Saturday, May 21, 2022

किसान आन्दोलन से क्या पश्चिमी यूपी में भाजपा का गढ़ बच पायेगा?

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पश्चिमी यूपी में किसान आंदोलन के बाद राजनीतिक हालात पूरी तरह बदल गये हैं। भाजपा के हाथों से जाट और गुर्जर वोट बैंक पूरी तरह खिसका नजर आ रहा है और विपक्ष के पाले में अर्थात अखिलेश–जयंत गठबंधन के पक्ष में दिखाई पड़ रहा है। किसान आन्दोलन के दौर में पश्चिमी यूपी में जाटों और मुस्लिमों के बीच दीवार ढह गयी है और वर्ष 2013 के पहले जिस तरह महेन्द्र सिंह टिकैत के जमाने में जो मुस्लिम जाट एकता दिखती थी, वही स्थिति बन रही है। अगर जाट-मुस्लिम एकजुटता बनी रही तो भाजपा का सूपड़ा साफ़ होना तय है।

वर्ष 2017 के चुनाव में सपा और कांग्रेस ने गठबंधन में चुनाव लड़ा था। रालोद और बसपा अकेले ही चुनाव मैदान में थे। लेकिन इस बार चुनाव में स्थिति अलग है। रालोद और सपा एक साथ हैं। बसपा और कांग्रेस अकेले दम पर लड़ रहे हैं। इस बार पश्चिम के इन जिलों में किसान आंदोलन का असर होने की वजह से मुकाबले कड़े हो गए हैं।

उत्तर प्रदेश के 11 जिलों की 58 विधानसभा के लिए दस फरवरी को मतदान होगा। पश्चिमी यूपी में भाजपा का 2017 का प्रदर्शन देखें तो यहां से इन्हें 54 सीटें मिली थीं। लेकिन इस बार चुनाव में चुनौतियां अलग हैं। तो इनके सामने गढ़ बचाने की चुनौती रहेगी। वहीं विपक्षी दलों को किसान आंदोलन से मिली संजीवनी से क्या उनका वजूद बच पाएगा। यह तो परिणाम आने पर पता चलेगा।

2017 के चुनाव में पश्चिमी यूपी में मेरठ विधानसभा में 7 में 6 भाजपा के खाते में गयी थीं। जबकि एक सीट भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मीकांत बाजपेयी को हराने वाले सपा के रफीक अहमद के खाते में गयी थी। मुजफ्फरनगर में सभी सीटें भाजपा के खाते में गयी थीं।

शामली की तीनों सीटों में से दो पर भाजपा और एक पर सपा को विजय मिली थी। बागपत की तीन में से दो सीटों पर भाजपा और एक पर रालोद ने जीत दर्ज की थी। हालांकि बाद में छपरौली विधायक ने भी भाजपा ज्वाइन कर ली थी। गाजियाबाद की पांचों सीट भाजपा के खाते में चली गई थीं। हापुड़ की तीन विधानसभा सीटों में दो पर भाजपा और एक पर बसपा के प्रत्याशी ने जीत दर्ज की थी। गौतमबुद्धनगर की तीनों और बुलंदशहर की सातों सीट भाजपा के खाते में चली गई थीं। अलीगढ़ की भी सभी सात सीटों पर भाजपा जीत गई थी। आगरा में सभी नौ और मथुरा की पांच से चार सीटें भाजपा को जबकि एक सीट पर बसपा ने विजय पायी थी।

पश्चिमी यूपी के जानकारों की मानें तो इस विधानसभा चुनाव में सपा और रालोद की दोस्ती की भी परीक्षा होगी। मुजफ्फरनगर दंगे के बाद रालोद से छिटका वोट बैंक किसान आंदोलन के बाद एकजुट माना जा रहा है। दोनों पार्टियों के समर्थक मुजफ्फरनगर दंगे भुलाकर साथ तो आए हैं, पर बूथ पर यह कितना कारगर होंगे, यह आने वाले समय में ही साफ होगा। पश्चिमी यूपी में मुद्दे सेकेण्ड्री होते हैं। यहा ध्रुवीकरण का खेल रहता है। अभी स्थानीय स्तर के जो जनप्रतिनिधि हैं उनसे लोगों की नाराजगी है। प्रत्याषी बड़ा फैक्टर इनके बदलने से स्थिति अलग होगी। हां पिछली बार की मिली सीटों की अपेक्षा इस बार भाजपा को बहुत बड़ा नुकसान होगा।

दरअसल पश्चिमी यूपी में 2013 में जाटों का मुस्लिमों से जो अलगाव हुआ था। उसका फायदा भाजपा को मिला था। मुस्लिम वोटर कई पार्टियों में भी बंटे थे। कई जातियां भी भाजपा के पक्ष में थीं। जाट गुर्जर यहां पर प्रभावी हैं। किसान आंदोलन के बाद हालात बदले हैं। जाट बिरादरी इस आंदोलन की अगुवाई कर रही थी।

पश्चिमी यूपी एक समय आरएलडी और बसपा का मजबूत गढ़ हुआ करता था। लेकिन 2014 के लोकसभा चुनावों से समीकरण पूरी तरह बदल गए हैं। 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में भाजपा ने जहां एक तरफा जीत हासिल की, वहीं 2017 में भाजपा क्षेत्र की करीब 80 फीसदी सीटें हथिया ली। किसानों में प्रमुख पैठ रखने वाली आरएलडी को तो पश्चिमी यूपी में केवल एक सीट मिली। लेकिन किसान आंदोलन के बाद बदले समीकरण को देखते हुए पश्चिमी यूपी में अखिलेश यादव और जयंत चौधरी, भाजपा जैसा कमाल करना चाहते हैं। दोनों नेताओं की जाट और मुसलमान मतदाताओं से सबसे ज्यादा उम्मीद है।

समाजवादी पार्टी के लिए पश्चिमी यूपी कभी भी एकतरफा जीत वाला क्षेत्र नहीं रहा है। 2012 में भी जब उसे बहुमत मिला था, तब भी पार्टी को 29 सीटें इस इलाके से मिली थीं। जबकि 2017 में 16 सीटों पर जीत मिली थी। ऐसे में अखिलेश यादव, जयंत चौधरी और इमरान मसूद को अपने साथ लाकर इतिहास बदलने की उम्मीद कर रहे हैं। इमरान मसूद के समाजवादी पार्टी में आने से पश्चिमी यूपी की राजनीति पर गहरा असर पड़ सकता है। खास तौर से सहारनपुर और उसके आस-पास के इलाके में मसूद और उनके काजी परिवार का गहरा प्रभाव रहा है। 2012 में जब समाजवादी पार्टी ने बहुमत से सरकार बनाई थी, उस समय भी सहारनपुर में सपा केवल एक विधानसभा सीट पर जीत दर्ज कर पाई थी।

मसूद की मुस्लिम समुदाय में अच्छी पकड़ मानी जाती है। 2017 के विधानसभा चुनाव में इमरान समूद कांग्रेस में थे और उस समय पार्टी को प्रदेश में कुल छह सीटें मिली थीं। उसमें से 2 सीटें सहारनपुर से मिली थीं। इसके पहले 2007 में मसूद ने निर्दलीय उम्मीदवार रहते हुए सपा के मंत्री जगदीश राणा को हराकर चुनाव जीता था। हालांकि उसके बाद खुद मसूद का चुनावी ग्राफ बहुत अच्छा नहीं रहा। और वह 2014 और 2019 का लोकसभा चुनाव हार गए थे। और 2012, 2017 का विधानसभा चुनाव भी हार गए थे। इसके बावजूद, जिस तरह उनका और उनके परिवार का सहारनपुर और उसके आस-पास के इलाके में प्रभाव है, उसका फायदा लेने की कोशिश अखिलेश यादव कर रहे हैं।

इसी तरह बीजेपी के विधायक अवतार सिंह भड़ाना दिल्ली में राष्ट्रीय लोकदल (आरएलडी) मुखिया जयंत चौधरी के साथ दिल्ली में मुलाकात के बाद उनकी पार्टी में शामिल हो गए। अवतार सिंह भड़ाना की अब गुर्जर बाहुल्य इलाके के गौतम बुद्ध नगर की जेवर सीट से आरएलडी पार्टी की ओर से चुनाव लड़ने की चर्चा है। फिलहाल भड़ाना मुजफ्फरनगर की मीरापुर सीट से विधायक हैं। भड़ाना की गिनती गुर्जर राजनीति के शीर्ष नेताओं में होती रही है।

वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले भड़ाना इसी तरह बीजेपी में शामिल हो गए थे। वह मेरठ-मवाना लोकसभा सीट से साल 1999 में कांग्रेस सांसद रह चुके है। हालांकि बीजेपी में शामिल होने और टिकट दिए जाने का भड़ाना को कार्यकर्ताओ और पदाधिकारियों का विरोध भी झेलना पड़ा था। इसके बावजूद उन्होंने मात्र 193 वोट से सपा के प्रत्याशी लियाकत अली को हराकर मीरापुर से बीजेपी का विधायक बनने में कामयाबी हासिल की।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह का लेख।)

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