क्या अरब तीसरी स्प्रिंग की तरफ जा रहा है?

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संयुक्त अरब अमीरात और इजराइल की नई डील के बाद अरब की राजनीति में बहुत विशेष बदलाव होने जा रहे हैं। अमेरिका की पहल के बाद अरब के दूसरे सबसे प्रमुख देश संयुक्त अरब अमीरात ने इजराइल के साथ संबंधों को नॉर्मलाईजेशन की तरफ बढ़ाया है जिसकी अरब जगत को कतई उम्मीद नहीं थी।

इस डील के तहत संयुक्त अरब अमीरात ने इजराइल को यरूशलम के अगले कटान यानी एनेक्सेशन से रोका है लेकिन अब तक जिन क्षेत्रों पर इजराइल ने कब्जा कर लिया है वहां क्या स्थिति रहेगी यह मांग यूएई की तरफ से स्पष्ट नहीं है। यूएई को इसके बदले इजराइली प्रभाव क्षेत्र वाले रक्षा और आर्थिक क्षेत्रों में पहुंच मिलेगी जबकि इजराइल इस क्षेत्र में व्यापार और रक्षा के क्षेत्र में सहयोग बढ़ा सकेगा, लेकिन बात इतनी आसान नहीं है। 

दरअसल नेतनयाहू पिछले कई संसदीय चुनाव में स्पष्ट बहुमत हासिल करने में नाकाम रहे हैं और उनके परिवार पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों के चलते वह काफी दबाव में हैं। आम तौर पर नेतनयाहू का जो सबसे बड़ा समर्थक वर्ग घोर दक्षिणपंथी यहूदी है, वह भी उनसे नाराज है। इसके बदले वह कुछ करके दिखाना चाहते हैं। दूसरी तरफ अमेरिका में भी चुनाव है और डोनाल्ड ट्रम्प की स्थिति कोरोनावायरस के बाद आर्थिक मंदी के बाद डांवाडोल है। उन्हें इजराइल समर्थित यहूदियों के वोट भी चाहिए जो अमेरिका की दूसरी सबसे बड़ी जनसंख्या है, जो सिर्फ इस बात से प्रभावित होती है कि अमेरिका इजराइल का कितना साथ दे रहा है। 

ट्रम्प और नेतनयाहू की राजनीति अपनी जगह सही है परंतु संयुक्त अरब अमीरात को इसके बदले क्या मिलेगा? फिलिस्तीन में इस डील के विरोध में प्रदर्शन शुरू हो गए हैं और ईरान एवं तुर्की ने इसकी कटु आलोचना की है। अरब में एक प्रमुख व्यापारिक देश संयुक्त अरब अमीरात अब तक न्यूट्रल या फिलिस्तीन के पक्ष में नजर आ रहा था लेकिन इस कदम के साथ वह इजराइली अमेरिकी सऊदी कैंप का एक घोषित सदस्य उभर कर सामने आया है जिसका सीधा मुकाबला ईरान नेतृत्व वाले गुट से है जिसमें ईरान, तुर्की, सीरिया, लेबनान, क़तर और काफी हद तक रूस भी है। आने वाले दिन अरब के लिए काफी हलचल भरे हो सकते हैं। 

जानकारों का मानना है कि यह तीसरी अरब स्प्रिंग की शुरुआत की वजह भी बन सकता है क्योंकि सऊदी अरब के बाद संयुक्त अरब अमीरात ने जिस तरह इजराइल के प्रति सहयोगात्मक रवैया अपनाया है वहां की जनता को अंदर खाने पसंद नहीं है। यह देखना होगा कि अरब के बाकी देशों की जनता क्या रुख अपनाती है इसी से तय होगा की बहार आएगी या खिजां?

(लेखक कूटनीतिक मामलों के जानकार हैं।)

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