Thursday, December 9, 2021

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हिन्दू नववर्ष पर विशेष (अन्तिम भाग):संविधान में भारतीय तिथि क्यों नहीं लिखी गयी?

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जैसे पृथ्वी की श्वेत-श्याम कला को दिन और रात का नाम मिला, वैसे ही चन्द्रमा के इसी स्वरूप को शुक्ल और कृष्ण पक्ष कहा गया। शक सम्वत की तरह भारत में बेहद प्रचलित विक्रम सम्वत में भी महीने तो 12 ही हैं, महीनों के नाम और उनका क्रम भी एक जैसा ही है, लेकिन विक्रम सम्वत की तिथियाँ 15-15 दिन के दो पखवाड़ों यानी पक्षों तक सीमित हैं, इसीलिए ये चन्द्र-मासी या ‘Lunar Calendar’ कहलाता है। सूर्य वर्ष आधारित गणना में जहाँ साल भर बाद पृथ्वी और सूर्य, पुरानी दशा में लौटते हैं, वहीं चन्द्र मास आधारित कैलेंडर में हर वर्षगांठ के दिन चन्द्रमा की दशा अलग-अलग होती है।

शक सम्वत और विक्रम सम्वत में अन्तर

शक सम्वत में चन्द्रमा और पृथ्वी दोनों की गणनाएँ शामिल हैं, इसीलिए इसे ‘Luni-Solar’ पंचांग कहा गया। जबकि विक्रम सम्वत सिर्फ़ चन्द्र-मास पर आधारित है, इसीलिए इसे ‘Lunar’ पंचांग कहा गया। दोनों सम्वतों में महीनों के नाम और उनका क्रम एक ही है। दोनों के चन्द्र मास में एक अमावस्या और एक पूर्णिमा है। इनके दिन भी दोनों में एक ही हैं। लेकिन इस दिन की तिथियाँ अलग-अलग हैं। शक सम्वत की तिथियाँ ग्रेगोरियन कैलेंडर की तरह 01 से 31 तक हैं तो विक्रम सम्वत की तिथि 01 से 15 तक ही है। इसीलिए विक्रम सम्वत की तिथियों में महीने के नाम के साथ शुक्ल पक्ष या कृष्ण पक्ष का उल्लेख अनिवार्य है।

महीने की शुरुआत शुक्ल पक्ष से होगी या कृष्ण पक्ष से? इस सवाल पर दोनों सम्वत परस्पर उल्टे हैं। शक सम्वत में अमावस्या के अगले दिन यानी नये चाँद के उगने से लेकर उसके अमावस्या तक के सफ़र को चन्द्र मास माना गया है। जबकि विक्रम सम्वत में पूर्णिमा के बाद आने वाले शुक्ल पक्ष को पहला पखवाड़ा माना जाता है। कृष्ण पक्ष, दूसरा पखवाड़ा है जो अगली पूर्णिमा तक जाता है। दूसरे शब्दों में, शक सम्वत में पहली से 15वीं तिथि वाला पखवाड़ा कृष्ण पक्ष है तो 16वीं से 30 या 31वीं तिथियाँ शुक्ल पक्ष का हिस्सा हैं।

विक्रम सम्वत का नया महीना फाल्गुन की पूर्णिमा के बाद वाले शुक्ल पक्ष से शुरू होता है, लेकिन इसके वर्ष की संख्या चैत्र कृष्ण पक्ष की पहली तिथि से बदलती है। दोनों सम्वत, चैत्र नवरात्रि के आगमन को हिन्दू पंचांग का पहला दिन मानते हैं। लेकिन शक सम्वत में ये तिथि ‘01 चैत्र’ होती है, तो विक्रम सम्वत में ये उसके नये साल का 16वाँ दिन होता है और इसकी तिथि ’01 चैत्र कृष्ण पक्ष’ कहलाती है। विक्रम सम्वत में यही विसंगति हमेशा बनी रहती है। विक्रम सम्वत में दिवाली (कार्तिक अमावस्या) के अगले दिन से शुरू होने वाले शुक्ल पक्ष को भी नये साल का दर्ज़ा हासिल है। इसीलिए व्यापारी समुदाय उस दिन अपना बही-ख़ाता बदलते हैं।

शक सम्वत कब बना सरकारी कैलेंडर?

विक्रम सम्वत की ख़ामियों के बारे में मेघ नाथ साहा ने लिखा है कि “विक्रम सम्वत के महीने चन्द्र-मासी हैं। इसका पहला महीना चैत्र है। इसके महीने पूर्णिमा के अगले दिन से शुरू होते हैं। इसके वर्ष की शुरूआत फाल्गुन की पूर्णिमा के 15 दिन बाद अर्थात् चैत्र अमावस्या के अगले दिन से होती है। लेकिन खगोलीय गणनाओं के लिए इसे जिस सौर वर्ष से जोड़ा गया है वो शक सम्वत के सौर-बैसाख का पहला दिन है, जबकि सिद्धान्ततः 20-21 मार्च को बसन्त के आगमन ही वो दिन है जब रात-दिन बराबर होते हैं।”

तमाम ख़ामियों और उलझनों के बावजूद विक्रम सम्वत भारत के बड़े इलाके में आज भी बहुत प्रचलित है। नेपाल का तो यही राष्ट्रीय पंचांग है। शक सम्वत को 21 मार्च 1956 को भारतीय पंचांग का दर्ज़ा मिला। इससे पहले, शायद विक्रम सम्वत को ही अघोषित सरकारी कैलेंडर का दर्ज़ा हासिल था। तभी तो भारतीय संविधान की प्रस्तावना में उसे अपनाये जाने की तारीख़ ‘26 नवम्बर 1949 ईसवी’ के लिए विक्रमी सम्वत की तिथि ‘7 मार्गशीर्ष शुक्ल 2006 विक्रमी’ का इस्तेमाल हुआ है। संविधान लागू होने के कई साल बाद तक ही विक्रमी सम्वत का सरकारी कामकाज में इस्तेमाल हुआ। लेकिन 21 मार्च 1956 के बाद से सरकारी अभिलेखों में शक सम्वत का ही इस्तेमाल होता है।

ज्योतिष पंचांग और मुहुर्त

शब्दकोश की दृष्टि से कैलेंडर, सम्वत और पंचांग एक ही हैं। ज्योतिषीय पंचांग में काल-गणना के पाँचों अंगों – तिथि, योग, करण, वार और नक्षत्र का विस्तृत ब्यौरा होता है। हरेक अंग की गणना के पैमाने भी अलग-अलग हैं, जो सूर्य, इसके ग्रहों और चन्द्रमा की कलाओं के अनुसार की जाती हैं। ज्योतिषीय पंचांग में एक तिथि की अवधि 19 से 24 घंटों तक हो सकती है। इसीलिए हिन्दुओं के पर्व-त्योहारों और मांगलिक कार्यों के लिए शुभ मुहुर्त का वक़्त बदलता रहता है। आमतौर पर जन्म-कुंडली बनाने और शुभ-मुहुर्त जानने के लिए इसी पंचांग का सहारा लिया जाता है। इसकी मान्यता है कि मांगलिक कार्यों के लिए शुक्ल पक्ष ही उपयुक्त है।

सम्वत का संक्षिप्त इतिहास

हिन्दुओं का सबसे प्राचीन पंचांग ‘सप्तऋषि सम्वत’ था। इसका काल छठी से तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व का माना गया। आगे चलकर कृष्ण कैलेंडर और कलियुग सम्वत का युग भी आया। लेकिन सबसे वैज्ञानिक और तार्किक कैलेंडर शक सम्वत को ही माना गया। कुषाण राजवंश के राजा कनिष्क के राजतिलक वाले दिन, 78 ईसवी से इसकी शुरुआत हुई। इसीलिए इसकी वर्ष संख्या ग्रेगोरियन कैलेंडर के वर्ष से 78 अंक कम है। इसे शालिवाहन शक सम्वत भी कहते हैं। इससे 135 साल पुराना है विक्रम सम्वत। इसे 57 ईसा पूर्व में मौर्यवंश के शासक चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य ने शुरू करवाया था।

उस युग में ‘देसी-विदेशी’ परिभाषित नहीं था। आगे चलकर शक को विदेशी और विक्रम को देसी बताने की भ्रान्ति फैली। विक्रम सम्वत का नाता उस विक्रमादित्य से जोड़ा गया जो उज्जैन का राजा था और कालिदास, जिसके दरबारी थे। लेकिन मेघ नाथ साहा की रिपोर्ट में तमाम सबूत देकर तय किया कि विक्रम सम्वत को चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य ने ही शुरू करवाया था। ‘विक्रमादित्य’ कई मौर्यवंशीय राजाओं की उपाधि थी। विक्रम सम्वत के बाद 45 ईसा पूर्व में लागू हुआ जुलियन कैलेंडर ख़ासा उन्नत था। इसीलिए माना गया कि शक सम्वत के बनने तक खगोल शास्त्र इतना उन्नत हो चुका था कि 500 साल बाद भी वराहमिहिर और आर्यभट्ट जैसे गणितज्ञों ने इसे ही अपनी गणनाओं का आधार बनाया।

भारतीय महीने और ऋतुएँ

पृथ्वी अपने अक्ष से 23.5 अंश झुकी हुई। ये घड़ी की सूईयों से उल्टा घूमती है। घूमने से दिन-रात बने तो झुकाव से बना मौसम यानी ऋतुएँ। वैदिक काल में ही सिन्धु और गंगा के मैदानी इलाकों की जलवायु को दो-दो महीनों वाली छह ऋतुओं में बाँटा गया। हालाँकि, दक्षिणी प्रायद्वीप और उत्तर के पहाड़ी इलाकों में सभी ऋतुओं का अहसास नहीं होता। भारतीय महीनों का हरेक जोड़ा (युग्म) एक मौसम की अवधि भी है।

भारतीय पंचांग में चैत्र (चैत) और बैशाख महीनों के युग्म से वसन्त ऋतु बनी। इसके बाद ज्येष्ठ (जेठ) और आषाढ़ के जोड़े से ग्रीष्म ऋतु बनी। श्रावण (सावन) और भाद्रपद (भादो) को मिलाकर वर्षा (प्रावृष्) ऋतु बनी। चौथी ऋतु है शरद। इसके महीने हैं आश्विन (क्वार) और कार्तिक। पाँचवाँ मौसम है हेमन्त। इसके महीने हैं मार्गशीर्ष (अगहन) और पौष (पूस)। साल की छठी और आख़िरी ऋतु है शिशिर तथा इसके महीने हैं माघ और फाल्गुन (फागुन)।

भारतीय महीनों और ऋतुओं के नाम याद करने का नुस्ख़ा

भारतीय महीनों के स्थानीय उच्चारण का जोड़ा बनाकर इसे आसानी से याद कर सकते हैं। जैसे, चैत-बैसाख, जेठ-असाढ़, सावन-भादो, आसिन-कातिक, अगहन-पूष, माघ-फागुन। इसी तरह छह ऋतुओं के युग्म को भी क्रमवार याद करें। वसन्त-ग्रीष्म, वर्षा-शरद और हेमन्त-शिशिर।

नोट- इसका पहला भाग नीचे दिए गए लिंक पर जाकर पढ़ा जा सकता है।

चैत्र को आखिर क्यों माना जाता है सम्वत का पहला महीना? (janchowk.com)

(मुकेश कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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