Sunday, May 22, 2022

बढ़ते तापमान से जल-उपलब्धता को खतरा

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भारत में गर्मी के लिहाज से इस साल भी पिछले साल-2021 जैसी स्थितियां हैं। देश के कुछ हिस्सों में फरवरी में ही तापमान 40 डिग्री सेल्सियस पर पहुंच गया। जलवायु परिवर्तन के दौर में यह घटना उल्लेखनीय इसलिए है कि यह ला नीना वर्ष था, प्रशांत महासागर में चलने वाली इस जलधारा का प्रभाव गर्मी को घटाने वाला होता है। मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन ने ला नीना को अप्रभावी कर दिया है।

गर्मी बढ़ने का सीधा असर पानी पर पड़ता है क्योंकि जल का वाष्पीकरण तेज हो जाता है। वर्षा अनियमित और कई बार अतिशय वर्षा की स्थिति बनती है। इनसे जलचक्र बिगड़ता है। इसलिए जलवायु परिवर्तन का मुकाबला करने में जल व इसके प्रबंधन पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है। विज्ञान व पर्यावरण केंद्र (सीएसई) के शोधकर्ताओं ने कहा है कि बढ़ते तापमान का जल की उपलब्धता पर गहरा असर होगा। केन्द्र की निदेशक सुनीता नारायण ने कहा है कि हमें न केवल लाखों संरचनाओं में पानी एकत्र करके रखने की जरूरत है, बल्कि वाष्पीकरण से होने वाले नुकसान को घटाने के बारे में भी सोचना होगा। वाष्पीकरण से नुकसान पहले भी होता रहा है, पर तापमान बढ़ने से वाष्पीकरण की दर बढ़ने वाली है। विकल्प भूगर्भीय भंडारण की संरचनाएं और कुएं हो सकते हैं।

शोधकर्ताओं का कहना है कि सिंचाई के लिए नहरों व सतही पानी के दूसरे स्रोतों का उपयोग बढ़ाने के साथ ही भूजल के प्रबंधन पर ध्यान देने की जरूरत है। तापमान बढ़ने से मिट्टी की नमी कम होगी, जिससे मिट्टी में धूल की मात्रा बढ़ेगी और सिंचाई की अधिक जरूरत होगी। देश में आज भी अनाज ज्यादातर उन इलाकों में उपजाए जाते हैं, जहां की खेती मोटे तौर पर वर्षाजल पर निर्भर है। मिट्टी के बिगड़ने और धूल बढ़ने के खतरे का मुकाबला करने के लिए धरती के हरित आवरण को बढ़ाने की जरूरत है ताकि धरती में नमी को रोक रखने की क्षमता बढ़ सके।

गर्मी बढ़ने से पानी का उपयोग पीने व सिंचाई के अलावा आगजनी पर काबू पाने में भी बढ़ेगी। जंगल में आग लगने की घटनाएं दुनिया भर में बढ़ी हैं। भारत में भी तापमान बढ़ने के साथ इन घटनाओं में बढ़ोतरी होगी। जाहिर है कि पानी की मांग लगातार बढ़ने वाली है। इससे यह अधिक जरूरी हो गया है कि पानी की बर्बादी कम से कम हो, चाहे ताजा पानी हो या गंदा पानी। गंदे पानी को साफ करके दोबारा उपयोग करने की आदत डालना जरूरी हो गया है। लेकिन इतने भर से काम नहीं चलने वाला।

एकबारगी अत्यधिक वर्षा होने की घटनाएं भी बढ़ रही हैं। इसका अर्थ है कि वर्षा के साथ ही बाढ़ आने की संभावना होगी। बाढ़ के बाद सूखा आने का चक्र अधिक गंभीर हो सकता है। भारत में पहले ही वर्ष में वर्षा के दिन कम होने लगे हैं। कहा जाता है कि वर्ष में केवल 100 घंटे वर्षा होती है। अब वर्षा के दिन घटने व अत्यधिक वर्षा की घटनाओं के बढ़ने के आसार हैं। इन सबका जल-प्रबंधन की योजनाओं पर गहरा प्रभाव होना तय है। बाढ़ के प्रबंधन के बारे में नए सिरे से सोचने की जरूरत है, नदियों पर तटबंध बना देने से कोई समाधान नहीं होने वाला, बल्कि इससे समस्या अधिक गंभीर होगी। हमें बाढ़ के पानी का भंडारण करने, वह भी भूगर्भ में करने के उपाय करने होंगे जिसमें परंपरागत तालाब व कुएं उपयोगी हो सकते हैं।

वर्षाजल का संग्रह करने के उपाय बड़े पैमाने पर करना जरूरी है। अभी बन रही संरचनाएं सामान्य वर्षा के लिहाज उपयोगी हो सकती हैं, पर अत्यधिक वर्षा के सामान्य घटना बन जाने पर इन संरचनाओं में कतिपय फेरबदल करना जरूरी होगा। बुनियादी बात यह है कि वर्षा के हर बूंद को सहेजने की व्यवस्था हो। याद रखने की जरूरत है कि भारत में वैश्विक जनसंख्या की 16 प्रतिशत निवास करती है, जबकि यहां विश्व का केवल चार प्रतिशत जल उपलब्ध है। इसलिए भारत में वर्षा जल का संचयन बहुत ही जरूरी है।

(अमरनाथ वरिष्ठ पत्रकार होने के साथ पर्यावरण मामलों के जानकार भी हैं। आप आजकल पटना में रहते हैं।)

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