इंसान के सवाल पर कुत्तों के बच्चों की मिसाल क्यों देते हैं भाजपा नेता

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इंसान और इंसानियत के सवाल पर सत्ता में बैठे भाजपा के लोग कुत्ते के बच्चे की मिसाल देते हैं। इसकी एक परंपरा भी है उनके यहां जिसमें केंद्रीय मंत्री वी के सिंह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक के नाम शमिल हैं।

ताजा मामला भुखमरी सूचकांक में भारत के 94 वें रैंक से जुड़ा हुआ है। दरअसल 19 मार्च को राज्यसभा में भुखमरी सूचकांक 2020 में भारत का स्थान 94 वां रहने को लेकर सदन का ध्यान आकर्षिक करवाते हुए आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह ने राज्यसभा में सवाल किया कि जब हम उत्पादन में 10 वें नंबर पर हैं तो वितरण में क्या समस्या है कि देश भूखमरी की समस्या को दूर करने में सफल नहीं हो रहा हैं? जवाब देते हुए कृषि राज्य मंत्री पुरुषोत्तम रूपाला ने कहा कि यह जो आंकड़ा है वो किसी एनजीओ (NGO) ने दिया है। हमने उनसे इस मामले में रिपोर्ट देने के लिए कहा है। साथ ही उन्होंने कहा कि कोई विदेशी एनजीओ (NGO) आकर सर्वेक्षण कर के चले जाए तो उसपर अधिक संवदेनशील होने की जरूरत नहीं है।

इसके आगे केंद्रीय मंत्री ने सदन में कहा कि – “मैं अपना निजी अनुभव बताना चाहता हूं। हमारे यहां तो गलियों में जब आवारा कुत्ते के भी बच्चे होते हैं तो हमारी माताएं बहने उन्हें खाना खिलाने के लिए जाती है। ऐसी परंपरा है इस देश में। तो ऐसे समाज में बच्चों के भूखे रहने का आकलन कोई और करके दे ये तो ठीक नहीं है। हट्ठे-कट्ठे बच्चे को भुखमरी में गिना जा रहा है।

मंत्री पुरुषोत्तम रूपाला ने आगे कहा कि – “हमारे यहां खाने की समस्या नहीं है। और न ही स्टॉक (Stock) की समस्या है। इस समस्या को लेकर समाज में जागृति लाने के लिए हमारी मंत्री स्मृति ईरानी ने योजना चलाई है।”

नरेंद्र मोदी व वी के सिंह का कुत्ते के बच्चे वाला बयान

इससे पहले जुलाई 2013 में न्यूज एजेंसी रॉयटर्स से एक इंटरव्यू में जब गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी से सवाल किया कि “क्या जो कुछ हुआ उसका उन्हें दुख है?

इसके जवाब में नरेंद्र मोदी ने कहा था – “दुख तो होता ही है। अगर कुत्ते का बच्चा भी कार के नीचे आ जाए तो भी दुख होता है।”

मोदी से पूछा गया कि क्या उन्हें गुजरात दंगों पर पछतावा है, तो उन्होंने कहा, ‘मैं आपको बताना चाहता हूं भारत का सुप्रीम कोर्ट दुनिया के सबसे अच्छे कोर्ट में गिना जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने एसआईटी (SIT) बनाई और उसमें सबसे काबिल अफसरों को रखा गया। एसआईटी (SIT) की रिपोर्ट में मुझे क्लीन चिट मिली। एक और चीज, अगर कोई व्यक्ति या हम कार चला रहे हैं या कोई ड्राइव कर रहा है और हम पीछे बैठे हैं, फिर भी छोटा सा कुत्ते का बच्चा भी अगर कार के नीचे आ जाता है तो हमें पेन फील होता है कि नहीं?… होता है। मैं अगर मुख्यमंत्री हूं या नहीं भी हूं। मैं पहले एक इंसान हूं और कहीं पर भी कुछ बुरा होगा तो दुख होना बहुत स्वाभाविक है।’

अक्टूबर 2015 में केंद्रीय मंत्री वी के सिंह ने बल्लभगढ़ में दलित बच्चों की जलाकर हत्या वाली घटना पर प्रधानमंत्री की चुप्पी पर उठते सवालों के संदर्भ में कहा था की- “क्षेत्रीय और स्थानीय मुद्दों को केंद्र सरकार से जोड़ना ठीक नहीं है। यह एक पारिवारिक मामला था। हर मुद्दे पर केंद्र सरकार को कोसना बंद करें। कोई कुत्ते को पत्थर मार दे, उसमें केंद्र सरकार क्या कर सकती है।”

आखिर इसका क्या कारण है कि सत्ता में बैठे लोग इंसानों के सवाल पर कुत्ते के बच्चे से देते हैं। तो इसका सीधा सा सवाल है इनकी सवर्णवादी बर्बर चेतना। आप यहां ये कह सकते हैं कि नरेंद्र मोदी तो बैकवर्ड (backward) हैं। लेकिन नरेंद्र मोदी लंबे समय तक आरएसएस में रहे हैं जहां उनकी मानसिक और वैचारिक कंडीशनिंग ब्राह्मणवादी खांचे में की गई है। ब्राह्मणवाद दलित, मुस्लिम, और भुखमरी को अभिशप्त हाशिये का समाज के लोगों को कुत्तों से भी बदतर समझता हैं। यदि किसी ने भी ब्राह्मण परंपरा को नजदीक से देखा होगा तो जानता होगा कि ब्राह्मण लोग कुत्ते (गाय, कौआ, कुत्ता) के लिए ‘अगराशन’ निकालते हैं और सादर खिलाते हैं जबकि दलित, मुस्लिम, और हाशिये के आदिवासी समाज के लोगों को इंसान की मान्यता ही नहीं देते।

अब उपरोक्त तीनों भाजपा नेताओं का बयान किनके संदर्भ में दिया गया है अगर देखें तो कृषि राज्य मंत्री पुरुषोत्तम रूपाला का बयान हाशिये के समाज के लोगों जो भुखमरी के शिकार होते हैं पर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का बयान गुजरात दंगों में मारे गये मुस्लिम समुदाय के लोगों और केंद्रीय मंत्री वी के सिंह का बयान दलित समाज के सवाल पर बोलते हुए आया है। दरअसल आप कितना भी शराफ़त का ढोंग करें आपकी भाषा में आने वाले रूपक और उपमाएं  आपकी शराफत को नंगा कर ही देते हैं।

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