैं, जो मेरठ से सीधे-सीधे प्रभावित होते हैं। ये इलाका किसान वोटर्स का गढ़ है, जिन्हें भाजपा से नाराज बताया जा रहा है। ऐसे में साफ है कि मोदी की आखिरी रैली इन्हीं वोटर्स को मनाने के लिए थी। अब वहीं से चुनाव आयोग ने चुनाव की शुरुआत कर दी है।

कांग्रेस: प्रियंका गांधी राज्य में पिछले एक साल से सक्रिय हैं। उनकी भी कई बड़ी रैली हुईं। वह “लड़की हूं, लड़ सकती हूं” कैंपेन को ड्राइव कर रही हैं। इसके साथ प्रतिज्ञा यात्रा भी निकाल चुकी हैं। लेकिन कुछ समय पहले उन्होंने अपनी यात्रा को कोरोना के चलते कैंसिल कर दिया था। वहीं, राहुल गांधी ने यूपी में जरूर अमेठी और रायबरेली मे प्रियंका गांधी के साथ किए। वैसे प्रियंका ने पूरे यूपी को लगभग कवर कर लिया है।

सपा: अखिलेश यादव दो महीने से राज्य में विजय रथ यात्रा निकाल रहे थे। यात्रा की आखिरी सभा उन्होंने 28 दिसंबर को उन्नाव में की थी। विजय यात्रा के दौरान उन्होंने 25 से ज्यादा सभाएं भी कीं। राज्य के हर इलाके को तकरीबन कवर किया है। उन्होंने सभा की जगह रोड शो किए और इनमें अच्छी खासी तादाद में भीड़ जुटी। इस तरह से अखिलेश एक बार फिर यूपी में विपक्षी राजनीति के केंद्र में आ गए। यह बात अलग है कि उनके अलावा सपा के पास राज्य में दूसरा कोई बड़ा चेहरा नहीं है।

बसपा: बसपा सुप्रीमो मायावती सबसे कम सक्रिय रहीं। उन्होंने अब तक महज एक रैली और तीन बैठकें की हैं। इसके अलावा 5 बार प्रेस कॉन्फ्रेस की हैं। इस बार चुनावी मैदान में उनकी सक्रियता को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। खुद मायावती ने स्पष्ट किया है कि वो इस बार चुनाव नहीं लड़ेंगी।

2017 का चुनाव: 2017 में भी यूपी में 7 चरणों में विधानसभा चुनाव हुए थे। कुल 27 दिनों में चुनाव समाप्त हुए थे लेकिन इस बार 25 दिनों में चुनाव खत्म होंगे। पिछला चुनाव नोटबंदी के साए में हुआ था। प्रदेश की मुख्य राजनीतिक पार्टियां सपा, बसपा और कांग्रेस को कैश ऑन हैंड का प्रॉब्लम था। जब कि भाजपा के कई कार्यकर्ताओं के नाम नगदी जब्ती के मामले चर्चा में रहते थे। चुनाव की घोषणा होते ही अखिलेश, शिवपाल, मुलायम के नाम चर्चा में आ गए थे। शाम होते ही टीवी चैनलों के स्टूडियो में चाचा भतीजे के क्लेश को लेकर चर्चाएं होती थीं। पहले चरण के मतदान तक सपा पर किस का आधिपत्य है ये साफ हो नहीं पाया था। उधर एक सोची समझी रणनीति के अनुसार योगी आदित्यनाथ ने भाजपा के खिलाफ ही 27 उम्मीदवार उतारे थे। अभी की तरह 2017 में भी बसपा के खेमे में रहस्यमय चुप्पी थी। जब नतीजे आए तब भाजपा ने सदन में दो तिहाई बहुमत प्राप्त कर लिया था। आज भी आप 2017 के चुनावी नतीजे उठाकर देखिए।

तीसरे नंबर के वोट दूसरे नंबर के उम्मीदवार के हिस्से में जोड़ दीजिए, फिर नतीजे देखेंगे तो आप को पता चलेगा कि पिछले चुनाव में सपा, बसपा और कांग्रेस, तीनों महागठबंधन कर के चुनाव में उतरे होते तो भाजपा को 300 से ज्यादा नहीं बल्कि 78 सीट ही मिल पाती। नोटबंदी का भरपूर राजनीतिक प्रयोग और खुद के ही मुख्यमंत्री चेहरे को भाजपा के खिलाफ इस्तेमाल करने का प्रयोग सफल रहा था। लेकिन ऐसा पहले गुजरात में हो चुका है। 2012 के गुजरात विधानसभा चुनाव में भाजपा के भूतपूर्व मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल ने भाजपा के खिलाफ खुद की गुजरात परिवर्तन पार्टी बनाकर उम्मीदवार उतारे थे। उसका लाभ ये हुआ था कि तत्कालीन मुख्यमंत्री मोदी और भाजपा से नाराज मतदाताओं ने कांग्रेस के बजाय केशुभाई का रुख किया था। भाजपा विरोधी वोट कांग्रेस को न मिलकर, केशुभाई के पाले में आए थे, नतीजतन मोदी 2012 का गुजरात चुनाव बड़ी आसानी से जीत गए थे।

8 जनवरी के बाद उत्तरप्रदेश की राजनीति में भूचाल आ गया जब एक के बाद एक, योगी मंत्रिमंडल से इस्तीफे गिरना शुरू हुए और करीब 22 विधायक भाजपा छोड़कर समाजवादी पार्टी के पाले में जा बैठे। ये स्थिति कभी भी भाजपा के संदर्भ में सामान्य नहीं थी। एक तरफ योगी जब दिल्ली में अमित शाह, नरेंद्र मोदी और भाजपा के आला कमान के साथ बैठकें कर रहे थे तब हर घंटे में लखनऊ से ब्रेक होती हर खबर सपा के कार्यकर्ताओं में उत्साह की लहर दौड़ा देती थी तो दूसरी ओर देशभर के भाजपा खेमों में चिंता पैदा करती थी। हर कोई ये सोच रहा था कि आखिर उत्तरप्रदेश भाजपा में ये हो क्या रहा हैं?

8 जनवरी से 14 जनवरी तक के सारे घटनाक्रम पर एक नजर डालें और इन घटना क्रम में विविध नेताओं की बयानबाजी और राजनीतिक विश्लेषकों और मीडिया कर्मियों की बोली देखें तो समझ में आता है कि ये सब कुछ जो हुआ है वो यकायक या अन प्लान्ड नहीं है। सारे घटनाक्रम में ये साफ होता है कि विपक्ष को अंधेरे में रखकर अपनी राजनीतिक बिसात को जमाया जा रहा है और इस के पीछे एक तीर से कई शिकार करने की योजना है।  

सब से पहले तो ये समझ लीजिए कि मोदी और अमित शाह उत्तर प्रदेश का चुनाव जीतना नहीं चाहते। अमित शाह के होते हुए भाजपा का कोई विधायक दल बदल ले ये बात हजम नहीं होती। तो फिर वो क्या बात है जिसके चलते भाजपा के चाणक्य माने जाने वाले अमित शाह अब तक उप्र में डैमेज कंट्रोल नहीं कर रहे हैं?

दरअसल मामला 2024 के लोकसभा चुनाव का है। 2024 में मोदी 73 साल के हो जाएंगे, अमित शाह की उम्र 60 साल की हो जाएगी, जब कि योगी 52 साल के होंगे। उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री के तौर पर उन्हें चुनाव जिता दिया जाता है तो, भगवा पोशाक, मोदी की तरह पत्नी त्यागी नहीं बल्कि सम्पूर्ण ब्रह्मचारी, राजनीति के संदर्भ में युवा नेता, ये सारे लक्षण योगी को 2024 के प्रधानमंत्री पद तक ले जा सकते हैं।

ऐसे में 2024 में अमित शाह को वो भूमिका मिल सकती है जो 2014 से लाल कृष्ण आडवाणी को दी गई है। यानि मोदी युग के अस्त के बाद योगी की केंद्रीय राजनीति में अमित शाह के लिए उपयुक्त राजनीतिक जमीन बचाए रखना काफी हद तक असंभव सा लगता है। इस लिए योगी के रूप में मोदी के राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी लेकिन सही मायने में अमित शाह के प्रतिद्वंद्वी योगी को परास्त करना जरूरी है। और ये काम मोदी शाह, समाजवादी पार्टी से करवा रहे हैं। कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा जो सीट जीत नहीं सकती उस सीट पर भाजपा अपने नेता सपा में भेजकर उन्हें सपा से जितवा देगी और जब सरकार बनाने का वक्त आएगा तब ये नेता फिर से भाजपा में आ जाएंगे।

पहली नजर में ये तार्किक लगता है, लेकिन अगर ऐसा हुआ तो मोदी शाह का प्लान चौपट हो जायेगा, क्योंकि आज भी भाजपा के पास मुख्यमंत्री का इकलौता चेहरा सिर्फ योगी का है, जबकि मूल समस्या 2024 के प्रधानमंत्री चेहरे की है। 2024 का चुनाव जीतने के बाद कुछ समय तक प्रधानमंत्री पद संभालने के बाद मोदी स्वास्थ्य का कारण रखकर पीएमओ में अमित शाह को स्थापित करना पसंद करेंगे। ऐसे में 2024 तक योगी को अनिवार्य राजनीतिक अवकाश में रखना मूल उद्देश्य होना चाहिए।

तो कुल मिलाकर मेरा ये आकलन है कि उत्तरप्रदेश की नई सरकार अखिलेश की होगी उस में कोई दो राय नहीं। लेकिन अखिलेश अकेले खुद के दम पर सरकार बना लें ऐसा भी नहीं होगा। अखिलेश सरकार में रालोद, और कांग्रेस की भूमिका भी होगी। समाजवादी पार्टी में भी एक बड़ा गुट भाजपा त्यागियों का भी होगा। ये गुट हमेशा की तरह मोदी शाह का वफादार रहेगा ये भी तय है। भाजपा से कितने भी मंत्री वॉक आउट कर जाएं, या सपा बसपा और कांग्रेस कितनी भी ताकत दिखा दे, उत्तर प्रदेश में भाजपा को दो अंको में सीमित करना नामुमकिन है।

2022 में सपा, रालोद, और कांग्रेस मिलकर सरकार तो बना लेंगे। लेकिन लोकसभा चुनाव में भाजपा को 80 में से 65 सीट लेने से रोक नही पाएंगे। अभी जो मंत्री और विधायक भाजपा छोड़कर सपा में आ रहे हैं उन्हें पीछे से भाजपा का भी सपोर्ट रहेगा। अमित शाह और मोदी के आशीर्वाद से ये लोग सपा का इस्तेमाल कर के फिर से विधायक और मंत्री भी बन जाएंगे, लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में यही लोग अपने अपने क्षेत्र में भाजपा के उम्मीदवारों के पक्ष में काम करेंगे, और केंद्र में फिर से मोदी सरकार लाने में मदद करेंगे।

अप्रैल 2022 से मई 2024 तक अखिलेश को अपनी सरकार बचाने के लिए तरह-तरह के समझौतों से गुजरना पड़ेगा, उन का ध्यान पार्टी से ज्यादा सरकार पर होगा, ऐसे में मई 2024 के बाद वन फाइन मॉर्निंग, रालोद किसी न किसी बहाने सरकार से अलग हो जाएगी। विधानसभा भंग होने की संभावना खड़ी होगी तब आज जो लोग भाजपा से सपा में आए हैं वो मध्यावधि चुनाव टालने के बहाने फिर से भाजपा में जुड़ जाएंगे। वो खुद तो घर वापसी कर लेंगे, साथ में कई सपाइयों को भी अपने साथ लेते जाएंगे। अगर शाह मोदी की यही रणनीति है तो 2025 में देश के नए प्रधानमंत्री के रूप में अमित शाह होंगे और ढाई साल सत्ता सुख भोगकर, अखिलेश फिर से सैफई लौट जाएंगे।

(सलीम हाफेजी स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

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