Friday, January 27, 2023

दस गुना ज्यादा तेजी से पिघल रहे हैं हिमालय के ग्लेशियर

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हिमालय के ग्लेशियर पहले के मुकाबले 10 गुना ज्यादा तेजी से पिघल रहे हैं, जिसके चलते भारत सहित एशिया के कई देशों में जल संकट गहरा सकता है। लीड्स विश्वविद्यालय ने इस बारे हाल में अध्ययन कराया है, जिसे जर्नल साइंटिफिक रिपोर्ट्स में प्रकाशित किया गया है।

अध्ययन में कहा गया है कि जिस तेजी से ग्लेशियर पिघल रहे हैं उससे गंगा, ब्रह्मपुत्र और सिंधु नदी में जल संकट पैदा हो सकता है। इन नदियों पर निर्भर करोड़ों लोगों की समस्याएं पहले के मुकाबले बढ़ जाएंगी।


नेपाल के शोधकर्ताओं ने तो यहाँ तक चेतावनी दे दी है कि हिमालय की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट पर स्थित सबसे ऊँचा ग्लेशियर इस शदी के मध्य तक विलुप्त हो सकता है, क्योंकि करीब दो हजार वर्ष पुरानी बर्फ की पट्टियां खतरनाक गति से पिघल रही हैं। नेपाल की राजधानी काठमांडू में स्थित इंटरनेशनल सेंटर फार इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (आईसी मोड) ने कहा है कि एवरेस्ट की बर्फ-पट्टियों के पिघलने की दर 1990 के दशक से काफी तेज हो गई है। बर्फ पिघलने की यह दर दो हजार साल पहले बर्फ जमने की दर से 80 गुना अधिक आंकी गई है। एवरेस्ट के दक्षिणी ढाल पर 7945 और 8430 मीटर की ऊंचाई पर स्थित विश्व के सबसे ऊंचे मौसम केन्द्रों से इसका पर्यवेक्षण किया जा रहा है।


यूनिवर्सिटी ऑफ लीड्स के शोधकर्ता डॉ. जोनाथन कैरविक ने बताया कि पिछली शताब्दियों की तुलना में हिमालयी ग्लेशियर औसतन 10 गुना ज्यादा तेजी से पिघल रहे हैं। नुकसान की यह दर पिछले कुछ दशकों में काफी बढ़ गई है, इसके लिए इंसानों की हरकत की वजह से जलवायु में आ रहा बदलाव जिम्मेवार है। हाल के दशकों में हिमालय के ग्लेशियर जिस तेजी से पिघल रहे हैं उसकी रफ्तार 400-700 साल पहले हुई ग्लेशियर विस्तार की घटना जिसे हिमयुग कहा जाता है के मुकाबले दस गुना ज्यादा है।


अंटार्कटिका और आर्कटिक के बाद हिमालय के ग्लेशियरों में सबसे ज्यादा बर्फ जमा है। यही वजह है कि इसे दुनिया का तीसरा ध्रुव भी कहा जाता है। उपग्रहों से प्राप्त चित्रों और डिजिटल तकनीक की मदद से शोधकर्ताओं ने करीब 400 से 700 साल पहले हिमालय में मौजूद 14,798 ग्लेशियरों की रुपरेखा तैयार की है।


साथ ही बर्फ की सतह के मॉडल का पुनर्निर्माण किया गया है, जिससे उन ग्लेशियरों की लम्बाई और उनमें जमा बर्फ का अनुमान लगाया जा सके और यह जाना जा सके कि तब से लेकर अब तक इन ग्लेशियरों से कितनी बर्फ, किस रफ़्तार से पिघल चुकी है। मॉडल से पता चला है कि आज हम जो ग्लेशियर देख रहे हैं, उनका क्षेत्रफल पहले के मुकाबले 40 फीसद कम है। जो अपने शिखर पर 28,000 वर्ग किलोमीटर से घटकर 19,600 वर्ग किलोमीटर रह गए हैं।


अनुमान है कि इस अवधि में ग्लेशियर 586 क्यूबिक किलोमीटर बर्फ खो चुके हैं। इतनी बर्फ आज मध्य यूरोपीय आल्प्स, काकेशस और स्कैंडिनेविया में संयुक्त रूप से मौजूद है। शोधकर्ताओं का मानना है कि यदि इतनी बर्फ एक साथ पिघल जाए तो दुनिया भर में समुद्र के जलस्तर में करीब 1.38 मिलीमीटर की वृद्धि हो जाएगी।


शोध में पता चला है कि पूर्वी हिमालय के नेपाल और भूटान में मौजूद ग्लेशियर बड़े पैमाने पर पिघल रहे हैं। संभवतः ऐसा पर्वत श्रृंखला के दोनों किनारों पर भौगोलिक विशेषताओं में अंतर और वातावरण के साथ परस्पर प्रतिक्रिया के कारण हो रहा है। इसी तरह जिन ग्लेशियरों के किनारे झीलों से मिले हुए हैं वे कहीं ज्यादा तेजी से घट रहे हैं। क्योंकि भूमि की तुलना में झीलों पर ग्लोबल वार्मिंग का प्रभाव ज्यादा होता है।


शोधकर्ताओं के मुताबिक जिस तरह से इन झीलों की संख्या और आकार में वृद्धि हो रही है, वह दर्शाता है कि इन ग्लेशियरों को बड़े पैमाने पर, निरंतर तेजी से नुकसान पहुँच रहा है। जिन ग्लेशियरों में प्राकृतिक तौर पर मलबे की मात्रा अधिक है वे भी तेजी से पिघल रहे हैं। अनुमान है कि कुल ग्लेशियरों का केवल 7.5 फीसदी होने के बावजूद उन्होंने ग्लेशियरों को होने वाली कुल हानि में करीब 46.5 फीसदी का योगदान किया है।


जर्नल द क्रायोस्फीयर में प्रकाशित एक अन्य शोध से पता चला है कि दुनिया भर में जमा बर्फ के पिघलने की रफ्तार तापमान बढ़ने के साथ बढ़ती जा रही है| 2017 में ग्लेशियरों और अन्य जगहों पर जमा बर्फ 1990 की तुलना में 65 फीसदी ज्यादा तेजी से पिघल रही थी| अनुमान है कि 1994 से 2017 के बीच 28 लाख करोड़ टन बर्फ पिघल चुकी है|


अंतराष्ट्रीय जर्नल नेचर के प्रकाशित एक अन्य आलेख के मुताबिक वैश्विक स्तर पर ग्लेशियरों के पिघलने की दर 2015 से 2019 के बीच रिकॉर्ड 29,800 करोड़ टन प्रतिवर्ष पहुंच गई थी, जिसका मतलब है कि पिछले 20 वर्षों में बर्फ के खोने की दर में 31.3 फीसदी का इजाफा हुआ है| वैज्ञानिकों का मानना है कि जिस तेजी से ग्लेशियर पिघल रहे हैं उसका असर करोड़ों लोगों के जीवन पर पड़ेगा। अनुमान है कि इसके चलते अगले तीन दशक में करीब एक सौ करोड़ लोग पीने के पानी और खाद्य की कमी का सामना करने को मजबूर हो जाएंगे|

(अमरनाथ झा वरिष्ठ पत्रकार होने के साथ पर्यावरण मामलों के जानकार भी हैं। आप आजकल पटना में रहते हैं।)

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