Tuesday, March 5, 2024

सीओपी-28 में पर्यावरण की चिंता, विकसित देशों की योजना और घोषणापत्र पर हस्ताक्षर से भारत का इनकार

नई दिल्ली। 3 दिसम्बर, 2023 को अबू धाबी में सीओपी-28 की मीटिंग में जब ‘जलवायु और स्वास्थ्य पर उद्घोषणा’ पेश की गयी तब भारत ने इस पर हस्ताक्षर करने से इंकार कर दिया। इस पर 124 देशों ने सहमति जताई। लेकिन, भारत इससे दूर रहा। भारत ने सीओपी-28 की मीटिंग शुरू होने के पहले, और उस दौरान भी साफ शब्दों में कहा कि भारत विकास की जरूरतों के लिए आवश्यक ऊर्जा की मांग को पूरा करने को सर्वोपरि रखेगा।

सीओपी-28 की उद्घोषणा का मूल स्वर था फॉसिल ऊर्जा संसाधनों के प्रयोग को फेज आउट करना यानी इसके प्रयोग को धीरे धीरे समाप्ति की ओर ले जाना और ऐसे संसाधनों के प्रयोग की ओर बढ़ना जिससे कार्बन और मीथेन का उत्सर्जन कम होता जाए; इसे रिन्यूएबल सोर्स की तरह चिन्हित किया गया।

यह पेरिस में हुए सीओपी-15 के काफी करीब है- जिसमें बिजली उत्पादन में कोयले की निर्भरता में कमी लाने, कार्बन उत्सर्जन को कम करने, स्वास्थ्य सेवा में कचरे के कम उत्पादन पर जोर देने और स्वास्थ्य की ऐसी व्यवस्था को विकसित करने की बात कही गई, जो जलवायु परिवर्तन से पैदा होने वाली बीमारियों के उपचार की व्यवस्था कर सके।

भारत के लिए यहां सबसे बड़ी समस्या न सिर्फ कार्बन उत्सर्जन को लेकर थी, बल्कि ग्रीन हाउस प्रभाव को कम करने के उपाय को लेकर भी थी। भारत में दवाओं आदि के लिए बड़े पैमाने में पर कोल्ड स्टोरेज की जरूरत पड़ती है।

पर्यावरण और वन मंत्रालय सचिव के अनुसार यदि हम उत्सर्जन पर ध्यान देंगे तब स्वास्थ्य के विकल्प की अनदेखी करेंगे। ऐसे में दूसरा विकल्प छोड़ना मुश्किल है। वैसे भी भारत दवाओं का एक निर्यातक देश है। यदि वह इस उत्सर्जन को कम करने के सीओपी-28 के सुझावों की ओर जाएगा तब उसके आर्थिक अवसरों पर नुकसान पहुंचेगा।

इसी से जुड़ा मसला, भारत केम ऊर्जा संसाधनों का प्रयोग है। भारत बिजली उत्पादन का अधिकांश हिस्सा कोयला आधारित संयत्रों के माध्यम से करता है। हाइड्रो बिजली परियोजनाएं उस तरह से विकसित नहीं हो पाईं जैसी उम्मीद तीस साल पहले की गई थी।

प्रति व्यक्ति बेहद कम बिजली खपत वाले देश में बिजली की मांग अब भी बनी हुई है। ऐसे में, भारत कोयला उत्पादन को बढ़ाने में ही लगा हुआ है। हाल में छपी खबरों के अनुसार भारत कोयले की घरेलू मांग में अब आत्मनिर्भर होने की ओर बढ़ गया है।

यही स्थिति पेट्रोलियम की मांग और पूर्ति की भी है। भारत, पेट्रोलियम के सबसे बड़े आयातक देशों में से एक है। रूस और यूक्रेन के बीच हुए युद्ध से बने हालात में भारत ने यहां की रिफाइनरियों का प्रयोग करते हुए एक निर्यातक की भूमिका में आ गया है। भारत पिछले 25 सालों से ऑटोमोबाइल क्षेत्र में एक ‘क्रांति’ करने में लगा हुआ है। सड़कों का विशाल जाल न सिर्फ कार बाजार को फैलाने की ओर ले गया है, माल ढुलाई में भी इसका प्रयोग तेजी से बढ़ा है।

ऊर्जा के इन संसाधनों का प्रयोग और पूंजी निवेश की चाह में भारत ‘विकास’ की जरूरतों के मद्देनजर सीओपी-28 में फॉसिल ऊर्जा संसाधनों के प्रयोग को कम करते हुए इसे खत्म करने की मांग पर हस्ताक्षर करने से इंकार कर दिया।

भारत ने रिन्यूएबल यानी अकार्बनिक उत्सर्जन वाले ऊर्जा उत्पादन को 2030 तक 130 गीगावाट से बढ़ाकर 450 गीगावाट करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। यानी वह वैकल्पिक संसाधनों पर काम करने के लिए अपने वादे को दोहराया है। लेकिन, उसकी मांग यह बनी रही कि विकसित देश इस सदंर्भ में तकनीक को जरूरतमंद देशों को उपलब्ध करायें और इसके लिए जरूरी पूंजी को भी उपलब्ध कराने में सहयोग करें।

इस बार सीओपी-28 की मीटिंग में खेती और पर्यावरण का मसला जोड़ दिया गया है। एक बेहतर खाद्य प्रणाली को विकसित करने को लेकर वार्ताओं का दौर जारी है। आमतौर पर सीओपी के तहत औद्योगिक उत्सर्जन को लेकर बात होती रही है। खेती का संदर्भ, सीओपी के पेरिस सम्मेलन में बेहद महत्वपूर्ण तरीके से उठाया गया था।

विश्व तामपान बढ़ने से असामान्य बारिश, गर्मी के मौसम का बढ़ना और सूखे की स्थिति पैदा होने की वजह से खाद्य संकट की स्थितियां बार बार बन रही हैं। इस संदर्भ में पर्यावरण की आम समस्या न सिर्फ सामान्य जीवन को प्रभावित कर रही है, यह खेती से जुड़े किसानों और खुद खेती के पैटर्न को भी प्रभावित कर रही है।

ऐसे में एक महत्वपूर्ण पहलकदमी खेती के पैटर्न को नये सिरे से व्यवस्थित करना भी हो गया है। इसे रिजेनरेटिव खेती का नाम दिया गया है, जो बदलते पर्यावरण में खेती के अनुकूलन को बना सके। इस बार की घोषणा में कहा गया है- ‘हम मानते हैं कि जलवायु परिवर्तन की जरूरतों के प्रत्युत्तर में कृषि और खाद्य प्रणालियों में तुरंत बदलाव होना चाहिए और इसके तरीकों को जलवायु परिवर्तन के हिसाब से विकसित किया जाना चाहिए’।

अबू धाबी में सीओपी-28 की घोषणाओं और कार्यभारों को लेकर अभी चल रही मीटिंगों में पर्यावरण की चिंता साफ दिख रही है। कार्बन उत्सर्जन से बढ़ रहे विश्व तापमान को लेकर व्यक्त की जा रही चिंताओं पर ‘विकास’ की छाया लगातार बनी हुई है। विकसित देशों ने कार्बन उत्सर्जन में जितना योगदान दे दिया है और विश्व तापमान में जितनी वृद्धि कर रखी है, अब उसे वहीं पर रोक देने और उसे कम करने के लिए जो जो उपाय सुझाए जा रहे हैं, वे फिलहाल जमीन पर उतरने लायक नहीं दिख रहे हैं।

दुनिया का ऑटोमोबाइल क्षेत्र 91 प्रतिशत ऊर्जा संसाधन के नाम पर पेट्रोलियम का प्रयोग करता है। यही स्थिति कोयले की भी है। कई देशों की अर्थव्यवस्था इन्हीं ऊर्जा संसाधनों के आधार पर टिकी हुई हैं और बहुत से देश जिसमें भारत और चीन शामिल हैं, इन संसाधनों के प्रयोग के बिना चलने की स्थिति में नहीं हैं।

साम्राज्यवादी पूंजीवादी व्यवस्था ने पिछले 30 सालों में खेती से लेकर जमीन के नीचे संसाधनों पर कब्जा बनाने के लिए विश्व व्यापार संगठन बनाया और अंधाधुंध लूट का आगे बढ़ाया। पूरी दुनिया को धु्र्वीकृत कर नाभिकीय युद्ध के कगार पर पहुंचा दिया।

आज वे ही साम्राज्यवादी देश जब खेती उत्पादन के पैटर्न से लेकर ऊर्जा संसाधनों के प्रयोग पर बात तो कर रहे हैं, लेकिन न तो वे आवश्यक पूंजी की मांग को पूरा करने के लिए आगे आ रहे हैं और न ही आवश्यक तकनीकों का हस्तांतरण करने के लिए तैयार हैं। ऐसे में, सीओपी की पिछली अन्य मीटिंगों और घोषणाओं की तहर यह मीटिंग भी सिर्फ बातों का सिलसिला ही रह जाने के लिए अभिशप्त होगी।

पर्यावरण को बचाने के लिए सबसे जरूरी मसला है, अपने देश के भीतर की समस्याओं को समझना और उसे विश्व के बरक्स रखकर देखना। यदि यह काम विकसित देशों की जनता करती है और वहां के कार्बन उत्सर्जन को लेकर आंदोलन को आगे बढ़ाती है, तब भारत जैसे देश में भी यह आंदोलन का रूप ले लेगा। पूंजीवादी मुनाफे की होड़ सिर्फ मुनाफा देखती है और इसके लिए इंसान और प्रकृति सब संसाधन होते हैं।

अपने देश में पर्यावरण को सिर्फ पेड़ लगाने जैसी औपचारिकता से आगे बढा़ते हुए इसे उत्पादन, संसाधनों के दोहन और इंसान के साथ इसके रिश्ते के संदर्भ में रखते हुए समझना होगा। तभी हम पंजाब की खेती का संकट समझ सकते हैं और दिल्ली जैसे शहरों में सांस की घुटन की असलियत को सामने ला सकते हैं। तभी हम कह सकते हैं कि साफ हवा अधिकार जीने के अधिकार का हिस्सा है। जहर भरी हवा हमारे हिस्से नहीं आनी चाहिए।

(अंजनी कुमार पत्रकार हैं।)

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