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चिराग पासवान खुद को शंबूक के बजाय शबरी का क्यों कह रहे हैं वंशज?

2 अगस्त को एक के बाद एक ट्वीट करते हुए लोक जनशक्ति पार्टी के अध्यक्ष चिराग पासवान ने खुद को शबरी का वंशज कहा और दशरथ पुत्र राम के प्रति शबरी के भक्तिभाव को प्रदर्शित करने वाली पेंटिंग्स साझा की। उन्होंने अपने ट्वीट में लिखा कि- “वंचित वर्ग से आने वाली गुरु मतंग की शिष्या श्रीराम की परम भक्त माता शबरी का वंशज होने के नाते, मेरा यह सौभाग्य है कि मेरे जीवन-काल में पुन: मंदिर का निर्माण होने जा रहा है।

कुछ ही देर बाद अपने दूसरे ट्वीट में उन्होंने लिखा कि मतंग ऋषि की शिष्या माता शबरी को सभी सिद्धियां प्राप्त थीं, इसके बावजूद उनमें तनिक भी अहंकार भाव नहीं था। यह माता शबरी के भक्ति भाव का असर था कि बिना संकोच के भगवान राम ने माता शबरी के जूठे बेर खाए।” उन्होंने अपने आखिरी ट्वीट में लिखा कि भगवान राम ने शबरी की तुलना माता कौशल्या से की थी। उन्होंने यह भी कहा कि मंदिर निर्माण के साथ ही भगवान राम के विचारों को अपनाने की जरूरत है।

चिराग पासवान के कथनों के राजनीतिक-वैचारिक निहितार्थ निकालने से पहले देखते हैं कि दशरथ पुत्र राम की उत्तर भारत में सबसे लोकप्रिय कथा तुलसीदास के राम चरित मानस में तुलसी ने शबरी को किस रूप में प्रस्तुत किया है।

राम चरित मानस की शबरी स्वयं कहती हैं कि वह अधम (नीच) जाति की हैं और जड़मति (मूर्ख) हैं-

  केहि विधि अस्तुति करौं तुम्हारी। अधम जाति मैं जड़मति भारी॥

                                      ( रामचरित मानस,अरण्य कांड)

इतने ही पर वह नहीं रूकतीं, वह खुद को नीचों में भी नीच कहती हैं, क्योंकि वह जाति से अधम तो हैं ही, नारी भी हैं और मूर्ख ( मतिमंद) भी हैं-

    अधम ते अधम अधम अति नारी। तिन्ह महँ मैं मतिमंद अघारी॥

                                            (रामचरित मानस,अरण्य कांड)

हम सभी जानते हैं कि किसी भी रचना का पात्र वही बोलता है, जो उसका लेखक उससे बुलवाना चाहता है। शबरी के बयान असल में तुलसी के बयान हैं। शबरी के माध्यम से जिस श्रीराम का भक्त खुद को चिराग पासवान घोषित कर रहे हैं, उन्होंने (राम ने) शबरी के कथनों का प्रतिवाद नहीं किया है, उन्होंने सिर्फ यह कहा है कि भले ही तुम अधम हो लेकिन चूंकि तुम मेरी भक्त हो, इसलिए तुम मुझे प्रिय हो-

जाति पाँति कुल धर्म बड़ाई। धन बल परिजन गुन चतुराई॥

भगति हीन नर सोहइ कैसा। बिनु जल बारिद देखिअ जैसे॥

पहली बात यह है कि सच में चिराग पासवान खुद को अधम में भी अधम मानने वाली शबरी का वंशज मानते हैं क्या? निश्चित तौर पर वे खुद को ऐसा (अधम) नहीं मानते होंगे। फिर वे कैसे खुद को शबरी का वंशज कह रहे हैं?

दूसरी बात यह कि खुद तुलसी ने साफ शब्दों में कहा है कि राम ने ब्राह्मणों और गाय के हितों के लिए जन्म लिया-

      विप्र धेनु  सुर-संत हित लीन्ह मनुज अवतार।

      निज इच्छा निर्मित तनु माया गुन गो पार।।

इतना ही नहीं स्वयं राम ने कहा है कि उन्हें मनुष्यों में द्विज (जनेऊधारी सवर्ण) प्रिय हैं-

          सब मम प्रिय सब मम उपाजए।

          सबसे अधिक मनुज मोंहि भाए।।

          तिन्ह महं द्विज द्विज मह श्रुतिधारी।

चिराग पासवान जी आप तो न द्विज हैं, न श्रुतिधारी हैं, फिर तो राम की नजर में आप दोयम दर्जे की ही ठहरे। आप कैसे ऐसे राम का अनुयायी खुद को घोषित कर रहे हैं।

चिराग जी आप अपने अनुभव से एक चीज जानते होंगे कि दशरथ पुत्र राम जिस क्षत्रिय वंश में जन्म लिए हैं और जिन द्विजों (उच्च जातियों) के वे प्रतिनिधि हैं, वे भी अपने आदर्श एवं आराध्य राम की ही, तरह उन सभी दलित-पिछड़ों को अपनाने के लिए तैयार हैं, जो खुद को शबरी की तरह अधम मानने को तैयार हों, उनकी भक्ति ( चापलूसी) करें और शबरी की तरह उनका पांव पखारने को तैयार हों।

राम को आदर्श और आराध्य मानने वाले द्विजों के लिए सिर्फ वे ही दलित-पिछड़े नफरत और घृणा के पात्र हैं, जो खुद को द्विजों ( उच्च जातियों) से किसी तरह कम नहीं मानते हैं और हर स्तर पर बराबरी-समानता की मांग करते हैं। आज भी द्विज वर्ण-व्यवस्था का उल्लंघन कर बराबरी की मांग करने वाले दलितों के साथ ऐसे सवर्ण शंबूक की तरह ही व्यवहार करते हैं। कभी घोड़े की सवारी करने पर, कभी बुलेट पर चलने पर, कभी मूंछ रखने पर और अनुलोम अंतर जातीय शादी कर लेने पर।

चिराग जी शबरी वर्ण-जातिवादी द्विज मूल्य-मान्यताओं के सामने समर्पण की प्रतीक हैं। हां, शंबूक जरूर प्रतिवाद एवं प्रतिरोध के प्रतीक हैं। जिनकी निर्मम हत्या आपके आदर्श एवं अराध्य दशरथ पुत्र श्रीराम ने अपनी तलवार से उनकी गला काट कर किया था। जिनका अपराध यह था कि उन्होंने वर्ण-व्यवस्था के नियमों का उल्लंघन करके आध्यात्मिक साधना (तपस्या) करने की जुर्रत की, जिस पर ब्राह्मणों और अन्य द्विजों का दैवीय विशेषाधिकार था। उनकी हत्या पर देवताओं ने फूलों की वर्षा की और ब्राह्मणों एवं ऋषियों ने शंबूक की हत्या करने के लिए राम का गुणगान एवं आवभगत किया।( गीता प्रेस द्वारा प्रकाशित वाल्मीकि रामायण खंड-2 के उत्तरकांड के पृष्ठ 854 से 859 पृष्ठों के बीच देख सकते हैं। )

चिराग जी एक बात और यदि राम अयोध्या में पैदा हुए थे और वहीं के राजा थे, तो इसका सीधा अर्थ है कि शंबूक भी अयोध्या के ही निवासी रहे होंगे। जिस अयोध्या में निर्दोष शंबूक का वध हुआ हो, वह कैसे पवित्र हो सकती है। निर्दोष शंबूक की राम द्वारा क्रूर एवं निर्मम तरीके से हत्या के अपराध एवं अन्याय के सुधार का एक ही उपाय हो सकता था, वह यह कि शंबूक के हत्यारे राम को भी उसी के अनुरूप दंड मिलता। और अन्याय का प्रतिवाद एवं प्रतिरोध करने वाले शंबूक की शहादत को सलाम करते हुए उनकी शानदार प्रतिमा अयोध्या में बनाई जाती ।

कहां आपको खुद को शंबूक और उनके वंशजों के साथ जोड़ना चाहिए और वर्ण-जाति व्यवस्था के खिलाफ प्रतिवाद एवं प्रतिरोध की फुले-आंबेडकर की परंपरा को आगे बढ़ाना चाहिए था, लेकिन आप ने उलटा किया और खुद को नीच में भी नीच कहने वाली शबरी के साथ जोड़कर बड़े पैमाने पर उच्च जातियों के नए सिरे से बढ़ते वर्चस्व के सामने समर्पण कर दिया। और उन्हें साफ संकेत दे दिया कि हम आप से समानता-बराबरी की मांग नहीं कर रहे हैं, बल्कि शबरी की तरह आपकी भक्ति करने और आपको आदर्श एवं आराध्य मानने को तैयार हैं, बशर्ते आप मुझे स्वीकार कर लें।

चिराग पासवान जी मुझे नहीं मालूम आपने ऐसा बयान क्यों दिया? मुझे लगता है कि खुद को आपने शबरी का वंशज घोषित एक तीर से कई निशाने साधने चाहे । पहला तो यह कि आप इस देश के मालिक संघ ( आरएसएस) को यह संकेत देना चाह रहे हों, कि मैं उन दलितों में नहीं हूं,जो खुद को शंबूक का वंशज घोषित कर संघ के आदर्श एवं आराध्य दशरथ पुत्र श्रीराम को चुनौती देते हैं और न ही मैं डॉ. आंबेडकर का अनुयायी हूं, जो श्रीराम को किसी भी तरह से ईश्वर एवं आराध्य मानने को तैयार नहीं थे और जिनकी 22 प्रतिज्ञाओं में से दूसरी प्रतिज्ञा यह थी कि मैं राम और कृष्ण को न ईश्वर का अवतार मानूंगा, न ही उनकी पूजा करूंगा।

दूसरा शायद आप देश की राजनीतिक, सामाजिक एवं आर्थिक जीवन की मालिक उच्च जातियों को यह संकेत देना चाहते हों कि मैं आपकी श्रेष्ठता को स्वीकार करते हुए आपके साथ मिलकर काम करना चाहता हूं, मेरा आप से कोई विरोध नहीं है और न ही आप से पूर्ण समानता की मांग कर रहा हूं।

तीसरा बिहार के चुनावों में नीतीश जी आपकी पार्टी को एनडीए से किनारे लगाने के संकेत दे रहे हैं। भाजपा ने भी इसका कोई प्रतिवाद नहीं किया है। शायद आप अपनी डूबती नैया को राम और उच्च जातियों के सहारे पार लगाना चाहते हैं।

खैर जो भी हो, खुद को शबरी का वंशज कह कर, आप को वर्ण-जाति व्यवस्था को चुनौती दे रहे, दलित-बहुजनों की फुले-आंबेडकर की वैचारिक चेतना को कुंद करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए थी। लेकिन आपकी भी तो मजबूरी है, राजनीतिक सत्ता और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा की चाह क्या से क्या नहीं कराती है, कोई हाथी को गणेश कहने लगता है, रातों-रात बहुजन को सर्वजन में बदल देता है और नारा देता है- ब्राह्मण शंख बजाएगा, हाथी बढ़ता जाएगा। वैसे आप ने जो किया, वह क्षम्य भी है, आपके पिता या आप कभी भी फुले, पेरियार और डॉ. आंबेडकर के विचारों के पुरजोर अनुयायी नहीं रहे हैं, आपके पिता थोड़ा- बहुत थे भी, तो आज की हकीकत आपसे मांग कर रही है, कि आप उसे भी छोड़ दें।

जब बड़े-बड़ों ने संघ के नेतृत्व में सवर्ण जातियों के बढ़ते वैचारिक वर्चस्व के सामने समर्पण कर दिया, तो आप ही क्यों पीछे रहते। आखिर आपको भी किसी तरह सत्ता चाहिए, जिससे आपकी  और आपके परिवार की महत्वाकांक्षाएं पूरी हो सकें।

(डॉ. सिद्धार्थ जनचौक के सलाहकार संपादक हैं।)

This post was last modified on August 4, 2020 2:21 pm

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