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तीरथ सिंह रावत को कौन सिखाए ‘राजधर्म’

तीरथ सिंह रावत 56 साल की उम्र में उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री बने हैं जबकि नरेंद्र मोदी 51 साल की उम्र में गुजरात के मुख्यमंत्री बने थे। तीरथ सिंह रावत को अवसर मिला है जब प्रधानमंत्री हैं नरेंद्र मोदी। नरेंद्र मोदी को मुख्यमंत्री बनने का अवसर तब मिला था जब अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे। तब केशूभाई पटेल की बलि ली गयी थी, अब त्रिवेंद्र सिंह रावत की। दोनों नेताओं का मुख्यमंत्रित्व काल या फिर कहें कि राजनीति में उत्कर्ष का आरंभ ‘आपदा में अवसर’ को सार्थक बनाते हुए हुआ।

तीरथ सिंह रावत और नरेंद्र मोदी दोनों ही संघ से जुड़े रहे हैं। 80 के दशक से दोनों ही बीजेपी में शामिल रहे हैं। नरेंद्र मोदी के साथ अतिरिक्त अनुभव भी है कि वे आपातकाल के दौर में भी सक्रिय रहे थे और जनता पार्टी की सरकार के समय भी। इन समानताओं का जिक्र इसलिए करना जरूरी लगा क्योंकि यह समझना जरूरी है कि तीरथ सिंह रावत को राह दिखा गये हैं नरेंद्र मोदी या मोदी की राह पर हैं तीरथ।

पौंड की जगह डॉलर बोले थे मोदी, तीरथ ने अमेरिका की जगह ब्रिटेन कहा

मुख्यमंत्री बनने के बाद तीरथ सिंह लगातार हास्यास्पद बयान दे रहे हैं। नरेंद्र मोदी भी ऐसा कर चुके हैं। जुलाई 2003 में तब मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने अहमदाबाद में कहा था कि आज़ादी के समय एक डॉलर की कीमत एक रुपये के बराबर थी। जबकि, सच यह था कि एक पाउंड के बराबर एक रुपये की कीमत थी। डॉलर अमेरिकी करंसी है और पाउंड ब्रिटिश। 17 साल बाद तीरथ सिंह रावत ने कहा है कि भारत 200 साल तक अमेरिका का गुलाम बनकर रहा। और, आज कोरोना में अमेरिका अधिक पीड़ित है, भारत बेहतर स्थिति में है। अमेरिका और इंग्लैंड के तौर पर तब करंसी में, और अब उपनिवेशवादी देश के रूप में नामों का फर्क दिख बयां हुआ है।

अमेरिका और इंग्लैड का फर्क तो छोड़िए श्यामजी कृष्ण वर्मा और श्यामा प्रसाद मुखर्जी में फर्क नहीं कर पाए थे नरेंद्र मोदी। बात नवंबर 2013 की है। गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए पीएम मोदी ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी को गुजरात का बेटा बताया था। उन्हें लंदन में इंडिया हाऊस का गठन करने वाला बताते हुए उनकी मौत 1930 में होने की जानकारी दी थी। जबकि, यह परिचय क्रांतिकारी श्यामजी कृष्ण वर्मा का है। श्यामा प्रसाद मुखर्जी पश्चिम बंगाल से रहे हैं जिनकी मौत 1953 में हुई थी।

तीरथ को राजधर्म बताने को अटल बनेंगे मोदी?

मुख्यमंत्री तीरथ सिंह के एक और ताजा बयान पर गौर करें- “हर घर को 05 किलो राशन दिया गया. जिनके 10 थे (एक घर में) उनको 50 किलो, 20 थे तो क्विंटल भर राशन दिया गया. कुछ को जलन होने लगी कि 2 वालों को 10 किलो और 20 वालों को क्विंटल भर मिला। इसमें जलन कैसी? जब समय था तो आपने 2 ही पैदा किए 20 क्यों नहीं पैदा किए?”

मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत ने कोविड काल में कम राशन मिलने को कम बच्चे पैदा करने की ‘सज़ा’ बता गये। बिना नाम लिए एक धर्म विशेष के लोगों को उन्होंने जनसंख्या बढ़ाने का जिम्मेदार ठहराया है तो अन्य धर्म के लोगों को जनसंख्या बढ़ाने के लिए प्रेरित भी किया है। निश्चित रूप से यह राजधर्म नहीं है। मगर, सवाल यह है कि क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राजधर्म की चिंता लेकर ठीक वैसे ही उत्तराखंड के सीएम को समझाने के लिए आगे आएंगे जैसे कभी प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने गुजरात के सीएम को समझाया था? तब गुजरात में गोधरा कांड के बाद जो दंगे हुए थे उस वक्त सरकार पर निष्क्रिय रहते हुए एक धर्म विशेष के लोगों के कत्लेआम में भूमिका निभाने के आरोप लग रहे थे। (हालांकि यह आरोप कानूनी रूप से कभी पुष्ट नहीं हो सके)

गुजरात दंगे में सुप्रीम कोर्ट से गठित एसआईटी से क्लीन चिट मिलने का जिक्र करते हुए 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले 2013 में मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने सफाई दी थी। इस सफाई पर भी हंगामा बरप गया। वास्तव में उन्होंने मुसलमानों की तुलना पिल्ले से कर दी थी। नरेंद्र मोदी ने कहा था, “एक और बात, कोई दूसरा गाड़ी चला रहा है और हम पीछे बैठे हैं। और अगर अचानक से कोई पिल्ला भी गाड़ी के नीचे आ जाए तो क्या दुख नहीं होता? बिल्कुल होता है….”

तीरथ समाजशास्त्र-नैतिकशास्त्र में निपुण तो मोदी इतिहास और विज्ञान में!

तीरथ सिंह अपनी भावना को व्यक्त कर रहे हैं। वे आश्चर्य जता रहे हैं कि लड़कियां फटी जीन्स पहनें और समाज सेवा करें यह कैसे मुमकिन है! पुरुषवादी सोच की विरासत को आगे बढ़ाने वाले इस आश्चर्य को नहीं समझ पाएंगे। वास्तव में इस आश्चर्य पर आश्चर्य करने वालों पर वे आश्चर्य करेंगे। चलिए यह तो समाजशास्त्र और नैतिकशास्त्र की बात हुई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी में तो इन विशेषताओं के अतिरिक्त वैज्ञानिक नज़र भी दिखती है।

बालाकोट हमले के बाद एक इंटरव्यू में पीएम मोदी कहते हैं, “विशेषज्ञ (हमले की) तारीख बदलना चाहते थे, लेकिन मैंने कहा कि इतने बादल हैं, बारिश हो रही है तो एक फ़ायदा है कि हम रडार (पाकिस्तानी) से बच सकते हैं, सब उलझन में थे क्या करें। फिर मैंने कहा बादल है, जाइए… और (जवान) चल पड़े…”

प्रधानमंत्री बनने के बाद भी नरेंद्र मोदी ने समय-समय पर इतिहास के प्रति अपने चौंकाने वाले ज्ञान से देश को परिचित कराया है। 09 मई 2018 को कर्नाटक विधानसभा चुनाव के दौरान बीदर की रैली पीएम मोदी ने कहा था, “जब देश की आज़ादी के लिए लड़ रहे शहीद भगत सिंह, बटुकेश्वर दत्त, वीर सावरकर जैसे महान लोग जेल में थे, तब क्या कांग्रेस का कोई नेता उनसे मिलने गया था? लेकिन अब कांग्रेस के नेता जेल में बंद भ्रष्ट नेताओं से मिलते हैं।” काश! पीएम मोदी ने पंडित नेहरू की आत्मकथा और इतिहास में दर्ज दैनिक ट्रिब्यून में छपी खबरें कहीं देखी या पढ़ी होती!

28 जून 2018 को संत कबीर की 620 वीं पुण्यतिथि पर यूपी के संत कबीर नगर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था, “महात्मा कबीर को उनकी ही निर्वाण भूमि से मैं एक बार फिर कोटि कोटि नमन करता हूं। ऐसा कहते हैं कि यहीं पर संत कबीर, गुरुनानक देव और बाबा गोरखाथजी ने बैठकर के आध्यात्मिक चर्चा की थी। “सच ये है कि बाबा गोरखनाथ का जन्म 11वीं शताब्दी में, कबीरदास का जन्म 14वीं शताब्दी में और गुरुनानक का जन्म 16वीं शताब्दी में हुआ था।

राम-कृष्ण की तरह पूजे जाएंगे मोदी तो तीरथ कैसे रखे जाएंगे याद?

देवभूमि उत्तराखण्ड की पावन धरती से मुख्यमंत्री के पास एक अलग किस्म की दृष्टि भी है। वे बताते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राम-कृष्ण जैसे हैं। वे आगे कहते हैं कि अपने सामाजिक कामों की वजह से नरेंद्र मोदी आने वाले दिनों में वैसे ही भगवान की तरह पूजे जाएंगे जैसे राम और कृष्ण को लोग पूजते हैं। तीरथ सिंह को अभी मुख्यमंत्री बने दो हफ्ते भी नहीं हुए हैं। ‘होनहार बिरवान के होत चिकने पात’ वाली कहावत चरितार्थ होती दिख रही है। उम्मीद की जानी चाहिए कि आने वाले समय में तीरथ सिंह रावत से और भी ज्ञानवर्धक जानकारियां मिलती रहेंगी। निश्चित रूप से यह कौतूहल बना रहेगा कि अगर नरेंद्र मोदी की पूजा राम-कृष्ण की तरह होगी तो तीरथ सिंह रावत किस तरह याद रखे जाएंगे।

नरेंद्र मोदी ने जिस तरह अपने ज्ञानभंडार से समय-समय पर देश और दुनिया का ज्ञानवर्धन किया है उस परंपरा को तीरथ सिंह भी बढ़ाएंगे, इस बात का यकीन आपको हो जाएगा अगर आप श्री मोदी के कुछेक और बयानों पर गौर करेंगे-

  • नवंबर 2003 में महात्मा गांधी को मोहनलाल करम चंद गांधी बताया। (असल नाम मोहनदास करमचंद गांधी)
  • नवंबर 2003 में बंगलौर में नरेंद्र मोदी ने कहा था कि 15 अगस्त को प्रधानमंत्री का भाषण लाल दरवाजे से होता है। (प्रधानमंत्री बनने के बाद तो नरेंद्र मोदी जान ही गये होंगे कि यह भाषण लाल दरवाजे से न होकर लालकिले से होता है।)
  • 2013 में पटना में नरेंद्र मोदी ने कहा था “नालंदा और तक्षशिला जैसे शिक्षण संस्थान बिहार के गौरव रहे हैं।” जबकि, तक्षशिला बिहार में नहीं आज के पाकिस्तान में है।
  • पटना में ही उसी रैली में नरेंद्र मोदी ने कहा था, “जब हम गुप्त साम्राज्य की बात करते हैं तो हमें चंद्रगुप्त की राजनीति की याद आती है। “जबकि, इतिहास का बच्चा-बच्चा जानता है कि चंद्रगुप्त मौर्य वंश के संस्थापक थे न कि गुप्त वंश के थे।
  • पटना में ही नरेंद्र मोदी ने कहा कि सिकंदर की सेना ने पूरी दुनिया जीत ली थी लेकिन जब उन्होंने बिहारियों से पंगा लिया तो उसका क्या हश्र हुआ…यहां आकर वो हार गये। सच यह है कि सिकंदर की सेना ने कभी गंगा पार किया ही नहीं।
  • दिसंबर 2013 में जम्मू की रैली में नरेंद्र मोदी ने कहा था कि मेजर सोमनाथ शर्मा को महावीर चक्र और ब्रिगेडियर रजिंदर सिंह को परमवीर चक्र मिला। जबकि, सच्चाई यह है कि वे उल्टा बोल गये थे।
  • फरवरी 2014 में नरेंद्र मोदी ने मेरठ में कहा था कि कांग्रेस ने आज़ादी की पहली लड़ाई को कम करके आंका था। (सच यह है कि 1857 में कांग्रेस का जन्म भी नहीं हुआ था।)
  • 23 जनवरी 2018 को दावोस में विश्व आर्थिक मंच से पीएम मोदी ने कहा, “भारत के 600 करोड़ मतदाताओं ने 2014 में 30 साल बाद पहली बार किसी एक राजनीतिक पार्टी को केंद्र में सरकार बनाने के लिए पूर्ण बहुमत दिया..” भारत की जनसंख्या 140 करोड़ है।
  • कर्नाटक विधानसभा चुनाव के दौरान ही पीएम मोदी ने कहा था 1947-48 की लड़ाई में जनरल थिमैया के नेतृत्व में हमने लड़ाई जीती थी लेकिन जिस आदमी ने कश्मीर को बचाया उसका नेहरू और रक्षा मंत्री कृष्ण मेनन ने अपमान किया। सच यह है कि 1947-48 की लड़ाई का नेतृत्व ब्रिटिश सर फ्रांसिस बुचर ने किया था। 1957 में जनरल थिमैया सेनाध्यक्ष बने। 1959 में मतभेद के बाद थिमैया ने इस्तीफे की पेशकश की जिसे नेहरू ने अस्वीकार कर दिया था।

नरेंद्र मोदी हों या फिर तीरथ सिंह रावत दोनों का संबंध समान राजनीतिक परंपराओं और विरासत से है। एक मुख्यमंत्री के तौर पर अपने कदम बढ़ाने को शुरू हुए हैं तो दूसरे इससे आगे बढ़ते हुए प्रधानमंत्री तक जा पहुंचे हैं। मगर, भाषा, सोच, शैली और अभिव्यक्ति के मामले में दोनों ही नेता समान नज़र आते हैं। ऐसे में हास्यास्पद बयानों पर किसी तरह से अंकुश लगने की उम्मीद नहीं के बराबर है।प्रेम कुमार का है। वरिष्ठ पत्रकार हैं दिल्ली में रहते हैं।

प्रेम कुमार (वरिष्ठ पत्रकार हैं दिल्ली में रहते हैं।)

This post was last modified on March 23, 2021 9:54 am

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