Saturday, October 23, 2021

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राहुल की कांग्रेस को कितना बदलेंगे कन्हैया और जिग्नेश !

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आखिकार कन्हैया कुमार और जिग्नेश मेवानी कांग्रेस में शामिल हो गए। इसकी जमीन काफी पहले से तैयार हो रही थी, इसलिए राजनीति पर नजर रखने वालों को ज्यादा अचरज नहीं हुआ। कांग्रेस को टुकड़े-टुकड़े गैंग से ही जोड़ने के लिए सही, गोदी मीडिया ने भी इसे उम्मीद से ज्यादा कवरेज दिया। लेकिन उनका नजरिया कुछ भी हो, उन्होंने एक महत्वपूर्ण राजनीतिक परिवर्तन को उचित जगह दी है।

जाहिर है कि लोग, कम से कम कन्हैया को लेकर, यह सवाल जरूर करेंगे कि पिछला लोकसभा चुनाव हारने वाले और बिहार विधान सभा चुनावों में भी कुछ ज्यादा असर डालने में नाकामयाब रहे युवा नेता को पार्टी में शामिल कर कांग्रेस क्या हासिल करना चाहती है?
इसी से जुड़े एक दूसरे सवाल का उत्तर दोनों युवा नेताओं ने कांग्रेस मुख्यालय की प्रेस कांफ्रेंस में दे दिया है कि उन्होंने क्यों कांग्रेस का दामन थामा है। उनकी दृष्टि साफ है कि भारतीय जनता पार्टी से मुकाबला चुनावी नहीं है, विचारों का है। संघ परिवार देश के लोकतंत्र को ही नहीं भारत की संस्कृति, इतिहास और सामाजिक ढांचे को नष्ट करना चाहता है। उससे इस स्तर पर मुकाबला करने वाली सबसे बड़ी शक्ति कांग्रेस है। कन्हैया ने कहा कि भारत की सोच को बचाने के लिए इस बड़े जहाज को बचाना जरूरी है। उनके अनुसार आजादी के आंदोलन की विरासत वाले इस संगठन के जरिए ही अभी की लड़ाई लड़ी जा सकती है। जिग्नेश ने भी इसी से मिलती-जुलती बातें कही।

जहां तक यह सवाल है कि कांग्रेस को क्या मिलेगा तो यह इसे समझने में भारतीय मीडिया की नाकामी स्वाभाविक है। वह वैचारिक रूप से लोकतंत्र और जन-सरोकारों के खिलाफ है और राजनीति को शतरंज के खेल के रूप में रखता है। इस खेल का भी वह निष्पक्ष दर्शक नहीं बल्कि सत्ता पक्ष के समर्थक या चियर लीडर की भूमिका में है। वह देश में हो रहे वैचारिक परिवर्तनों को समझने की न तो क्षमता रखता है और न ही इच्छाशक्ति। वह हर राजनीतिक घटना को व्यक्तियों के बीच की लड़ाई के रूप में पेश करता है। यही नजरिया वह कैप्टन अमरिंदर के हटने और चरणजीत सिंह चन्नी के मुख्यमंत्री बनने के बारे में अपनाता है और वही कन्हैया और जिग्नेश के कांग्रेस में शामिल होने को लेकर।

गौर से देखें तो कांग्रेस की भीतरी उठा-पटक कांग्रेस के भीतर चल रहे वैचारिक संघर्ष से जुड़ा है। एक लोकतांत्रिक संगठन होने की वजह से इसमें यह संघर्ष शुरू से ही होता आया है और अक्सर विकराल रूप लेता रहा है। डॉ. बाबा साहेब आंबेडकर ने शुरूआती सालों में कांग्रेस अधिवेशन के साथ ही होने वाले सामाजिक सुधार के सम्मेलनों के बारे में लिखा है कि कैसे राजनीतिक परिवर्तन के समर्थकों और सामाजिक परिवर्तन के पक्षधरों के अलग-अलग खेमे बन गए और सामाजिक सुधार सम्मेलनों को अपने साथ करने पर कांग्रेस ने पाबंदी लगा दी। उनका मानना है कि यह रूढ़िवादियों की जीत थी।
1906 में कलकत्ता अधिवेशन के दौरान स्वदेशी आंदोलन और विदेशी सामान तथा स्कूल-कालेजों के बहिष्कार के मुद्दे पर कांग्रेस नरम दल तथा गरम दल में बंट गया था। संगठन के भीतर वैचारिक संघर्ष का ऐसा ही उदाहरण नेताजी सुभाषचंद्र बोस तथा महात्मा गांधी के बीच दिखाई पड़ा था। आजादी के बाद भी यह कई बार सामने आया। इंदिरा गांधी और मोरारजी देसाई के बीच का संघर्ष इसी का एक नमूना है। इसमें दो राय नहीं कि इन वैचारिक संघर्षों में व्यक्तियों के अहंकार तथा उनकी पदलिप्सा की भी एक बड़ी भूमिका थी, लेकिन ये संघर्ष मुख्य रूप से वैचारिक थे।

कांग्रेस के इस चरित्र को समझे बगैर हम चन्नी के मुख्यमंत्री बनने या कन्हैया जिग्नेश को पार्टी में शामिल होने की घटना का अर्थ नहीं समझ सकते। चन्नी का चयन सिर्फ पंजाब की राजनीति में बदलाव के लिए उठाया गया एक क्रांतिकारी कदम नहीं है बल्कि देश की राजनीति को प्रभावित करने वाला एक बड़ा कदम है। एक दलित नेता को राज्य की कमान सौंपना, वह भी चुनाव के नाजुक मौके पर, कोई साधारण कदम नहीं है।
राहुल गांधी ने कन्हैया तथा जिग्नेश को शामिल करने का जोखिम उठा कर भी यही दिखाया है कि वह राजनीति में नए प्रयोग करना चाहते हैं। दोनों युवाओं की स्पष्ट वामपंथी विरासत है और उन्होंने कांग्रेस में शामिल होने का भी ऐसा ही तरीका अपनाया कि यह विरासत दिखाई दे।

वे कांग्रेस का पट्टा लेकर और राहुल गांधी का नाम जपते हुए कांग्रेस में शामिल नहीं हुए बल्कि इसके लिए शहीद भगत सिंह की जयंती का दिन चुना और डॉ. आंबेडकर, गांधी तथा भगत सिंह की संयुक्त तस्वीर साथ लेकर आए। असल में, उन्हें यह बताना था कि वह अपनी विरासत छोड़ कर नहीं, साथ लेकर आए हैं। दोनों ने अपने बयान में यह बताया भी।
इस घटना को कांग्रेस से कई युवा नेताओं के बाहर जाने से जोड़ कर ही देखना चाहिए। पार्टी छोड़ने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया या जितिन प्रसाद आभिजात्य पृष्ठभूमि के हैं। कन्हैया या जिग्नेश गरीबी की पृष्ठभूमि से हैं। जिग्नेश की सामाजिक प्रृष्ठभूमि काफी महत्वपूर्ण है। पंजाब में भी एक पूर्व राजा तथा सामाजिक रूप से अगड़े कैप्टन अमरिंदर की जगह दलित चन्नी ने ली है।

कन्हैया और जिग्नेश का एक और महत्व है। मनमोहन सिंह की आर्थिक नीतियों को कांग्रेस ने अभी तक साफ तौर पर नहीं त्यागा है। इससे निकल कर जाने वाले नेता भी इन्हीं नीतियों के पक्षधर हैं। कन्हैया और जिग्नेश इन नीतियों के पूरी तरह खिलाफ हैं। उन्हें शामिल कर पार्टी ने अपनी बदलती आर्थिक नीतियों के संकेत दिए हैं। इससे यही लगता है कि मोदी सरकार की कॉरपोरेट समर्थक नीतियों के खिलाफ राहुल की लड़ाई साफ हो रही है। दो कट्टर कारपोरेट विरोधी नेताओं को लेना उस दिशा में बढ़ाया गया एक कदम जरूर है।
एक और सवाल है जो ऐसे समय में उठना स्वाभाविक है। क्या वामंपंथी पार्टियां अप्रासंगिक हो गई हैं और यही देख कर कन्हैया सीपीआई से बाहर आ गए? यह एक कम समझ वाला सवाल है। कन्हैया के पार्टी छोड़ने से सीपीआई को कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है। पार्टी की लोकप्रियता में कमी से इसका कोई रिश्ता नहीं है। सीपीआई जैसी पार्टी किसी व्यक्ति की लोकप्रियता पर नहीं टिकी होती है। उस समय भी जब वह ताकतवर थी तो किसी खास व्यक्ति के सहारे नहीं थी। लंबे समय तक पार्टी का नेतृत्व करने वाले एसए डांगे इसे छोड़ कर गए तो पार्टी को कोई फर्क नहीं पड़ा।

लोगों को यह समझना चाहिए कि वामपंथी पार्टियां अपना नेता इस आधार पर चुनती हैं कि उनकी नीतियों का प्रतिनिधित्व कौन करता है। वे इस आधार पर नेता नहीं चुनतीं कि कौन कितना लोकप्रिय है। जाहिर है कि वामपंथी पार्टियां अपनी नीतियों को जनता में लोकप्रिय बनाने में सफल नहीं हो पा रही हैं। ऐसा नहीं है कि कन्हैया वहां रह जाते तो उनकी नीतियों को लोकप्रिय बना देते। वैसे भी, कन्हैया की मदद के बगैर महागठबंधन की ही एक दूसरी वामपंथी पार्टी सीपीआई (एमएल) ने बिहार विधान सभा के पिछले चुनावों में काफी अच्छा प्रदर्शन किया है। यह जरूर है कि सीपीआई जैसी पार्टी को इसका तरीका ढूंढना चाहिए कि नौजवान उसकी ओर आकृष्ट हों। कन्हैया ने अपने वैचारिक लचीलेपन के अनुसार कांग्रेस को चुना है। सीपीआई उनके अनुसार अपने को वैचारिक रूप से लचीला नहीं बना सकती है। वैसे भी, लोकतंत्र में हर पार्टी को एक ही रूप अपनाने के लिए कहना गलत है। लोगों को अपनी विचारधारा के हिसाब से पार्टी चुनने का हक है।

(अनिल सिन्हा वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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