उत्तर प्रदेश नगर निगम चुनाव: क्यों सपा, बसपा और कांग्रेस का दामन छोड़ रहे हैं मुसलमान?

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उत्तर प्रदेश में अब मुस्लिमों का भी एक तबका भाजपा के पक्ष में आ रहा है। यह खबर हैरान करने वाली लग सकती है, लेकिन यह एक कड़वी सच्चाई है। इस बारे में अभी तक कोई गहन सामाजिक विश्लेषण सामने तो नहीं आया है, लेकिन कुछ आंकड़े इसकी तस्दीक करते हैं।

उत्तर प्रदेश में 4 मई और 11 मई को विभिन्न नगर निगमों के चुनाव हुए। इसमें कुल 14,684 पदों को लेकर मुकाबला था। भाजपा ने इस बार 395 मुस्लिम उम्मीदवारों को चुनावी मैदान में उतारा। याद नहीं आता कि इससे पहले कब इतनी बड़ी संख्या में भाजपा ने किसी भी राज्य में मुसलमानों को प्रतिनधित्व प्रदान किया हो। इसमें से सभासद की सीट के लिए 358 उम्मीदवारों और नगर पंचायत के अध्यक्ष पद की 32 सीटों के लिए मुस्लिम उम्मीदवार खड़े किये गये। नगर पालिका अध्यक्ष पद के लिए भी भाजपा ने इस बार 5 मुस्लिम उम्मीदवार मैदान में उतारे थे।

कुल 14,684 पदों में 17 पद मेयर, 1,420 पद नगरपालिका सभासद, 199 पोस्ट नगर पंचायत के अध्यक्ष और नगरपालिका परिषद सदस्य के पद के लिए 5,327 सीट सहित नगर पंचायत अध्यक्ष के लिए 544 पद और नगर पंचायत सदस्य के लिए कुल 7,177 पद पर प्रमुख राजनीतिक दलों ने अपने उम्मीदवारों को मैदान में उतारा था। 

भाजपा सभी प्रारूपों में दमदार प्रदर्शन के बलबूते योगी सरकार की नीतियों के लिए जनता की ओर से दिया गया जनादेश बता रही है। लेकिन इस चुनाव ने कई नए प्रश्नों को खड़ा कर दिया है, जो यूपी ही नहीं बल्कि समूचे देश के भावी राजनीति को गहरे से प्रभावित करने जा रहे हैं। लेकिन इससे पहले एक नजर चुनाव के नतीजों और आंकड़ों पर डाल लेते हैं।

भाजपा ने सभी 17 मेयर पद सहित नगर निगम, नगर परिषद के अध्यक्ष एवं सभासद सदस्य पदों पर भारी विजय हासिल की है। नगर निगम पार्षद में भाजपा को कुल 813 सीट, सपा को 191, बसपा को 75, कांग्रेस को 77, ओवैसी की पार्टी के 19, राष्ट्रीय लोकदल के 10 और आम आदमी पार्टी के 8 उम्मीदवार जीते हैं। 206 निर्दलीय पार्षद जीते हैं, और इस प्रकार भाजपा के बाद निर्दलीय असल में किसी भी अन्य पार्टी से अधिक जीतकर आये हैं।

कांग्रेस बिना किसी तैयारी के भी 77 पार्षद और पार्षदी के चुनाव में 5.42% वोट पाकर प्रदेश की राजनीति में भारी उलट-फेर करने की संभावना रखती है। भाजपा को पार्षद चुनाव में 57.25%, सपा 13.45%, बसपा 5.99% और निर्दलीय 14.51% हिस्सेदारी हासिल कर पाए हैं। एआईएमआईएम ने मेयर पद पर कुछ स्थानों पर कमाल दिखाया है, और उसे अच्छे-खासे वोट हासिल हुए हैं। आम आदमी पार्टी ने भी अपनी उपस्थिति दर्ज करा पाने में सफलता हासिल की है। 

लेकिन सबसे बड़ा सवाल भाजपा द्वारा पहली बार बड़ी संख्या में मुस्लिम उम्मीदवारों को अपने उम्मीदवार के रूप में टिकट देने और 60 उम्मीदवारों को मिली जीत में देखा जा रहा है। फैजाबाद स्थित एक पत्रकार ने नाम उजागर न करने की शर्त पर जनचौक संवावदाता को बताया कि संघ की ओर से इस बारे में लंबे समय से विचार-विमर्श चल रहा था। इस बारे में दिल्ली और लखनऊ में कुछ वर्ष पहले गहन चिंतन हो चुका है।

मौजूदा दौर में भाजपा अपने चुनावी आधार में 2.5-4% वृद्धि को लेकर मुस्लिम समुदाय के बीच में अपनी पैठ को स्थायी बनाना चाहती है। यदि यह लक्ष्य हासिल हो जाता है तो भाजपा के ठोस 30% वोटों में मुस्लिम समुदाय से प्राप्त होने वाला यह मत प्रतिशत उसे अजेय बना देगा। ऊपर से भाजपा की सांगठनिक पकड़ और धन, बल, प्रचार, संचार माध्यम 5-10% फ्लोटिंग मतदाताओं को चुनावी समर में बड़े अंतर से जीत को सुनिश्चित करने में मदद पहुंचा सकते हैं।

इसके साथ ही इस चुनाव को भाजपा द्वारा निचले स्तर पर मुस्लिम नेतृत्व को अपने भीतर लाने के प्रयास के रूप में भी देखा जा रहा है। यह प्रयोग यदि सफल रहा तो इसे पसमांदा मुस्लिम के तौर पर देश भर में प्रयोग में लिया जायेगा। फिलहाल यूपी में इसे समाजवादी पार्टी की 2024 में किसी भी प्रकार के उलट फेर की संभावना पर पानी फेरने के रूप में आजमाया जा रहा है।

पिछले विधानसभा चुनावों में सपा भले ही बड़े अंतर से पीछे रह गई थी, लेकिन उसके वोट प्रतिशत में बड़ा उछाल आया था। यूपी में वोटों का ध्रुवीकरण भाजपा और सपा के इर्दगिर्द सिमट गया था, और कांग्रेस की महासचिव प्रियंका गांधी के ‘लड़की हूं, लड़ सकती हूं’ के नारे से जो बड़ी हलचल पैदा हुई थी, वह अंत में जाकर वोटों में तब्दील न हो सकी। नागरिकों के एक बड़े हिस्से ने इसे उत्तर प्रदेश में एक सकारात्मक पहल के रूप में लिया, लेकिन सपा की प्रदेश में मजबूत सांगठनिक वजूद ने मोदी-योगी विरोधी वोटों को अखिलेश के पक्ष में ध्रुवीकृत कर दिया था। 

कांग्रेस ने इसकी जो भी समीक्षा की हो, लेकिन आज उत्तर प्रदेश में एक ईमानदार, जुझारू, धर्म-निरपेक्ष राजनीतिक पार्टी की जितनी जरूरत है, उतनी शायद आजाद भारत में कभी रही हो। प्रियंका के नेत्तृत्व में ऐन चुनाव से पहले कांग्रेस ने एक कोशिश की, जिसे चुनावी नतीजों के बाद पूर्ण विराम लगा दिया गया। शुरूआती लटकों-झटकों के बाद अखिलेश यादव फिर से आरामगाह में जा चुके हैं।

भाजपा के भीतर भी अब योगी के नेतृत्व की तूती बोलती है, जो पिछले कार्यकाल में राज्य में नेताओं के बीच में लगातार सवालिया घेरे में बनी हुई थी। बाबा का बुलडोजर, माफिया का एनकाउंटर और कानून व्यवस्था के नाम पर पुलिस स्टेट में तब्दील हो चुके प्रदेश में 20% मुस्लिम आबादी के लिए लगातार खुद को सिमटाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा। समाजवादी पार्टी को लेकर अल्पसंख्यक वर्ग में गहरी निराशा है।

एक बड़े तबके ने मान लिया है कि उन्हें वोट बैंक से अधिक पार्टी नहीं मानती। यही स्थिति कमोबेश बसपा के भीतर भी है। मुस्लिम समुदाय के समृद्ध उम्मीदवारों को टिकट देकर मान लिया जाता है कि उनकी रहनुमाई हो गई। इन उम्मीदवारों से अपने चुनाव क्षेत्र का खर्च उठाने के अलावा पार्टी फंड में भी सहयोग करने की उम्मीद की जाती है। लेकिन सीएए-एनआरसी विवाद, मुस्लिम आतंकवाद के नाम पर निर्दोष युवाओं की गिरफ्तारी और प्रताड़ना पर सपा नेतृत्व खामोश रहता है।      

पिछले 6 वर्षों में पहले से ही समाज में पीछे हो चुके अल्पसंख्यक समुदाय के पास आज उत्तर प्रदेश में कोई राह नहीं दिखती है। उसके पारंपरिक रोजगार पर लगातार नियोजित हमला उसे भुखमरी की कगार पर ले आया है। प्रदेश में मौजूद पुराने बूचड़खाने पहले ही अवैध घोषित कर दिए गये थे। कई स्थानों पर नॉन-वेज की दुकानों और बकरा-मुर्गा के मांस की दुकानें बंद हुई हैं। बनारस और आस-पास के क्षेत्रों में लाखों की संख्या में पॉवरलूम और कार्पेट उद्योग, कानपुर का चमड़ा उद्योग मरणासन्न स्थिति में पहुंचा दिया गया है। ऐसे में मुस्लिम समुदाय के बीच में यदि एक तबका यदि अपने उत्पीड़क को ही अपना खेवनहार मान बैठ रहा है, तो इसमें कोई बड़ा आश्चर्य नहीं होना चाहिए। इससे सिर्फ दमन के स्तर का ही अनुमान लगाया जा सकता है।

इन हालात में यदि कोई मजबूत प्रतिरोध की आवाज पिछले कुछ समय में नजर आई है तो वह कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी और सीपीआई एम की नेता सुभाषिनी अली रही हैं। महिला उत्पीड़न, बलात्कार और अल्पसंख्यकों के खिलाफ दमन के प्रतिकार के रूप में प्रियंका गांधी की यूपी में जब-जब उपस्थिति दर्ज हुई, योगी राज का खौफ लोगों में कम हुआ है। उसी प्रकार कानपुर में बुलडोजर राजनीति को धता बताते हुए सुभाषिनी अली की उपस्थिति एक बड़े तबके को संबल देने का काम करती है।

दुखद तथ्य यह है कि इन दोनों पार्टियों के लिए यूपी प्राथमिकता में नहीं है। शायद कोई भी दल इस बड़े राज्य में लंबे समय तक बिना राजनीतिक लाभ पाए अपना खून पसीना बहाने को तैयार नहीं है। इसके बजाय उसे यूपी से आधी मेहनत पर दो-तीन राज्य में सरकार बना लेने की कवायद ज्यादा आसान लगती है। 

लेकिन सच तो यह है कि उत्तरप्रदेश में आज मुसलमान ही नहीं दलित वोटर भी पूरी तरह से नेतृत्व विहीन स्थिति में है। आज भी यूपी में लोकतांत्रिक मूल्यों में आस्था रखने वाले गांधी, लोहिया, अंबेडकर और वामपंथी विचारों में आस्था रखने वाले लोगों की अच्छी-खासी संख्या मौजूद है। जो वर्तमान फिजा को बदल सकते हैं। लेकिन मुसलमानों के सामने तो अस्तित्व का संकट है। शायद बदलाव की शक्ति होने का दावा करने वालों की निगाह यूपी में जल्द पड़े, और उत्तर प्रदेश की फिजा फिर से सभी तबकों के लिए खुशगवार हो। 

(रविंद्र पटवाल जनचौक की संपादकीय टीम के सदस्य हैं।)

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