Monday, December 6, 2021

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दिल्ली हाईकोर्ट की लताड़ के बाद भी क्या सरकार कुछ सीख पाएगी?

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आखिर दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस सिद्धार्थ मृदुल और जस्टिस नूप जे भंभानी की बेंच ने दिल्ली में हिंसा भड़काने के मामले में सामाजिक कार्यकर्ता नताशा नरवाल, देवांगना कलीता और जामिया मिल्लिया के एक छात्र आसिफ इकबाल तन्हा को जमानत दे ही दी। जमानत देते वक़्त डबल बेंच ने कहा, “हम यह कहने के लिए बाध्य हैं कि ऐसा लगता है कि असहमति को दबाने की अपनी चिंता में सरकार ने विरोध के अधिकार की संवैधानिक गारंटी और आतंकी गतिविधियों के बीच की रेखा को धुंधला कर दिया है अगर यह मानसिकता जोर पकड़ती है तो यह लोकतंत्र के लिए दुःखद दिन होगा..! विरोध जताना कोई आतंकी गतिविधि नहीं है।” न्याय व्यवस्था निरंतर केंद्र सरकार को आगाह कर रही चाहे वह किसान आंदोलन का मामला हो या किसी मामले की जांच की मांग। यह जनता का मौलिक अधिकार है। इस पर रोक टोक या हमले लोकतंत्र की छवि धूमिल करते हैं। जब व्यवस्थापिका संविधान से इतर कोई काम करती है तो न्याय व्यवस्था उसे बराबर सावधान करती है इसका सम्मान व्यवस्थापिका को करना चाहिए।

घटना है, 24 फरवरी, 2020 को संशोधित नागरिकता अधिनियम (CAA) के विरोध प्रदर्शन के दौरान दिल्ली में दो गुटों में जबर्दस्त हिंसा हुई थी। इसमें एक गुट CAA के समर्थन में था, जबकि दूसरा विरोध में। उत्तर-पूर्वी दिल्ली में पिछले साल 23 फरवरी को दंगे शुरू हुए थे और ये तीन दिन तक चले थे। इस दौरान यह इलाक़ा बुरी तरह अशांत रहा था और दंगाइयों ने वाहनों और दुकानों में आग लगा दी थी। जाफराबाद, वेलकम, सीलमपुर, भजनपुरा, गोकुलपुरी और न्यू उस्मानपुर आदि इलाक़ों में फैल गए इस दंगे में 53 लोगों की मौत हुई थी और 581 लोग घायल हो गए थे। इस मामले में खालिद, इशरत जहां, ताहिर हुसैन, मीरान हैदर, नताशा नरवाल, देवांगना कलिता, आसिफ इकबाल तन्हा और शिफा उर रहमान आरोपी हैं। ये सब इस समय न्यायिक हिरासत में थे। उन्हें आतंकी मान मामला दर्ज किया गया ।

दिल्ली पुलिस ने पिंजरा तोड़ मुहिम की देवांगना कलिता और नताशा नरवाल पर आरोप लगाया था कि जब लोग जाफ़राबाद मेट्रो स्टेशन पर सीएए और एनआरसी के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रहे थे तो देवांगना वहां मौजूद थीं और उन्होंने लोगों को उकसाया था। पुलिस का कहना था, ‘5 जनवरी, 2020 की एक वीडियो क्लिप है जिसमें देवांगना कलिता सीएए-एनआरसी के ख़िलाफ़ भाषण देती दिख रही हैं। इसके अलावा उनके ट्विटर के वीडियो लिंक से भी यह पता चलता है कि वह 23 फरवरी, 2020 को वहां मौजूद थीं। हालांकि ये जांच में गलत साबित हुआ है।

ज्ञात हो, दूसरी लहर के दौरान नरवाल के पिता महावीर नरवाल की मौत हो गई। पिता के अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए कोर्ट ने उन्हें पहले भी जमानत दी थी। पिता का अंतिम संस्कार करने के बाद नरवाल तिहाड़ जेल लौट गईं। नरवाल तिहाड़ जेल में पिछले सवा साल से बंद थीं। दिल्ली हाईकोर्ट ने नताशा के अलावा आसिफ इकबाल तन्हा और देवांगना कालिता को भी जमानत दे दी है। इन पर गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम   लगाया गया है। कोर्ट ने दिल्ली पुलिस की भी भर्त्सना की है।

दिल्ली हाईकोर्ट ने उत्तर-पूर्व दिल्ली दंगा मामले के तीनों आरोपियों को अपने-अपने पासपोर्ट जमा करने, गवाहों को प्रभावित न करने और सबूतों के साथ छेड़खानी न करने का निर्देश दिया है। बेंच ने इन तीनों की जमानत याचिकाओं पर 18 मार्च को अपना आदेश सुरक्षित रख लिया था। तन्हा ने एक निचली अदालत के 26 अक्टूबर, 2020 के आदेश को चुनौती दी है। कोर्ट ने इस आधार पर जमानत याचिका खारिज कर दी थी कि आरोपी ने पूरी साजिश में कथित रूप से सक्रिय भूमिका निभाई थी और इस आरोप को स्वीकार करने के लिए पर्याप्त आधार है कि आरोप प्रथम दृष्ट्या सच प्रतीत होते हैं। लेकिन अब जस्टिस सिद्धार्थ मृदुल और न्यायमूर्ति अनूप जे. भंभानी की पीठ ने कहा कि प्रथम दृष्ट्या, UAPA की धारा 15, 17 या 18 के तहत कोई भी अपराध तीनों के खिलाफ वर्तमान मामले में रिकॉर्ड की गई सामग्री के आधार पर नहीं बनता है। कोर्ट ने कई तथ्यों को ध्यान में रखते हुए माना कि विरोध जताना कोई आतंकी गतिविधि नहीं है। हाईकोर्ट ने चार जून को तन्हा को 13 से 26 जून तक दो सप्ताह के लिए हिरासत में अंतरिम जमानत दी, ताकि वह 15 जून से होने वाली परीक्षाओं के मद्देनजर अध्ययन करने और परीक्षा में शामिल होने के लिए यहां एक होटल में रह सकें।

कुल मिलाकर ये ख़ुशी का सबब तो है लेकिन जमानत जीत नहीं। बड़ी बात यह है कि सरकार को अदालत की लताड़ बार-बार पड़ रही है इससे वह सबक लेती है या नहीं। पिंजरा तोड़ मुहिम की नेत्रियां ज़रूर बधाई की पात्र हैं जिन्होंने जेल में रहना पसंद किया।

ग़लत के आगे झुकना नहीं। तन्हा के हौसले को भी सलाम। अपने हक और अधिकार के लिए संघर्षरत ऐसे लोग ही ना केवल नई इबारत लिखते हैं बल्कि नई सुबह लेकर आने वालों में शामिल होते हैं। जुझारू साथियों को सलाम।

(सुसंस्कृति परिहार स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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