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Categories: बीच बहस

रघुराज राजन के सुझावों पर क्यों नहीं गौर कर रही है सरकार?

पिछले सप्ताह रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर और प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री रघुराम जी राजन ने कोरोना वायरस के कारण उपस्थित चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए देश की आर्थिक दुर्दशा से सम्बंधित कई बेहद अहम बयान और सुझाव दिया था लेकिन दरबारी मीडिया के खतरनाक एजेंडों के तले उसे आसानी से दबा दिया गया। विश्वव्यापी वैश्विक महामारी कोरोना संकट के कारण सम्पूर्ण देश में तालाबंदी है, देश की आर्थिक बदहाली पूर्व से ही खस्ता हाल हालत में है। ऐसे में कोरोना संकट के बाद की स्थिति का सहज अंदाजा लगाया जा सकता है।

अहम बात ये थी कि राजन ने न केवल देश को खस्ता हाल आर्थिक हालात के डूबने की ओर इशारा किया बल्कि उन्होंने महत्वपूर्ण सकारात्मक सुझाव भी दिए। राजन के अनुसार भारत के पास इतने स्रोत और क्षमता है कि वह न केवल कोरोना महामारी से  उबर सकता है बल्कि भविष्य के लिये भी ठोस आधार तैयार कर सकता है। ऐसे समय में क्या यह जरूरी नहीं है की पूर्व आरबीआई गवर्नर और अर्थशास्त्री राजन के बयानों और सलाहों को गम्भीरता से लिया जाए?

राजन ने ‘हालिया समय में संभवत: भारत की सबसे बड़ी चुनौती’ शीर्षक से एक ब्लॉग पोस्ट में कुछ अहम मुद्दों को उठाया था। आइए सबसे पहले जानते हैं कि राजन ने क्या कहा था –

● राजन के अनुसार देश आर्थिक लिहाज से आजादी के बाद के सबसे बड़े आपातकालीन दौर में है। राजन के अनुसार 2008-09 के वैश्विक वित्तीय संकट के दौरान मांग में भारी कमी आयी थी, लेकिन हमारी कंपनियां मजबूत स्थिति में थीं, हमारी वित्तीय प्रणाली और वित्तीय संसाधन भी बेहतर स्थिति में थे, लेकिन वर्तमान कोरोना संकट के बीच कुछ भी सही नहीं है।

● राजन से सीधे तौर पर लिखा कि सरकार को इस आपातकालीन स्थिति से निकलने के लिये विपक्षी दलों समेत आर्थिक विशेषज्ञों की मदद लेनी चाहिये। सरकार को संकीर्ण राजनीतिक सीमा रेखा को लांघ कर विपक्ष से मदद लेनी चाहिए क्योंकि उनके पास पिछले वैश्विक वित्तीय संकट से देश को निकालने का अनुभव है।

देश में जब कोरोना दस्तक दे रहा था तो उस समय विपक्ष के कई नेताओं ने सरकार को स्थिति के भयावह होने के बारे में पहले से ही आगाह कर दिया था लेकिन सरकार न सिर्फ लापरवाह बनी रही बल्कि विपक्षी नेताओं पर ही माहौल बिगाड़ने का आरोप लगा बैठी।

स्थिति के बिगड़ने पर सरकार ने आनन-फानन में देशव्यापी लॉक डाउन का फैसला ले लिया, हालांकि सरकार के पास इसके सिवा कोई अन्य विकल्प भी नहीं बचा था। लेकिन सवाल उठने लाजिमी हैं कि आख़िर सरकार ने इस बड़े फैसले से पहले विपक्षी दलों की एक बैठक बुलानी उचित क्यों नहीं समझी ?

हालांकि बाद में सरकार ने विपक्षी नेताओं से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए विचार विमर्श किया और उनसे कोरोना संकट से उपजी स्थितियों से निपटने के सुझाव भी माँगे। प्रधानमंत्री की इस बैठक के बाद मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस की अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने एक जिम्मेवार विपक्ष की भूमिका का निर्वहन करते हुए प्रधानमंत्री को एक पत्र लिखकर पाँच बेहद महत्वपूर्ण सुझाव दिये।

1. सरकार एवं सरकारी उपक्रमों द्वारा मीडिया विज्ञापनों- टेलीविज़न, प्रिंट एवं ऑनलाइन विज्ञापनों पर दो साल के लिए रोक लगा यह पैसा कोरोना वायरस से उत्पन्न हुए संकट से जूझने में लगाया जाए। केवल कोविड-19 के बारे में एडवाईज़री या स्वास्थ्य से संबंधित विज्ञापन ही इस बंदिश से बाहर रखे जाएं।

2.   20,000 करोड़ रुपये की लागत से बनाए जा रहे ‘सेंट्रल विस्टा’ ब्यूटीफिकेशन एवं कंस्ट्रक्शन प्रोजेक्ट को स्थगित किया जाए।

3.  तीसरा, भारत सरकार के खर्चे के बजट (वेतन, पेंशन एवं सेंट्रल सेक्टर की योजनाओं को छोड़कर में भी इसी अनुपात में 30 प्रतिशत की कटौती की जानी चाहिए। यह 30 प्रतिशत राशि (लगभग 2.5 लाख करोड़ रु. प्रतिवर्ष) प्रवासी मजदूरों, श्रमिकों, किसानों, एमएसएमई एवं असंगठित क्षेत्र में काम करने वालों को सुरक्षा चक्र प्रदान करने के लिए आवंटित की जाए।

4. राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों, राज्य के मंत्रियों तथा नौकरशाहों द्वारा की जाने वाली सभी विदेश यात्राओं को स्थगित किया जाए। केवल देशहित के लिए की जाने वाली आपातकालीन एवं अत्यधिक आवश्यक विदेश यात्राओं को ही प्रधानमंत्री द्वारा अनुमति दी जाए।

5. पीएम केयर्स’ फंड की संपूर्ण राशि को ‘प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत फंड’ (‘पीएम-एनआरएफ’) में स्थानांतरित किया जाए। इससे इस राशि के आवंटन एवं खर्चे में एफिशियंसी, पारदर्शिता, जिम्मेदारी तथा ऑडिट सुनिश्चित हो पाएगा।

कोरोना संकट से देश की लचर आर्थिक व्यवस्था को सही करने के लिए आरबीआई पूर्व गवर्नर राजन द्वारा विपक्ष के अनुभव की मदद की सलाह के बीच कांग्रेस प्रमुख सोनिया गाँधी के पाँच बेहद महत्वपूर्ण सलाह भी आ चुकी है, लेकिन अहम सवाल यही है कि – क्या कॉरपोरेट हितैषी पूँजीवादी सरकार इन सलाहों को गम्भीरता से लेगी ?

सरकार इन सुझावों को कितनी गम्भीरता से लेती है ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा, लेकिन स्थिति की भयावहता का अनुमान कुछ विशेष सर्वेक्षणों और आर्थिक संगठनों के बयानों से सहज लगाया जा सकता है ।

◆ अंतर्राष्ट्रीय मजदूर संगठन (International Labour Organization) की एक रिपोर्ट के अनुसार – “कोरोना वायरस के कारण असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले करोड़ों लोग प्रभावित हुए हैं। भारत में करीब 90 फीसदी लोग इनफॉर्मल सेक्टर में काम करते हैं। ऐसे में करीब 40 करोड़ कामगारों के रोजगार और कमाई प्रभावित होने की आशंका है। इससे वे गरीबी के दुष्चक्र में फंसते चले जाएंगे।”

◆  भारत के पूर्व चीफ स्टैटिस्टिशियन प्रणब सेन का कहना है कि “लॉकडाउन के केवल दो हफ्तों में ही तकरीबन पांच करोड़ लोगों ने अपनी नौकरी गंवा दी है।”

◆  अमेरिकन रेटिंग एजेंसी, FITCH ने वित्त वर्ष 2019-20 के लिए भारत की आर्थिक वृद्धि दर का अनुमान घटाकर 2% कर दिया है। जबकि 2020-21 के लिए यह 5.6% से घटाकर 5.1% किया है।

◆. वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गनाइजेशन (WTO) के चीफ रोबर्टों ऐजेवेदो ने कहा कि दुनिया 2008-09 से बड़ी मंदी देख सकती है। विश्व व्यापार में एक तिहाई तक कि कमी आ सकती है। वैश्विक व्यापार 32% तक घट सकता है।

◆  अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) प्रमुख क्रिस्टलिना जॉर्जीवा के अनुसार यह वायरस दुनिया को 1930 की महामंदी (Great Depression) के बाद की सबसे बड़ी मंदी दिखा सकता है।

◆ मूडीज इन्वेस्टर्स ने वर्ष 2020  के लिए वृद्धि दर का अनुमान घटाकर 2.5% कर दिया है, पहले यह अनुमान 5.3% था।

◆ सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनमी (सीएमआईई) के मुताबिक भारत की शहरी बेरोजगारी दर 30.9% तक बढ़ सकती है, हालांकि कुल बेरोजगारी 23.4% तक बढ़ने का अनुमान है। सीएमआईई की रिपोर्ट के अनुसार बेरोजगारी दर मार्च महीने के मध्य में 8.4% से बढ़कर 23% हो गई है। शहरी क्षेत्र में बेरोजगारी दर 15 मार्च 2020 को 8.21 फीसद थी।

यह 22 मार्च 2020 को 8.66 फीसद पर आई। फिर 24 मार्च को लॉक डाउन की घोषणा के बाद इसमें जबरदस्त तेजी आई। 29 मार्च 2020 को यह 30.01 फीसद पर जा पहुंची और फिर 5 अप्रैल 2020 के आंकड़े के अनुसार, यह 30.93 फीसद पर आ गई है। इसकी पिछली रिपोर्ट 2010 में जारी की गई थी। इसके मुताबिक, बोरोजगारी की दर 45 साल के हाई पर पहुंचकर 6.1 पर्सेंट रही थी।

कुल मिलाकर विभिन्न आर्थिक संगठनों, प्रमुख आर्थिक सर्वेक्षणों और प्रतिष्ठित अर्थशास्त्रियों ने यह साफ कर दिया है कि कोरोना संकट के बाद पूरी दुनिया आर्थिक मंदी की चपेट में आएगा। ऐसे में भारत जैसे विकासशील देश की आर्थिक दिवालियेपन का सहज अंदाजा लगा जा सकता हैं।

कोरोना संकट और सरकार की अनियोजित आर्थिक नीतियों ने आर्थिक मंदी की स्थिति को और अधिक बड़ा बना दिया है। ऐसे में बहुत जरूरी है कि सरकार इन प्रमुख आर्थिक सर्वेक्षणों को ध्यान में रखते हुए विपक्षी दलों और अर्थशास्त्रियों से गहन विचार-विमर्श कर उनके अनुभव का लाभ उठाने की कोशिश करे और उनके सुझावों को अमलीजामा पहनाने की सार्थक कोशिश करें।

(दया नन्द स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं और शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े हैं।)

This post was last modified on April 10, 2020 4:56 pm

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