देश आज एक महत्वपूर्ण दौर से गुज़र रहा है। वह एक ऐसे दोराहे पर खड़ा है जिसके एक तरफ आज़ादी और दूसरी तरफ हिंदू श्रेष्ठता से उपजी तानाशाही है। इस काल को मोदी सरकार ने ‘आज़ादी का अमृतकाल’ नाम दिया है। लेकिन वास्तव में, इस काल में भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त आज़ादी और धर्मनिरपेक्षता आज संकट में हैं। सभी देशवासियों के लिए न्याय, समता और समानता प्रदान करने वाली संवैधानिक लोकतांत्रिक व्यवस्था आज संकट में है। मई, 2014 में जिस संविधान की शपथ लेकर नरेंद्र मोदी सरकार सत्ता में आई थी, आज वह उसी के सिद्धांतों और लोकतंत्र को अपनी हिंदुत्व की राजनीति के अनुरूप ढालने की कोशिश कर रही है।
सत्ता में आने के बाद से वह अपनी मातृ संस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के हिंदू राष्ट्र एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए नागरिक संशोधन कानून (सीएए), जम्मू-काश्मीर में धारा 370 हटाने और अयोध्या में राम मंदिर निर्माण आदि के द्वारा सुनियोजित ढंग से कोशिश करती रही है। अब उसने सरकारी कर्मियों के आरएसएस के सदस्य बनने पर लगे साठ साल पुराने प्रतिबंध को भी हटा दिया है। ऐसा करके वह देश की बहुलतावादी सभ्यता, संस्कृति को ही चोट नहीं पहुंचा रही बल्कि भारत की एकता, अखंडता को भी दांव पर लगा रही है।
दरअसल आरएसएस का मकसद सामाजिक समानता को खत्म करके जाति-विभाजन पर आधारित सामाजिक समरसता का सिद्धांत लागू करना है। हमारा मौजूदा संविधान अपने मौलिक अधिकारों को पाने के लिए और सामाजिक-आर्थिक दमन के खिलाफ संघर्ष करने की जो कानूनी शक्ति देता है, वह सामाजिक समरसता के लागू होते ही खत्म हो जायेगा।
जब 1998 में केन्द्र में पहली जब भाजपा की सरकार कायम हुई, तो प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने पहला काम भारतीय संविधान को बदलने के लिए एक समीक्षा समिति बनाने का ही किया था। उसके ग्यारह सदस्यों में एक पत्रकार अरुण शौरी, एक हिंदी के लेखक शैलेश मटियानी और एक रिटायर्ड जज भी थे। रिटायर्ड जज को जब पता चला कि हिंदू राष्ट्र के लिए संविधान की काट छांट करनी है, तो उन्होंने खुद को उस समिति से अलग कर लिया। लेकिन आरएसएस ने तो साल भर पहले ही अपने लोगों को संविधान विरोधी मुहिम चलाने में लगा दिया था।
संघ ने अपने हिंदू राष्ट्र के एजेंडे को कभी छुपाया नहीं। उसने देश के मुसलमानों के विरुद्ध देश के बहुसंख्य हिन्दुओं की धार्मिक भावनाओं का लाभ उठाकर उन्हें बहकाया और सांप्रदायिक बनाया। फिर सांप्रदायिकता को राजनीतिक सत्ता के लिए सीढ़ी की तरह इस्तेमाल कर राजसत्ता पर अधिकार जमाया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दूसरे सरसंघचालक रहे एमएस गोलवलकर ने अपनी पुस्तक ‘वी ऑर अवर नेशनहुड डिफाइंड’ में अपने जो विचार व्यक्त किए हैं, उनके पीछे धार्मिक और नस्लीय घृणा प्रकट करते हुए फासीवाद और नाज़ीवाद का प्रभाव स्पष्ट देखा जा सकता है।
इस पुस्तक में गोलवलकर प्रश्न करते हैं कि ‘अगर निर्विवाद रूप से हिंदुस्थान हिंदुओं की भूमि है और केवल हिंदुओं ही के फलने-फूलने के लिए है, तो उन सभी लोगों की नियति क्या होनी चाहिए जो इस धरती पर रह रहे हैं, परंतु हिंदू धर्म, नस्ल और संस्कृति से संबंध नहीं रखते’ (गोलवलकर की हम या हमारी राष्ट्रीयता की परिभाषा : एक आलोचनात्मक समीक्षा, शम्सुल इस्लाम)
सवाल उठता है कि ‘हिंदुस्थान हिंदुओं की भूमि है और केवल हिंदुओं ही के फलने-फूलने के लिए है’ तो ऐसा विचार रखने वाले गोलवलकर ने इस भूमि को अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त कराने के लिए आज़ादी की लड़ाई में हिस्सा क्यों नहीं लिया? उसकी जगह उसने अंग्रेजों का साथ देना क्यों उचित समझा था?
संघ प्रचारक रहे नरेंद्र मोदी के 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद से ‘हिंदुत्व’ की विचारधारा भारतीय राजनीति की मुख्य धारा में आ गई है। मोदी सरकार, बिना किसी हिचक के, संघ के ‘मिशन हिंदूराष्ट्र’ के तहत देश के संवैधानिक, वैधानिक, प्रशासनिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों में हिंदुत्व के अनुकूल व्यवस्था बनाने में जुटी हुई है। इस संदर्भ में उसकी कुछ कार्रवाइयों का यहां ज़िक्र करना अप्रासंगिक न होगा।
हिंदू राष्ट्रवादी अधिकार के अवतार, पूर्व संघ प्रचारक, भाजपा (भारतीय जनता पार्टी) के नेता और देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 2014 से शुरू हुए शासन में आज दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र संकट में है। उनके प्रधानमंत्री बनने के बाद से देश में मौजूद हिन्दू सांप्रदायिक शक्तियों को आगे बढ़ने की खुली छूट ही नहीं मिली बल्कि नई ताक़त भी मिली है। संघ (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) और उसके अनुषांगिक संगठनों ने तब से अपने हिंदूराष्ट्र के एजेंडे पर योजनाबद्ध तरीके से अमल करना शुरू कर रखा है।
मोदी के सत्ता में आने के बाद से ही उन्होंने देश के अल्पसंख्यकों, खासकर मुसलमानों, को निशाने पर लेकर उन पर गो-हत्या, लव जिहाद और धार्मिक भावनाओं को आहत करने के नाम पर तरह-तरह से हमले करने जारी कर रखे हैं। इनके द्वारा उन्होंने धर्म, जाति, भाषा के नाम पर नफ़रत फैलाकर समाज में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने की कोशिश की है। जिसका लाभ चुनावों में भाजपा को मिलता है और वह राज्यों में सरकारें बनाने में कामयाब होती है।
केन्द्र और कुछ राज्यों में सरकारी मशीनरी हाथ में आने के बाद संघ परिवार के संगठन कानून व्यवस्था को ठेंगा दिखा समाज में घृणा फैलाने के लिए मनमानी या गुंडागर्दी करते हैं। उसी के नतीजे में फरवरी, 2020 में दिल्ली में, अगस्त, 2023 में हरियाणा के मेवात में सांप्रदायिक दंगे हुए थे। देश के उत्तर-पूर्व में स्थित संवेदनशील राज्य मणिपुर में मई, 2023 से वहां के कुकी और मैतेई समुदायों के बीच हो रही जातीय हिंसा भी संघ की घृणा फैलाकर ‘बांटो और राज करो’ की नीति का ही परिणाम है।
नरेन्द्र मोदी जानते हैं कि लोकतांत्रिक भारत को जबरन एक हिंदूराष्ट्र में बदलने के लिए यानि आरएसएस के एजेंडे को पूरा करने के लिए, देश की राजनीतिक सत्ता पर पकड़ बनाए रखना जरूरी है। उन्हें यह भी पता है कि लोकतंत्र के तीन स्तंभों यानि विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका को अपने अनुकूल किए बिना यह संभव नहीं है। इसलिए 2014 में पूर्ण बहुमत के साथ भारत का प्रधानमन्त्री बनने के बाद उन्होंने देश की सभी महत्वपूर्ण संवैधानिक और वैधानिक संस्थाओं में शीर्ष पदों पर संघ समर्थकों को नियुक्त करना शुरू किया था।
8 नवंबर, 2016 को उन्होंने काला धन खत्म करने के नाम पर नोटबंदी जैसा घातक आर्थिक कदम उठाया। उससे काला धन तो बाहर नहीं आया, लेकिन देश की अर्थव्यवस्था का भट्ठा अवश्य बैठ गया। हां, इस कदम से उनके राजनीतिक विरोधियों की आर्थिक हालत ज़रूर खस्ता हो गई। नोटबंदी के मकसदों में एक शायद यह भी था! लोकतंत्र का चौथा खंभा कहे जाने वाले राष्ट्रीय मीडिया को भी अपने अनुकूल बनाना वह नहीं भूले। इसके लिए लालच और दवाब की नीति अपनाई गई। इसके द्वारा अपने लिए प्रचार और विरोधी स्वरों को कुंद का काम किया गया। एक पूंजीवादी लोकतांत्रिक व्यवस्था में इस तरह की हरक़त का क्या मतलब होता है?
मोदी सरकार यहीं नहीं रुकी। अयोध्या में राम मंदिर निर्माण की मांग संघ के एजेंडे में हमेशा सबसे ऊपर रही है। लेकिन मुस्लिम पक्ष से उसके भूमि विवाद के कारण मामला लंबे अरसे से सुप्रीम कोर्ट में लंबित था। कोर्ट इस पर क्या फ़ैसला देगा, इसे लेकर संघ शंकित था। उसके अलावा मोदी सरकार द्वारा रफाल सैन्य विमानों की खरीद में हुई कथित धांधली और पेगासस सॉफ्टवेयर द्वारा कुछ नेताओं और पत्रकारों के मोबाइल फोन टैप कर जासूसी के मामले भी उच्चतम न्यायालय में विचाराधीन थे।
उनके कारण सरकार की सांस अटकी हुई थी। ऐसे में, उसने अपने पक्ष में निर्णय के लिए देश की न्याय व्यवस्था को भी प्रभावित करने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी थी। नतीजा, 2020 में तीनों मामलों में कोर्ट से संघ और सरकार के हक़ में फ़ैसला आया। बाद में (शायद!) इसके पुरस्कार स्वरूप सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश को राज्य सभा का सदस्य बनाया गया था।
(अवतार सिंह जसवाल वामपंथी कार्यकर्ता हैं।)