सुप्रीम कोर्ट ने इमरान प्रतापगढ़ी को बड़ी राहत देते हुए गुजरात पुलिस की ओर से दर्ज प्राथमिकी (एफआईआर) को रद्द कर दिया है। यह मामला उनकी एक सोशल मीडिया पोस्ट से जुड़ा था, जिसमें उन्होंने एक कविता साझा की थी, जिसे गुजरात सरकार पर तंज के रूप में देखा गया। इस कविता के साथ ‘ऐ खून के प्यासे बात सुनो’ गाना बैकग्राउंड में चल रहा था, जिसके बाद पुलिस ने उनके खिलाफ भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 153ए के तहत मामला दर्ज किया था। इस धारा में धर्म, जाति आदि के आधार पर विभिन्न समूहों के बीच शत्रुता को बढ़ावा देने का आरोप लगाया जाता है।
मामले की शुरुआत 3 जनवरी 2025 को हुई थी, जब गुजरात पुलिस ने प्रतापगढ़ी की कविता को भड़काऊ मानते हुए एफआईआर दर्ज की। इसके बाद, गुजरात हाई कोर्ट ने 17 जनवरी को उनकी याचिका खारिज कर दी थी, जिसमें उन्होंने इस एफआईआर को रद्द करने की मांग की थी। हाई कोर्ट ने कहा था कि जांच अभी शुरुआती चरण में है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में हस्तक्षेप करते हुए न केवल एफआईआर को खारिज किया, बल्कि अभिव्यक्ति की आज़ादी पर एक मज़बूत टिप्पणी भी दी।
जस्टिस एएस ओका और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने अपने फैसले में कहा कि अभिव्यक्ति की आज़ादी संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत सम्मानजनक जीवन का आधार है। कोर्ट ने कहा, ‘विचारों और भावनाओं की स्वतंत्र अभिव्यक्ति एक स्वस्थ सभ्य समाज का हिस्सा है। इसके बिना सम्मानजनक जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती। साहित्य, कविता, नाटक, कला, व्यंग्य – ये सब जीवन को समृद्ध करते हैं।’ कोर्ट ने गुजरात हाई कोर्ट के रवैये की आलोचना करते हुए कहा कि अदालतों और पुलिस का कर्तव्य संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करना है। इसने कहा कि ‘अभिव्यक्ति की आज़ादी सबसे कीमती अधिकार है।’
पीठ ने गुजरात पुलिस की कार्रवाई को संवेदनहीन करार देते हुए कहा कि हर आलोचना को शत्रुता या खतरे के रूप में नहीं देखा जा सकता। साथ ही, यह भी स्पष्ट किया कि किसी विचार को अपराध मानने का आधार ‘असुरक्षित लोगों’ का डर नहीं हो सकता, जो हर बात को खतरा मान लेते हैं।
यह फैसला 28 मार्च 2025 (आज की तारीख) से पहले सुनाया गया, क्योंकि कोर्ट ने जनवरी में सुनवाई के बाद अपना निर्णय सुरक्षित रख लिया था। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि प्रतापगढ़ी की कविता न तो धर्म-विरोधी थी और न ही राष्ट्र-विरोधी, और पुलिस को इस मामले में संवेदनशीलता दिखानी चाहिए थी। गुजरात हाई कोर्ट के रवैये की आलोचना करते हुए कोर्ट ने निचली अदालतों और पुलिस से संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करने की अपील की।
इस फैसले का व्यापक महत्व है। यह न केवल इमरान प्रतापगढ़ी की व्यक्तिगत जीत है, बल्कि उन सभी के लिए एक मिसाल है जो सोशल मीडिया या अन्य माध्यमों से अपने विचार व्यक्त करते हैं। खास तौर पर, ऐसे समय में जब हास्य कलाकार कुणाल कामरा जैसे मामले भी चर्चा में हैं, जहां व्यंग्य और आलोचना को अपराध मानने की प्रवृत्ति बढ़ रही है, यह फैसला अभिव्यक्ति की आज़ादी के पक्ष में एक मज़बूत संदेश देता है।
राजनीतिक संदर्भ में भी यह मामला अहम है। प्रतापगढ़ी कांग्रेस के सांसद हैं, और उनकी कविता को बीजेपी शासित गुजरात सरकार पर हमला माना गया था। ऐसे में, इस एफआईआर को राजनीति से प्रेरित मानने की भी चर्चा थी। सुप्रीम कोर्ट का यह रुख विपक्षी नेताओं और कार्यकर्ताओं के लिए राहत लेकर आ सकता है। साथ ही, यह सवाल उठता है कि क्या पुलिस और प्रशासन भविष्य में अभिव्यक्ति पर प्रतिबंध लगाते समय इस फैसले से सबक लेंगे?
कुल मिलाकर, सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय लोकतंत्र में असहमति और आलोचना के अधिकार को मज़बूती देता है। यह आने वाले समय में अभिव्यक्ति की सीमाओं को परिभाषित करने में एक मील का पत्थर साबित हो सकता है।
(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकर और कानूनी मामलों के जानकार हैं)
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