संसद में वंदेमातरम पर चली बहस में सरकार के मंसूबे पूरे नहीं हुए। उल्टे उसकी कलई ज़रूर खुल गयी। बहस की शुरुआत करते हुए पीएम मोदी ने अपने तय एजेंडे के मुताबिक मामले को सांप्रदायिक रूप देने के साथ ही हमेशा की तरह नेहरू को निशाने पर रखने की कोशिश ज़रूर की लेकिन विपक्ष ने उस झूठ का भी पर्दाफाश कर दिया। टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा ने मानो सरकार को छील दिया हो। तथ्यों, तर्कों और ऐतिहासिक संदर्भों के जरिये उन्होंने सत्तापक्ष की जो घेरेबंदी की वह बेमिसाल थी। हमेशा की तरह उनके तेवर उसी तरह से गरम थे जिसके लिए वह जानी जाती हैं।
प्रधानमंत्री के इस बयान कि 1905 में बंगाल विभाजन को रोकने वाले गीत को नेहरू ने 1937 में विभाजित कर दिया, का मोइत्रा ने तथ्यों के साथ झूठा करार दिया। उन्होंने कहा कि यह केवल नेहरू नहीं बल्कि सुभाष चंद्र बोस से लेकर राजेंद्र प्रसाद तक ने महाकवि गुरुदेव रविंद्र नाथ टैगोर को पत्र लिखकर यह जानना चाहा था कि आखिर वंदेमातरम गीत को लेकर क्या किया जाए। यहां किसी के जेहन में यह सवाल उठा सकता है कि भला रविंद्र नाथ टैगोर को ही क्यों इस काम के लिए चुना गया। तो उसका उत्तर भी देना जरूरी है। दरअसल वंदे मातरम के लेखक बंकिम चंद्र चटर्जी ने भले ही यह गीत 1875 में लिखा और फिर इसके बढ़े हुए स्टेंजा के साथ उसे 1882 के अपने उपन्यास ‘आनंद मठ’ में शामिल किया।
लेकिन यह गीत आम लोगों के बीच किसी भी रूप में चर्चित नहीं था। इसे पहली बार सार्वजनिक तौर पर बाहर लाने का काम रविंद्र नाथ टैगोर ने उस समय किया। जब 1896 के कांग्रेस के अधिवेशन में उन्होंने इसे गाया। इसलिए इस गीत पर किसी और के मुकाबले किसी तरह की राय बनाने का पहला अधिकार उनका था। इसके साथ ही चूंकि बंगाल के वह साहित्य, संस्कृति और कला क्षेत्र के सर्वमान्य चेहरे थे। ज्ञान और प्रतिभा के मामले में उनका कोई सानी नहीं था। इसलिए भी उनकी राय किसी और के मुकाबले ज्यादा मायने रखती थी। उनके जैसे उदात्त शख्सियत का मालिक शायद ही उस समय भारत में कोई रहा हो। यहां तक कि गांधी के बरख्श भी सोच के मामले में वह उनसे कहीं आगे खड़े थे।
खासकर राष्ट्रवाद और मानवतावाद को लेकर रुख के मामले में। वह खुद को मानवतावादी मानते थे और राष्ट्र के मुकाबले अंतरराष्ट्रीयतावाद के समर्थक थे। इस लिहाज से राष्ट्रीय सीमाओं के पार जाते थे। इसीलिए अंग्रेजों को किसी दुश्मन की जगह एक व्यवस्था के प्रतिनिधि के तौर पर देखते थे। निरपेक्षता उनकी जेहनियत का हिस्सा थी। इसीलिए वंदेमातरम गीत पर अपनी राय के मामले में भी वह बेहद स्पष्ट थे। उन्होंने आनंद मठ के उस संदर्भ को भी नोटिस किया होगा जिसमें सन्यासियों के पूरे विद्रोह को मुसलमानों के खिलाफ दिखाया गया है। इसके साथ ही उपन्यास में मुसलमानों को न केवल शत्रु बल्कि उपन्यास के आखिर में अंग्रेजों को देश के मित्र के तौर पर पेश किया गया है। क्योंकि उन्होंने देश को मुस्लिम सत्ता से निजात दिलायी थी। यही वह संदर्भ है जो बंकिम चंद्र के आनंद मठ और वंदेमातरम गीत को आरएसएस-बीजेपी के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से जोड़ देता है।
केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने इसको संसद के भीतर अपने भाषण में खुले तौर पर स्वीकार भी किया। इन सब चीजों को देखते हुए ही टैगोर ने नेहरू, सुभाष और राजेंद्र प्रसाद की लिखी चिट्ठियों के जवाब में कहा कि वंदेमातरम के केवल पहले स्टेंजा या दो लाइनों को ही गीत के तौर पर लिया जा सकता है। उन्होंने ऐसा क्यों किया होगा उसके पीछे के कारणों को समझना किसी के लिए मुश्किल नहीं है। दरअसल ‘आनंद मठ’ में जोड़ी गयी वंदे मातरम गीत की बाकी लाइनें न केवल सांप्रदायिक विभाजन पैदा करती हैं बल्कि उनका गान करना इस्लाम के बुनियादी सिद्धांतों के खिलाफ है। जो किसी भी मुसलमान के लिए कबूल नहीं हो सकता है। अगले दो स्टेंजा में खुले तौर पर दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती की पूजा है। जबकि इस्लाम में अल्लाह के अलावा किसी भी अन्य व्यक्ति की पूजा की मनाही है। यहां तक कि उसका चित्र या फिर कोई मूर्त रूप भी नहीं दिखाया जा सकता है।
यही वजह है कि पैगंबर का आज तक कोई फोटो या फिर चित्र प्रदर्शित नहीं किया गया। शायद यही कारण रहा होगा कि गुरुदेव टैगोर ने गीत के अगले दो स्टेंजा को लेने से मना कर दिया होगा। अवलन तो पहला स्टेंजा भी मातृभूमि की पूजा का ही संदेश देता है। हालांकि इसमें प्रकृति का वंदन और वर्णन है। यही वजह है कि इस्लाम के बहुत सारे जानने और मानने वालों का इस हिस्से पर भी एतराज रहा है। इन्हीं संदर्भों को देखते हुए संविधान सभा ने भी इसे राष्ट्रगान नहीं बनाया। जिसे गाना किसी भी नागरिक के लिए बाध्यकारी होता है। इसे गीत का दर्जा दिया गया और इस बात की खुली छूट दी गयी कि कोई चाहे तो इसे गाये न चाहे तो न गाये।
अब इसे नेहरू का फैसला माना जाए या फिर टैगोर का? और उसे मानने और लागू करने वालों में न केवल सुभाष चंद्र बोस और राजेंद्र प्रसाद बल्कि पूरी कांग्रेस शामिल थी। इन तथ्यों के सामने आने के साथ ही पीएम मोदी का पूरा मंसूबा धराशायी हो गया। वंदेमातरम की जिस तलवार को वह नेहरू के खिलाफ मोड़ना चाह रहे थे वह टैगोर के खिलाफ मुड़ गयी। नतीजतन उन्होंने तात्कालिक तौर पर जिस पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए इसे मुद्दा बनाने की कोशिश की थी वह भी औंधे मुंह गिर गया। दूसरे तरीके से कहें तो अब यह फायदा से ज्यादा नुकसानदायक साबित होने जा रहा है।
क्योंकि इस बहस के जरिये उन्होंने नेहरू के अलावा एक दूसरे नाम टैगोर को भी दुश्मन की श्रेणी में खड़ा कर दिया है। वैसे भी पश्चिम बंगाल के लिए टैगोर अब कोई महज एक शख्सियत नहीं बल्कि साहित्यिक, सांस्कृतिक और वैचारिक ऊर्जा के किरणपुंज बन गए हैं और पूरा बंगाल उनसे ऊर्जा ग्रहण करता है।
दरअसल बीजेपी अपने हिंदू राष्ट्र के निर्माण के अभियान को अब एक दूसरे चरण में ले जाना चाहती है। जिसमें वंदेमातरम उसके लिए किसी हथियार से कम नहीं है। बीजेपी-आरएसएस एक ऐसा हिंदू राष्ट्र बनाना चाहते हैं जिसमें हिंदुओं और दूसरे शब्दों में कहा जाए तो द्विजों को सर्वोच्च दर्जा हासिल हो। बाकी धर्मों के लोगों के लिए बीजेपी-आरएसएस के वैचारिक गुरु सावरकर और गोलवलकर के मुताबिक दोयम दर्जा हासिल होगा। इस व्यवस्था की सांस्कृतिक और वैचारिक अभिव्यक्ति के लिहाज से वंदेमातरम सबसे फिट बैठता है।
उसको पता है कि एकबारगी अगर उसने सांस्कृतिक वर्चस्व हासिल कर लिया तो समाज को अपनी दिशा में मोड़ना बहुत आसान हो जाएगा। क्योंकि किसी भी शख्स को किसी दिशा में ले जाने के लिए सबसे पहले जरूरी होता है कि उसे दिमागी यानि वैचारिक तौर पर तैयार किया जाए। उस लिहाज से यह गीत किसी ब्रह्मास्त्र से कम नहीं है। इस बात की पूरी आशंका है कि आने वाले दिनों में बीजेपी कहीं ‘जन, गण, मन’ की जगह इसे ही राष्ट्रगान का दर्जा देने का प्रस्ताव न पारित करा दे। या फिर राष्ट्रगान के साथ-साथ किसी भी सार्वजनिक और सरकारी आयोजन के मौके पर इसे भी गाने के लिए बाध्यकारी बना दे।
और इतना नहीं अभी तक संविधान सभा से पारित केवल दो लाइनों के गाने के फैसले को बढ़ाकर पूरे गीत को ही गाने के लिए प्रस्तावित न कर दे। और इस तरह से हिंदू बनाम मुस्लिम की एक स्थाई सरकारी लकीर खींच दे जो अभी तक कम से कम किसी संवैधानिक या फिर संस्थागत रुप में स्वीकार नहीं किया गया है।
यहां संघ-बीजेपी की एक विडंबना की तरफ भी इंगित करना जरूरी होगा। यह गीत सबसे ज्यादा उस समय लोकप्रिय हुआ जब बंगाल का अंग्रेजों ने विभाजन किया था। विभाजन के खिलाफ आंदोलन का न केवल यह प्रमुख नारा और गीत बना बल्कि लोगों के जेहन में अपनी मातृभूमि के प्रति ऐसा भाव भर दिया कि लोग कुर्बानियां देने के लिए तैयार हो गए। उसी का नतीजा था कि अंग्रेजों को अपना वह फैसला वापस लेना पड़ा। लेकिन उस समय भी हिंदू कट्टरपंथी धारा ने बिल्कुल अलग रुख अख्तियार किया।
वह न केवल विभाजन के पक्ष में थी बल्कि अंग्रेजों की खुली समर्थक थी। क्योंकि उन्होंने उसे कथित मुस्लिम सत्ता से निजात दिलायी थी। और इसके पीछे उनका अपना तर्क और लाभ भी छुपा था जिसमें उनका कहना था कि बंगाल के एक रहने पर मुसलमानों की तादाद ज्यादा हो जाएगी लिहाजा उस सूबे में उसकी स्थायी सत्ता बनी रहेगी। और हिंदुओं को मुसलमानों के मातहत रहना होगा। ऐसे में विभाजन के जरिये ही इस समस्या को हल किया जा सकता है। जिससे हिंदुओं की सत्ता बनी रहे। यही वजह है कि वह खुले तौर पर विभाजन के पक्ष में थे। और शायद अपने तरीके से हिंदू कट्टरपंथियों ने देश के विभाजन की पहली नींव यहीं रख दी थी। अनायास नहीं बाद में विभाजन की सशक्त पैरोकार मुस्लिम लीग के साथ समय-समय पर उसने गलबहियां की। और यहां तक कि 1942 में तीन सूबों में संयुक्त सरकारें गठित की।
(महेंद्र मिश्र जनचौक के संपादक हैं।)