सांस्कृतिक प्रतिरोध तब दुविधाग्रस्त हो जाता है जब उसे जरूरतों से नहीं भाषा की शिष्टता में उलझा दिया जाता है। प्रतिरोध हमेशा ही शिष्टता के बंधनों को तोड़ते हुए आता है। भारत में सांस्कृतिक प्रतिरोध की एक गौरवशाली परम्परा रही है जिसने सारी शिष्टता को तोड़ते हुए एक नई संस्कृति को जन्म दिया। यह परम्परा धार्मिक आंदोलनों में भी रही है और धर्म के खिलाफ हुए आंदोलनों में भी इसने महत्वपूर्ण मुकाम हासिल किया है।
हिंदी में तो भाषा की गरिमा संभालने वालों के लिए कबीर एक दोयम दर्जे के कवि थे। लेकिन, जब कबीर को चाहने वाले सामने आये तब पंडिताउ भाषा को अलविदा कह दिया गया।
जंतर-मंतर पर युवाओं के पोस्टर, नारे, गीत, मीम आदि की जो बाढ़ आई उसे लेकर, खासकर उसकी भाषा को ‘अभद्र’ बताने की होड़ सी लग गई है। दीवारों पर लिखे नारों को मिटाया जा रहा है और उसे दुबारा ‘रंग-रोगन’ से भरा जा रहा है। डिजिटल प्लेटफार्म से हटाने के लिए प्रयास किये जा रहे हैं। यह खबर भी आ रही है कि सोशल मीडिया पर इस तरह के पोस्ट डालने वाले, शेयर करने वालों को पोस्ट हटाने के आदेश जारी हो रहे हैं। आदि।
क्या युवाओं की भाषा अभद्र है?
जंतर-मंतर से लेकर मुंबई तक के प्रदर्शनों में युवा हाथ में जिन पोस्टरों को लेकर खड़े थे, उस पर लिखे कुछ नारे निश्चित ही उन शब्दों को साथ थे, जिसे आमतौर पर सामाजिक जीवन में प्रयोग नहीं किये जाते। लेकिन, हमें यह याद रखना होगा ये प्रदर्शन रोजमर्रा का सामाजिक जीवन नहीं था। यह एक राजनीतिक प्रदर्शन था। पिछले एक दशक में भाजपा, आरएसएस और उसके संगठन, उसके आईटी सेल ने अपना एक पूरा प्रचार-तंत्र खड़ा किया।
उन्होंने राजनीतिक मंचों से लेकर सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्म पर अपनी सत्ता की पकड़ को चरम पर ले जाने के लिए बहुत सारे तरीकों का इस्तेमाल किया किया है। यह तंत्र कभी खुलेआम और कभी परोक्ष तरीके से काम किया। परोक्ष हिस्सा ज्यादा भयावह परिणाम देने वाला रहा है। ये परोक्ष हिस्सा सीधे भाजपा व उसके संगठनों से नहीं जुड़ता है लेकिन वह उसी की सेवा करता हुआ दिखता है। इसने भारतीय राजनीति की अब तक की सारी शिष्टता और औपचारिकता को तोड़ डाला है।
इसने जिन तरीकों का इस्तेमाल किया, उसमें से कुछ इस तरह से चिन्हित किया जा सकता है- ट्रोल करना, व्यक्तिगत हमले करना, व्यक्तिगत जीवन को सार्वजनिक करना, गालियों की भाषा का प्रयोग करना, धमकी देना- जान से मार देने से लेकर बलात्कार करने तक, गंदे मीम बनाना आदि।
भाजपा के कुछ सांसदों ने संसद के अंदर महिला सांसद और अल्पसंख्यक समुदाय के सांसद के खिलाफ जिस तरह के शब्दों का प्रयोग किया, वह सारी शिष्टता को पार कर गया था। खुद प्रधानमंत्री ने सांस्कृतिक विधानों के आधार पर सामाजिक समूहों पर हमला किया और कांग्रेस के नेताओं, खासकर राहुल गांधी और सोनिया गांधी के खिलाफ जिस तरह के शब्दों का प्रयोग किया, वह किसी भी तरह से शिष्टता के दायरे में नहीं आता।
भाजपा और आरएसएस सत्ता में हैं और वे किसी प्रतिरोध प्रदर्शन में नहीं हैं। वे इन सांस्कृतिक प्रतीकों, भाषा आदि का प्रयोग अपनी सत्ता को और मजबूत करने, मोदी को एक कल्ट में बदल देने और अजेय बना देने के लिए कर रहे हैं। यह काम वे पूरी शिष्टता के साथ भी कर सकते हैं। फिर भी वे इस शिष्ट तरीके से नहीं करते। कारण? वे हिंदुत्व की संस्कृति के वर्चस्व को हमलावर तरीके से ही स्थापित करना चाहते हैं। यह उनकी राजनीति से अलग नहीं है।
भाजपा और आरएसएस का सांस्कृतिक वर्चस्व पूरी हमलावर भाषा के साथ आया है जिसमें गालियां अभिन्न हिस्सा थीं। इसके बावजूद प्रधानमंत्री का दावा था कि वे हर रोज दो-तीन किलो गालियां खाते हैं। यह दावा इसलिए करते रहे हैं ताकि भारतीय राजनीति में उन्हें शिष्ट माना जाए। निश्चित ही, औपचारिक स्थलों पर, जैसे युवा-बच्चों के बीच या धार्मिक स्थलों पर एक खास संस्कृत से बोझिल हुई हिंदी में वह बोलते हुए दिखते हैं। भाषा की शुचिता को यहीं से हासिल करते हैं।
इसके बरक्स आप जंतर-मंतर पर युवाओं की भाषा हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी से भरी हुई दिखती है। ये आम भाषा है जो दिल्ली जैसे शहर में बोली जा रही है। प्रतिरोध संघर्ष बनाने वाले युवा उसी सोशल मीडिया, फेसबुक, इंस्टाग्राम, एक्स आदि प्लेटफार्म के साथ आया था जहां पिछले एक दशक में भाजपा और आरएसएस की ट्रोल की भाषा काम करती रही है। ये वही मीम हैं जिसकी ट्रेनिंग लंबे समय से चली आ रही थी।
यह युवाओं की अपनी शिष्टता थी और उनकी भाषा की मर्यादा थी जो उन्होंने हिंदुत्व की आईटी सेल वालों की घटिया किस्म की भाषा से अलग एक भाषा को अख्तियार किया। यहां से आप देखेंगे तब प्रतिरोध में उठी सांस्कृतिक भाषा कहीं अधिक सभ्य, शिष्ट और बेहतर दिखाई देगी। ये युवा मोदी के कल्ट को सीधे चुनौती दे रहे थे और उन्हें बता रहे थे कि आप हमारे लिए क्या हो। निश्चित ही इसमें संवाद का एक पक्ष था जिसे मोदी ने पकड़ने की कोशिश की।
लेकिन, यह संवाद मोदी को सुनने के लिए नहीं था, यह युवाओं को सुनने के लिए था। युवाओं ने बताया कि वे मोदी, भाजपा और उसकी सरकार को कत्तई अजेय नहीं मानते और वे सीधे उन्हें चुनौती दे सकते हैं। उनके पोस्टर मोदी के राजनीतिक व्यक्तित्व को सिर्फ तार-तार करते हुए ही नहीं हैं, ये उस कल्ट को ढहाते हुए दिखते हैं जिसे पिछले एक दशक से बनाया जा रहा था।
यहां आलोक धन्वा की कविता ‘जनता का आदमी’ को याद करना जरूरी है:
जब कविता के वर्जित प्रदेश में
एकबारगी कई करोड़ आदमियों के साथ घुसा
तो उन तमाम कवियों को
मेरा आना एक अश्लील उत्पात-सा लगा
जो केवल अपनी सुविधा के लिए
अफीम के पानी में अगले रविवार को चुरा लेना चाहते थे
अब मेरी कविता एक ली जा रही जान की तरह बुलाती है,
भाषा और लय के बिना, केवल अर्थ में-
उस गर्भवती औरत के साथ
जिसकी नाभि में सिर्फ इसलिए गोली मार दी गई
कि कहीं एक ईमानदार आदमी पैदा न हो जाय।
जंतर-मंतर पर सिर्फ पोस्टर नहीं, वहां गीतों की गूंज थी
युवा रैपर्स अपने बनाये गीतों के साथ बेरोजगारी, बेबसी, गरीबी और टूटते सपनों के साथ दोस्ती और प्यार का गीत गा रहे थे। एक दूसरे से सटे, धकियाते, हंसी और नारों को एक साथ उछालते हुए युवाओं के बीच अचानक जगह बनाते हुए रैपर्स थोड़े से ट्यून के साथ गाने लगते। कैमरे ऑन हो जाते और सोशल मीडिया पर लाइव प्रदर्शन जारी हो जाता। एक दूसरे कोने में डफली पर तेज होती थाप पर फैज अहमद फैज का गीत ‘हम देखेंगे’ अपनी उठान के साथ सुनाई देने लगता है।
कोरस, सिर्फ कोरस नहीं हैं, एक ललकार की तरह आवाज उठती है और शब्द ललकारते हुए उठते हैं- जब तख्त उछाले जाएंगे, जब ताज उछाले जाएंगे। एक गर्म होती आवाज की तपिश हर कोई महसूस करता है। सीएए प्रदर्शनों के दौरान आमीर अजीज द्वारा लिखी गई नज्म ‘सब याद रखा जाएगा’ के साथ पिंक फ्लाॅयड और रोजर वाॅटर्स को याद किया जाता है। हिंदी फिल्मों के गीत, खासकर रंग रे बसंती, ये जो देश है मेरा, साढ़ा हक् की प्रस्तुति होती है। बाॅब डिलन और जाॅन बीज के गीतों की छिटपुट आवाजें सुनाई देती हैं।
लेकिन सबसे अधिक गीत तो रील्स में दिखाई देते हैं। अंग्रेज़ी और हिंदी के लोकप्रिय गीतों को युवा एक नया ही अर्थ दे रहे थे। टूटे हुए प्रेम के गीत पुलिस जुल्म के खिलाफ शिकायतों और उन्हें माफ कर देने में एक नया ही अर्थ लेकर आये।
बहुत सारे युवाओं ने वहीं बैठकर कविताएं लिखीं। कुछ लोग पुलिस जुल्म के खिलाफ कविताएं लिखकर ले आये और खड़े होकर सुनाने लगे। निश्चित ही वहां सकैड़ों ऐसे युवा थे जो लिख रहे थे और वहां उन्होंने अपनी कलम की धार तेज किया। बहुत सारे युवाओं ने पोस्टर लिखना शुरू किया। उन्होंने दीवारों पर लिखा। उन्होंने भित्ति चित्र बनाया। व्यंग चित्र बनाये और साथ ही चित्रकारी की कला का प्रदर्शन भी किया।
युवा महिलाओं की भागीदारी खूब थी। वे वहीं जंतर-मंतर पर रात भर रुक रही थीं। उनके पोस्टर अपनी ही तरह के थे। उनके पोस्टर गोपनीय मानी जानी वाली बातों को एक खुले डिस्कोर्स की तरह पेश थीं।
फोटोग्राफी, कैमरा हर जगह था। यह मोबाईल से लेकर डीएसएलआर तक, हर तरह से हर जगह हर कोने में हमेशा तैयार था। पुलिस बल एआई से लैस कैमरे के साथ उपस्थित था तो युवाओं के कैमरे हरेक क्षण को कैद कर लेने के लिए तैयार थे। इन कैमरों ने पुलिस के हरेक उस क्षण को कैद किया जिसे उसने युवाओं के खिलाफ प्रयोग किया। इन कैमरों ने हरेक उस क्षण को कैद किया जो उन्होंने अपनी एकजुटता से हासिल किया।
यह सिर्फ एक दस्तावेज नहीं हैं, ये वे यादें हैं जो जिंदा हैं, ये एक भाषा है जो अपने समय के बारे में बहुत सारी बातों को कथा की तरह कहता रहेगा, ये वे कविताएं हैं जिनके शब्द तो नहीं बदलेंगे लेकिन हर बार वे अपने मूल अर्थों की याद दिलाएगें। ये कैमरे बताएंगे कि इन युवाओं पर एके 47 से गोलियां चलाई गई थीं और उन पर पैलेट गन मारा गया था, उन पर पुलिस ने लाठियां मारी, फिर भी युवाओं ने उनसे संवाद करना नहीं छोड़ा और नहीं भिड़ने में पीछे रहे।
ये कैमरे यह बताते रहेंगे कि यह सब तब हुआ जब युवाओं ने सिर्फ यह कहा था, ‘परीक्षाओं में धांधली रोकी जाए और असफल शिक्षा मंत्री इस्तीफा दे दें’। यह एक छोटी सी बात थी लेकिन यह व्यवस्था में गहरे धंसी हुई थी। यह बात युवा जानते थे। उन्होंने अपनी लड़ाई भी इसी स्तर पर जाकर लड़ी और अपने समय के सांस्कृतिक प्रतिरोध को खड़ा किया। युवा जानते थे शिष्ट होना दुविधाग्रस्त हो जाना है। उन्होंने अब तक के मानदंडों को तोड़ दिया और उन्होंने अपने तरह से लड़ाई लड़ी। इसीलिए इस बार का युवाओं का संघर्ष खास बन गया।
(अंजनी कुमार वरिष्ठ पत्रकार और टिप्पणीकार हैं।)