लोकतंत्र खतरे में! नामी-गिरामी और जाने-माने बुद्धिजीवी क्या कहते हैं!

निश्चित रूप से देश विभिन्न मोर्चों पर जूझ रहा है। खासकर लोकतांत्रिक मोर्चा पर सियासी तूफान और सुनामी के आसार बहुत गाढ़े हैं, ऐसे में देश के नामी-गिरामी और जाने-माने बुद्धिजीवियों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। लोकतंत्र! एक जान और दुश्मन हजार! हिंदी और अंग्रेजी के जानकार लेकिन हिंदी में सक्रिय नामी-गिरामी और जाने-माने बुद्धिजीवी की बेचैन भूमिका को भी समझना जरूरी है।

बिहार विधानसभा चुनाव में चुनाव और जनता के मुद्दों से अधिक विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) की चर्चा जोर-शोर से चल रही है। तेजस्वी यादव के वोटर आईडी कार्ड-एपिक पर कथा-कहानी अपनी रवानी पर है। साथ ही राहुल गांधी ने मतदाता सूची में गड़बड़ी का आरोप सबूतों के साथ जनता की अदालत में पेश कर रहे हैं। प्रेस कांफ्रेंस के माध्यम से जनता की अदालत में पूरी प्रक्रिया लोगों की सीधी समझ में आने लायक तरीके रख दी गई है। चुनाव आयोग राहुल गांधी को जनता की अदालत से निकालकर अपनी शाही अदालत में ले आने के लिए आक्रामक रुख और रवैया अपना रहा है। ऐसे में जनता का निर्णायक रुख तो मतपेटी तक पहुंचने में लोकतांत्रिक वक्त लगता है। 

उस के पहले नामी-गिरामी और जाने-माने बुद्धिजीवियों की राय का अपना महत्व होता है। ‘बुद्धिजीवियों’ की सब से बड़ी समस्या यह हो गई है कि छोटे-छोटे स्तर की गुटबाजी नहीं, शिविरबद्धता इतनी चाकचौबंद है कि ब्लैक एंड ह्वाइट के बीच इधर-उधर होने की सुविधा ही कम हो गई है। ‘बुद्धिजीवियों’ के स्वतंत्रता-बोध का पौधा ब्लैक एंड ह्वाइट के बीच इधर-उधर होने की सुविधा की संभावनाओं से भरी जमीन पर ही विकसित होता है। ऐसे में राहुल गांधी के लोकतांत्रिक कदम से ‘बुद्धिजीवियों’ की सुविधा के समीकरण में उथल-पुथल मच जाता है। जाने-माने बुद्धिजीवियों की बेचैनियों का हाल देखते ही बनता है। जिस डाल पर बैठा हो उसे ही काटने से राजनीतिक लोगों को कोई गुरेज नहीं होता है, जिस जमीन पर खड़ा रहता है उस के चारों तरफ गड्ढा खोदने में ‘बुद्धिजीवियों’ को कोई गुरेज नहीं होता है। कहना न होगा कि अब खबरचियों और संवाददाताओं की पदोन्नति अब खतरों के खिलाड़ी के रूप में हो चुकी है। अब अखबारनवीस जब खबरों के खिलाड़ी बन गये हैं तो चुनाव आयोग की तरह से वे भी लोकतंत्र के निष्पक्ष अंपायर नहीं रहे, बल्कि खिलाड़ी हो चुके हैं। अब खबरों के खिलाड़ी हैं तो खबरों से खिलवाड़ करेंगे ही! इस तरह से खबरों के खिलाड़ी भी लोकतंत्र के लिए खतरों के खिलाड़ी बन गये हैं। आज नहीं तो कल खिलाड़ियों का सामना खतरों से होगा। तब यह है कि वह खिलाड़ी ही क्या जो खतरों का सामना करने से डर जाया करे!  

खबरों के खिलाड़ी का खबरों से खिलवाड़ देखना दिलचस्प हो सकता है, कुछ झलकियां —  

प्रधानमंत्री से नहीं राहुल गांधी से, सरकार से नहीं विपक्ष से उम्मीद करते हैं कि वे तथ्य सामने रखें। वे सरकार के लोगों से यह भी नहीं पूछते कि तथ्यों के साथ खूब झूठ बोलने का मतलब आखिर होता क्या है? लेकिन वे खुद तथ्यों पर कोई राय नहीं देना चाहते।चुनाव आयोग और चुनाव प्रक्रिया पर अंगुली उठना कोई नई बात नहीं है तेजस्वी यादव अधीर हैं। उन से चूक हुई जरूर है! कहां चूक हुई यह नहीं बताते कहीं-न-कहीं! हारने वाली पार्टी अकसर कहती है कुछ गलत हुआ है। कोई नई बात नहीं है।

खबरों के खिलाड़ी को पक्का विश्वास है कि फर्जी वोटर और एसआईआर का एक साथ विरोध नहीं हो सकता है। अब कौन कहे कि फर्जी वोटर का सवाल हो चुके चुनाव से संबंधित है और एसआईआर का मामला आनेवाले चुनाव से संबंधित है। वे बहुत ही मासूम हैं, इतने कि कोई लाख समझाये वह अपनी मासूमियत छोड़ ही नहीं सकते हैं। यानी तेजस्वी यादव और राहुल गांधी एक दूसरे की विरोधी राजनीति में लगे हुए हैं। किसी भी व्यक्ति का दो वोटर आईडी कार्ड-एपिक कैसे, यह सवाल चुनाव आयोग से किया जाना चाहिए। लेकिन नहीं मासूमियत यह कि सवाल तेजस्वी यादव से है।    

नामी-गिरामी ‘बुद्धिजीवी’ मानते हैं कि विपक्ष को पूरा हक है, लोकतंत्र में यह होना भी चाहिए लेकिन कौन-कौन से मुद्दे लेकर विपक्ष चल रहा है, मुद्दों में तथ्य क्या हैं यह भी देखा जाना चाहिए! तेजस्वी यादव और राहुल गांधी के मुद्दों में टकराव है। इतना कहकर वे जोर देकर कहते हैं कि वे अपने मतदाताओं को मैसेज देने में कामयाब हैं। ये अपने मतदाता और अन्य के मतदाता क्या होता है यह तो कोई ‘विशेष गहन बुद्धिजीवी’ ही बता सकता है।   

‘विशेष गहन बुद्धिजीवी’ यह जरूर मानते हैं कि  लोकतंत्र में चुनाव प्रक्रिया ‘सब कुछ’ होता है। चुनाव प्रक्रिया में धांधलियों की बात साबित हो गई तो देश की छवि को बट्टा लगेगा! देश की छवि को बट्टा लगाना किस का एजेंडा है? जाहिर है कि विपक्ष का जो धांधलियों की बात साबित करने पर आमादा है! वह तो बिल्कुल नहीं जो लगातार चुनाव प्रक्रिया में धांधली करने को अपना हक मानता है, वे अधिकारी भी नहीं फर्जी वोटर को फर्ज निभाने में मदद करते हैं! नहीं किया नहीं, केवल और केवल विपक्ष जिसे देश की छवि को बट्टा लगाने के अलावा और कोई काम नहीं! देश की छवि को बट्टा लगने से बचना-बचाना ही सत्यमेव जयते है। सरकार के विरोध का मतलब सत्यमेव जयते के विरोध के अलावा कुछ नहीं हो सकता है। ‘विशेष गहन बुद्धिजीवी’ साबित करते हैं कि गैर-जिम्मेवार विपक्ष सत्यमेव जयते का विरोधी है, इसलिए देशद्रोही से कुछ कम नहीं है। आखिर देश की छवि को बट्टा लगाना किस का एजेंडा है?

ढुलमुल बुद्धिजीवियों में भी खुद को प्रतिबद्ध बुद्धिजीवी के रूप में देखे जाने, दिखाये जाने की बड़ी उत्कंठा होती है। उन्हें शिकायत है कि राहुल गांधी ने एक ही विधानसभा का डेटा दिया है, विसंगतियां चिंताजनक तो हैं लेकिन अपर्याप्त है। राहुल गांधी की तैयारी अधूरी है। यानी अस्वीकार्य है, विश्वस्त नहीं है, विस्तृत नहीं है आदि-आदि-इत्यादि मतलब आदि ही अंत है! सब राहुल गांधी ही कर लेंगे तो आप क्या उन की कॉपी जांचने में जीवन बिता देंगे!

धन्य हो प्रभु आप तो बात को जड़ से पकड़ लेते हैं! राहुल गांधी का स्ट्रेटजिक सीक्रेट पकड़ लिया, खबर में रहो, मुद्दों से दूर रहो! इतना ज्ञान कहां से लाते हैं प्रभु! कह दीजिए न साफ-साफ कि लगातार मुद्दों की बात करनेवाले प्रधानमंत्री के दौर में मुद्दों से भागने वाला नेता प्रतिपक्ष देश और दुनिया में भारत दुर्दशा का असली जवाबदेह है, ठीक परनाना की तरह! कह दीजिए!  

(प्रफुल्ल कोलख्यान स्वतंत्र लेखक और टिप्पणीकार हैं)  

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