ट्रंप 2.0 राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति (NSS) का दस्तावेज: रूस, चीन, यूरोप, लैटिन अमेरिका, मध्यपूर्व, एशिया और भारत के प्रति ट्रंप की भावी रणनीति

ट्रंप प्रशासन ने अपने दूसरे कार्यकाल के लिए देशी और वैश्विक दीर्घकालिक राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति (National Security Strategy) जारी कर दिया है। इस करीब 27 पृष्ठों के दस्तावेज में यह स्पष्ट तौर पर रेखांकित किया गया है कि अमेरिका वर्तमान वैश्विक संकटों को कैसे देख रहा है। रूस, चीन और यूरोप के प्रति उसका नजरिया क्या है? इस नीति में बुनियादी परिवर्तन क्या आया है? लैटिन अमेरिका और कैरेबियन देशों के प्रति उसके रुख में क्या बुनियादी परिवर्तन हुआ है? मध्यपूर्व के बारे में उसकी नीति में क्या मूल बदलाव हुआ है? भारत इस दीर्घकालीन नीति में कहां खड़ा है और स्वयं अमेरिका का अपने देश के बारे में प्राथमिकताओं में क्या परिवर्तन हुआ है?  

1- अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति दस्तावेज की पहली सबसे बड़ी रेखांकित करने वाली बात यह है कि उसने यह घोषणा कर दिया है कि वैश्विक सुरक्षा की जिम्मेदारी उसकी नहीं है, वह वैश्विक सुरक्षा की रणनीति के नेतृत्व से पीछे हट रहा है। 

उसकी सुरक्षा की पहली प्राथमिकता अमेरिकी महाद्वीप (Western Hemisphere) है। उत्तरी अमेरिका और दक्षिणी अमेरिका, जिसमें कैरेबियन देश भी शामिल हैं। इसका मतलब है मुनरो डाक्ट्रिन (Monroe Doctrine-1823) नए रूप में लागू करना। अमेरिका लैटिन अमेरिका और कैरेबियन देशों में किसी दूसरे देश (विशेषकर चीन के प्रभाव) को सीमित करेगा। अमेरिकी महाद्वीप को अमेरिका नए सिरे से अपना मुख्य प्रभाव क्षेत्र घोषित किया है।   

2-अमेरिकी महाद्वीप की सुरक्षा को पहली प्राथमिकता घोषित करने के अन्य निहितार्थ इस प्रकार हैं

(क)- यूक्रेन सहित यूरोप की सुरक्षा की मुख्य जिम्मेदारी अमेरिका की नहीं है। यूरोपीय देशों को अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी खुद ही उठानी होगी। यूक्रेन की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी यूक्रेन और यूरोप की है। 

(ख) इंडो-पैसिफिक की सुरक्षा की चिंता अमेरिका की तो है, लेकिन इसका बोझ वह अकेले नहीं उठाएगा। इसकी यह पहली प्राथमिकता भी नहीं है। 2022 के बाइडेन (राष्ट्रपति) प्रशासन काल के अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति में इंडो-पैसिफिक की सुरक्षा अमेरिका ने अपनी पहली प्राथमिकता घोषित की थी। इंडो-पैसिफिक की सुरक्षा चीन की बढ़ती सैन्य ताकत, तकनीकी ताकत और आर्थिक ताकत से जुड़ी हुई थी। भारत की सुरक्षा रणनीति का भी यह कोर था। अमेरिका ने साफ कह दिया है कि इंडो-पैसिफिक सुरक्षा-शांति की जिम्मेवारी आस-पास के देशों की है। हां अमेरिका उसमें सहयोगी भूमिका में रहेगा, लेकिन वह इसका नेतृत्व नहीं करेगा और न ही बड़े पैमाने पर संसाधन खर्च करेगा। 

भारत के लिए अमेरिकी रणनीति में यह परिवर्तन काफी मायने रखता है। जब इंडो-पैसिफिक अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति में केंद्रीय महत्व का था, भारत की उसमें केंद्रीय भूमिका बन गई थी। भारत के साथ के बिना सैन्य और अन्य रणनीतिक सहयोग के बिना अमेरिका यह केंद्रीय भूमिका नहीं निभा सकता था। अब जब अमेरिका ने स्वयं को इंडो-पैसिफिक की सुरक्षा के केंद्रीय महत्व से बाहर कर लिया है, तो स्वाभाविक तौर भारत की इस मामले में अमेरिका के लिए जरूरत बहुत कम रह जाती है। इंडो-पैसिफिक की सुरक्षा-शांति की जिम्मेदारी भारत को अन्य सहयोगियों के साथ स्वयं ही उठानी पड़ेगी। थोड़ा सरल और साफ शब्दों में कहें तो अमेरिका की वर्तमान राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति में भारत की केंद्रीय भूमिका खत्म हो गई है, विशेषकर इंडो-पैसिफिक में यानी चीन के संदर्भ में। चीन से दोस्ती-दुश्मनी निभाने की मुख्य जिम्मेदारी स्वयं भारत की है। 

(ग) इंडो-पैसिफिक की सुरक्षा को केंद्रीय महत्व न देना चीन के लिए सुकूनदायी स्थिति है। यह दस्तावेज साफ तौर पर अमेरिकी महाद्वीप में चीन के बढ़ते प्रभाव को तो सीमित करना चाहता है, रोकना चाहता है, लेकिन इंडो-पैसिफिक में उसके बढ़ते प्रभाव को रोकना अमेरिका की पहली प्राथमिकता नहीं रह गई है। इंडो-पैसफिक में चीन और अमेरिका के बीच सीधी टकराहट की संभावनाएं फिलहाल इस दस्तावेज के अनुसार तो बहुत कम हो गई हैं। 

(घ) अमेरिका द्वारा वैश्विक सुरक्षा रणनीति का नेतृत्व छोड़ने की घोषणा करने और यूरोप-यूक्रेन को अपनी सुरक्षा खुद करने को कहने के चलते सबसे अधिक राहत रूस को हुई है। इस दस्तावेज में अमेरिका ने रूस को किसी तरह से अपना रणनीतिक दुश्मन नहीं घोषित किया है और रूस से किसी तरह के खतरे की बात नहीं की गई है। यूक्रेन-रूस युद्ध का मामला अमेरिका ने यूरोप-यूक्रेन पर छोड़ दिया है। शायद इसी के चलते रूस ने इस दस्तावेज की खुले दिल से प्रशंसा की है। 

अमेरिका की यह वर्तमान सोच बाइडेन प्रशासन (2022) की उस राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति से अलग है, जिसमें चीन-रूस को अमेरिका के लिए रणनीति तौर पर सबसे बड़े खतरे के रूप में चिन्हित किया गया था। 

3- यूरोप पर अमेरिका का तीखा हमला 

इस दस्तावेज में सबसे तीखा हमला यूरोप पर बोला गया है। यूरोप के बारे में कहा गया है कि वह सभ्यतागत संकट से गुजर रहा है। साफ शब्दों में कहा गया है कि यूरोप के विभिन्न देशों में इतने प्रवासी (अफ्रीका-एशिया) आकर बस रहे हैं कि आने वाले दिनों में यूरोप के कई देशों की पहचान मिट जाएगी। साफ संकेत है कि यूरोप के कई देश गोरे लोगों के देश नहीं रह जाएंगे। उनकी सभ्यता-संस्कृति यूरोपीय नहीं रह जाएगी। 

इसके साथ यूरोप द्वारा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और संगठन की स्वतंत्रता पर पाबंदी की भी आलोचना की गई है। इसका सीधा मतलब यूरोप के विभिन्न देशों में धुर-दक्षिणपंथी संगठनों-पार्टियों और नाजी समूहों (विशेषकर जर्मनी) की गतिविधियों को सीमित करने की यूरोपीय देशों की कोशिश। ट्रंप और उनके उपराष्ट्रपति जेडी वेंस पहले ही यूरोपीय देशों की दक्षिणपंथी पार्टियों-संगठनों के साथ सहानुभूति और समर्थन जाहिर कर चुके हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बढ़ाने के नाम पर ट्रंप कालीन अमेरिका यूरोप के धुर दक्षिणपंथी पार्टियों-संगठनों और नाजीवादी समूहों को अपनी गतिविधियों को चलाने की खुल छूट की मांग कर रहा है।

इसके साथ ही यह दस्तावेज यूरोप की सामाजिक नीतियों की भी आलोचना करता है। इसमें यूरोप में ट्रांसजेंडर, गे-लेस्बियन की आजादी, शादी की इजाजत और अन्य स्वतंत्रता और इससे जुड़े कानून। अमेरिका पुराने पारिवारिक-सामाजिक मूल्यों की स्थापना की वकालत कर रहा है। ट्रंप अपने देश में गे-लेस्बियन और ट्रांस जेंडर के प्रति हमलावर हैं और इनकी स्वतंत्रता और आज़ादी के विरोधी हैं। यही नीति वे यूरोप से भी चाहते हैं। 

तीसरी बात यह कि अमेरिका ने इस दस्तावेज में साफ कर दिया है कि यूरोप की सुरक्षा उसकी पहली प्राथमिकता नहीं है और न यूरोप पहले जैसा उसका सुरक्षा साझीदार है। नाटो रहेगा, लेकिन उसकी जिम्मेदारी सामूहिक तौर पर इसके सभी सदस्य देशों की होगी। अमेरिका इसका नेतृत्व और सैन्य-आर्थिक बोझ नहीं उठाएगा।

4- अमेरिका लोकतंत्र का कोई मॉडल दुनिया में लागू करने की कोशिश नहीं करेगा

यह दस्तावेज साफ तौर पर यह रेखांकित करता है कि कोई देश कौन सा राजनीतिक मॉडल अपनाता है, शासन की कौन सी पद्धति चुनता है, अमेरिका का इससे कोई ज्यादा सरोकार नहीं है। विशेष तौर पर मध्यपूर्व के देशों (सऊदी अरब आदि) के बारे में, जहां बादशाहत कायम है, शेख शासन करते हैं, जहां राजनीतिक लोकतंत्र जैसी कोई चीज नहीं है। इस नीति का असर रूस और चीन के मामले में पड़ेगा, जिनके लोकतांत्रिक मॉडल की अमेरिका आलोचना करता रहा है और कभी-कभी तख्तापलट की भी कोशिश करता रहा है।

ट्रंप अपने देश में ही लोकतंत्र (जितना और जैसा भी है) धज्जियां उड़ा रहे हैं। उन्होंने दुनिया भर में लोकतंत्र की घोषित अमेरिकी ठेकेदारी को छोड़ने की साफ-साफ घोषणा कर दी है। धुर दक्षिणपंथ और फासीवादी रुझान के नेता और पार्टी उनके पसंदीदा हैं। यूरोप और दुनिया में ऐसे लोगों को अपने सहयोगी-साथी के रूप में देखते हैं। 

5- अमेरिका फस्ट 

यह दस्तावेज अमेरिकी आर्थिक ताकत, सैन्य ताकत और अन्य ताकत बढ़ाने को अपनी पहली प्राथमिकता घोषित किया है। अमेरिका कुछ भी करेगा, तो सबसे पहले देखेगा कि इससे सीधे अमेरिका को क्या फायदा हो रहा है। इसके लिए ठोस तौर पर निम्न बातें कही गई हैं- 

(क) अमेरिकी उद्योगों का पुनर्निर्माण

( ख) रक्षा उत्पादन और सैन्य साजो-सामान बढ़ाना

(ग) दूसरे देशों से आयात पर टैरिफ लगाना। 

(घ) सामान्य-वस्तुओं और सेवाओं की उपलब्धता अमेरिका के अंदर करना, जिससे वैश्विक आपूर्ति व्यवस्था पर निर्भरता कम से कम हो सके।

(ड) अमेरिका के व्यापार घाटे को कम करना। मतलब आयात बढ़ाना और निर्यात कम करना। 

(च) वैश्विक सुरक्षा और व्यवस्था में अमेरिकी आर्थिक हिस्सेदारी को कम से कम करना। जैसे संयुक्त राष्ट्र के विभिन्न संगठनों की विश्वव्यापी गतिविधियों में आर्थिक सहयोग कम करना। वैश्विक सैन्य खर्चे पर कटौती इसका एक मुख्य लक्ष्य है।

4-इस दस्तावेज में जलवायु परिवर्तन सुरक्षा के लिए कोई खतरा है, इसे  खारिज किया गया। पिछली सरकारों के विपरीत, इस रणनीति में क्लाइमेट चेंज को राष्ट्रीय सुरक्षा चुनौती नहीं माना गया।

6- अमेरिका की इस राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति में भारत

जैसा कि ऊपर चर्चा की जा चुकी है कि इंडो-पैसिफिक अमेरिका के लिए पहली प्राथमिकता नहीं रह गया है। अमेरिका चीन के साथ अपना आर्थिक सहयोग और मजबूत बनाना चाहता है। वह चीन की इंडो-पैसिफिक में चुनौती के रूप में तो देख रहा है, लेकिन दुश्मन के रूप में नहीं। वह एशिया और इंडो-पैसिफिक में चीन के प्रभाव को सीमित रखने के लिए क्वैड (QUAD) बनाए रखना चाहता। इन दोनों के साथ सहयोग जारी रखना चाहता है, लेकिन इसकी प्राथमिक और मुख्य जिम्मेदारी खुद उठाने से पीछे हट गया है। वह चाहता है कि इसकी जिम्मेदारी उठाने में क्वैड के सदस्य देश समान रूप से साझेदार बने। एशिया में शक्ति संतलुन बनाने में जापान और दक्षिण कोरिया जिम्मेदारी उठाएं। 

इंड़ो-पैसिफिक में अमेरिका की इस रणनीति के चलते भारत-चीन को नियंत्रित करने वाले एक देश के रूप में अमेरिका के लिए अपनी मुख्य महत्ता खो चुका है। ऐसी स्थिति में अमेरिका भारत को चीन को नियंत्रित करने में सहयोग के बदले कोई आर्थिक, तकनीकी या सैन्य रियायत या विशेष सहयोग नहीं देने वाला है। वह भारत से अपने रिश्ते अपने फायदों, विशेषकर आर्थिक फायदों के हिसाब से चलाएगा।

हां, रूस के प्रति अमेरिका के बदलने नजरिए भारत को राहत मिल सकती है। वह बिना अमेरिकी दबाव के रूस के साथ अपने संबंधों को बढ़ा सकता है। भारत और चीन के रिश्ते भी दोनों देश खुद तय करने के लिए पहले से ज्यादा आजाद होंगे, विशेषकर भारत, क्योंकि जब अमेरिका खुद ही चीन को अपना कोई तात्कालिक दुश्मन कम से कम एशिया पैसिफिक या इंडो-पैसिफिक में नहीं मान रहा है, तो भारत ऐसा मानने के लिए कैस बाध्य कर सकता है। 

यह दस्तावेज देखने पर साफ लगता है कि अमेरिकी नेतृत्व में द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद बनी विश्व व्यवस्था और संस्थाएं अपनी महत्ता खो चुकी हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ और उसकी सहयोगी संस्थाएं नाम की रह गई हैं। विश्व व्यापार संगठन की बहुत पहले ही ट्रंप ने ही ऐसी तैसी कर दी है। अब अमेरिका ने घोषित तौर पर विश्व का नेतृत्व करने से अपने को पीछे कर लिया है।

अमेरिका को चीन से निपटने के लिए फिलहाल भारत की जरूरत नहीं है। यूरोप चौतरफा गहरे संकट में है, खस्ताहाल होती आर्थिक स्थिति के साथ सुरक्षा की भी उसकी गारंटी खत्म हो चुकी हैं। नाटो बरकरार रहेगा, लेकिन अमेरिका वैश्विक रणनीति का नेतृत्व करने को तैयार नहीं है। सबको अपनी सुरक्षा अपने ही करनी होगी। कभी मरता सा दिख रहा रूस ताकतवर बनकर खड़ा हो गया है। चीन की विश्व में बढ़ती हैसियत को अमेरिका और दुनिया ने स्वीकार कर लिया है। 

अमेरिका (ट्रंप) की राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति (NSS) का रूस ने स्वागत किया है, जबकि यूरोप और यूरोपीय संघ ने इस पर अपनी तीखी प्रतिक्रिया दी है। जर्मनी ने इसे अंतरिम मामलों में हस्तक्षेप कहा है।

(डॉ. सिद्धार्थ लेखक और पत्रकार हैं।)

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