Thursday, December 2, 2021

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क्या बसपा अब राजनीतिक रूप से संदिग्ध हो गई है?

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कुछ दिनों पहले उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री और बसपा सुप्रीमो मायावती जी ने दो बड़ी घोषणाएं कीं। पहली ये कि उनकी पार्टी यूपी का चुनाव अपने बल पर लड़ेगी। दूसरी कि जिला पंचायत प्रमुखों के चुनाव में वह अपने उम्मीदवार नहीं देगी। यह घोषणा उन्होंने जिला पंचायत प्रमुखों के चुनाव के लिए होने वाली नामांकन प्रक्रिया के आसपास ही की। ऐसा लगा जैसे अचानक ही उनके दिमाग में यह विचार आया हो! दिलचस्प बात कि उन्होंने एक विपक्षी पार्टी होने के नाते अपने बयान में यह नहीं कहा कि उनकी पार्टी स्वयं चुनाव नहीं लड़ रही है पर वह विपक्षी प्रत्याशियों को उनके गुण-दोष आदि के आधार पर समर्थन करेगी। ऐसे में उनकी दूसरी घोषणा का फायदा निश्चय ही सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी को मिलना निश्चित है। वैसे भी भाजपा और उसकी सरकार ने निर्दलीय या छोटे-मझोले दलों से सम्बद्ध जिला पंचायत सदस्यों के ‘राजनीतिक-प्रबंधन’ के लिए बहुत बड़े स्तर का महत्वाकांक्षी प्रकल्प लेकर मैदान में पहले से जुटी हुई है।

मायावती जी की पहली घोषणा कि उनकी पार्टी यूपी में अकेले यानी अपने बल पर चुनाव लड़ेगी, कुछ कम रोचक नहीं है। इससे पहले अटकलें लगाई जा रही थीं कि उनकी पार्टी असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी-आल इंडिया मजलिसे-इत्तेहादुल मुसलिमिन (एमआईएम) से समझौता कर सकती है। श्री ओवैसी के और सुश्री मायावती के कुछ बेहद निकटस्थ सूत्रों ने राजधानी के सियासी गलियारे में इस आशय के संकेत भी देने शुरू कर दिये थे। मायावती के हालिया बयान से फिलहाल उन अटकलों पर विराम लग गया है।

लेकिन यूपी के चुनावों में अभी सात-आठ महीने का वक्त बाकी है। ऐसे में नेताओं की बयानबाजियों के बावजूद एमआईएम से बसपा के गठबंधन या तालमेल की संभावना से पूरी तरह इंकार करना सही नहीं होगा। अगर मायावती जी की पार्टी का सपा या कांग्रेस जैसी किसी पार्टी से गठबंधन नहीं होने जा रहा है तो बसपा के यूपी में अकेले लड़ने का क्या अर्थ निकाला जाय? क्या अकेले लड़कर बसपा कुछ बड़ा हासिल कर सकती है? अगर नहीं तो फिर उसकी चुनावी रणनीति का असल एजेंडा क्या है? इसके अलावा पंजाब में शिरोमणि अकाली दल के साथ चुनावी गठबंधन करने के पीछे ठोस कारण क्या हो सकता है?

इसे बीते कुछ सालों के उदाहरणों से ही समझा जा सकता है। जिन दिनों स्वयं मायावती ने राज्यसभा की अपनी सदस्यता से अचानक त्यागपत्र दिया, उस वक्त भी उनके बहुत सारे फैसलों पर सवाल उठाये गये थे। मायावती जी ने सदन में भाषण के दौरान जुलाई, 2017 में सांसद के तौर पर अपने इस्तीफे का ऐलान किया था। उनके इस्तीफे का फायदा भाजपा को ही मिला। मायावती ने ऐलान किया था कि इस्तीफे के बाद अब वह सरकार के खिलाफ और दलितों की भलाई के लिए लोगों के बीच जायेंगी।

इसके लिए आगरा क्षेत्र से कहीं शुरुआत करने का ऐलान किया गया। पर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। सन् 2019 के संसदीय चुनाव में सपा-बसपा गठबंधन जरूर बना पर वह कारगर नहीं साबित हुआ। दोनों को मिलाकर महज 15 सीटें मिलीं। फायदे में बसपा रही, जिसे 10 सीटें आईं। सपा को महज 5 सीटें हासिल हुईं। यूपी के चुनावी नतीजे के बहुतेरे अध्येताओं ने माना कि बसपा के समर्थकों के एक उल्लेखनीय हिस्से ने सपा उम्मीदवारों को वोट नहीं किया। जहां-जहां बसपा प्रत्याशी थे, वहां बसपा को वोट किया और जहां नहीं थे, वहां विभाजन दिखा। कुछ ने समाजवादी पार्टी को वोट किया और कुछ ने भारतीय जनता पार्टी को।

सन् 2019 से अब तक मायावती जी और उनकी बसपा की सक्रियता महज ट्विटर तक या यदा-कदा प्रेस कांफ्रेंस तक सीमित है। दलितों पर अत्याचार के मसले हों या कोरोना महामारी में सरकारों की लापरवाही या गलत नीतियों की या फिर किसान आंदोलन जैसी बड़ी घटना हो, मायावती जी या उनकी पार्टी कहीं सक्रिय भूमिका में नहीं दिखती हैं। यहां तक कि राष्ट्रपति को दिये जाने वाले विपक्षी दलों के साझा ज्ञापनों पर मायावती जी या उनकी पार्टी की तरफ से किसी नेता के हस्ताक्षऱ भी नहीं होते। बीते कुछ सालों से समाजवादी पार्टी भी यूपी में बहुत सक्रिय विपक्षी पार्टी नहीं रही है। लेकिन कम से कम उसने तमाम ज्वलंत सवालों पर विपक्ष के साझा कदमों या अभियानों का साथ दिया है। बसपा बिल्कुल खामोश रही है या कई बार तो विपक्षी दलों की ही आलोचना कर देती रही हैं। इससे पार्टी की राजनीतिक मंशा पर लगातार गंभीर सवाल उठते रहे हैं।

हाल कि दिनों में बसपा सुप्रीमो ने पार्टी के कई प्रमुख नेताओं को दल से निकाला है या निलंबित किया है। पार्टी के अंदर अगर किसी नेता की हैसियत हमेशा एक सी बरकरार रही तो वह हैं-सतीश चंद्र मिश्र। वह लगातार राज्यसभा सांसद भी बने हुए हैं। जुलाई, 2017 में मायावती के उस आकस्मिक फैसले में भी बसपा की राजनीति और रणनीति की रोचक तस्वीर दिखी, जब उन्होंने सरकार को कोसते हुए स्वयं अपनी सदस्यता से इस्तीफा दिया लेकिन सतीश चंद्र मिश्र और अन्य लोग राज्यसभा के सदस्य बने रहे। कोई नहीं जानता, वह कौन सी रणनीति थी और उसका क्या मतलब था?

उस फैसले से अगर किसी को सीधा फायदा मिला तो भाजपा को! खाली होने वाली सीट पर बसपा अपना उम्मीदवार जिताने में असमर्थ थी। बीते दो सालों से सरकार की चौतरफा विफलताओं पर मायावती जी या तो खामोश रही हैं या यदा-कदा उनकी ट्विटर पर मुलायम और औपचारिकता भरी टिप्पणी आती रही है। ऐसे में उनकी राजनीतिक विश्वसनीयता पर अगर आज सवाल उठ रहे हैं तो इसका खास मतलब है। उनके लिए ज्यादा चिंताजनक बात है कि अब बहुजन समाज से भी उन पर सवालों की बौछार हो रही है। देश के जाने-माने लेखक और दलित चिंतक कंवल भारती के हाल के लेख और सोशल मीडिया पर उनकी टिप्पणियां इसका ठोस उदाहरण हैं।    

कंवल भारती ने बीते मंगलवार एक फेसबुक पोस्ट में लिखाः ‘बहुजनों से अपील—अगर आपने बसपा को वोट दिया तो समझ लो आपने भाजपा को ही वोट दिया। और आप अपने भविष्य के लिए बबूल-वन बोएंगे।’ श्री भारती की इस पोस्ट पर कोई भी बसपा-समर्थक व्यक्ति या विचारक यह कह सकता है कि मायावती जी को लेकर कंवल भारती की आलोचना कोई नयी बात नहीं है। कंवल भारती तो बहुत पहले से बसपा की आलोचना करते आ रहे हैं।  बिल्कुल सही, यह बात मुझे ज्ञात है और बहुत सारे पाठकों को भी मालूम होगी। लेकिन इस बार उनकी आलोचना में एक नया पहलू जुड़ा हुआ है।

वह ये कि बसपा कहीं न कहीं भाजपा को फायदा पहुंचाने की राजनीति कर रही है। कोई बड़ा लेखक, जो स्वयं ही दलित समाज से आता हो और जिसने भारतीय समाज और खासकर दलित समाज के जटिल सवालों पर काफी विचार किया हो और लिखा हो, उसकी बहुजन समाज पार्टी को लेकर ऐसी टिप्पणी करना कोई साधारण बात नहीं है। कम से कम नजरंदाज करने वाली तो हरगिज नहीं। क्या बहुजन समाज पार्टी के शीर्ष नेतृत्व या उसके सलाहकारों ने ऐसी टिप्पणियों पर गौर किया है? क्या ऐसी टिप्पणियों का उनके लिए कोई मायने नहीं? क्या वे ऐसे सवालों की परवाह नहीं करते? बसपा ऐसे सवालों को चाहे जितना नजरंदाज करे पर उसकी खामोशी से उसकी बची-खुची राजनीतिक साख भी खत्म होती जा रही है। उस पर ऐसे गंभीर सवाल अब बहुजन समाज के लोग ही उठा रहे हैं!

(उर्मिलेश वरिष्ठ पत्रकार हैं और आपने कई किताबें लिखी हैं जो बेहद चर्चित रही हैं।)

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