जंतर-मंतर छात्र आंदोलन आजकल बहस के केंद्र में है। ना झुकने का दावा करने वाली मोदी सरकार को इस आंदोलन में झुकाया, आयोजकों ने नारा दिया कि ‘झुकती है दुनिया झुकाने वाला चाहिए’। इस आंदोलन में जंतर-मंतर पर रहते हुए हमने खुद देखा कि सामाजिक मैत्रीभाव का जो प्रदर्शन हुआ वह भारतीय सांस्कृतिक परंपरा की पुष्टि करता है। जैसा सेवा भाव बच्चों ने दिखाया वह आश्चर्यजनक था, इसलिए भी कि इस जेन जी की पीढ़ी पर मोबाइल, इंटरनेट, लैपटॉप, कंप्यूटर, व्हाट्सएप, फेसबुक, इंस्टाग्राम आदि की दुनिया में मगन रहने और पारिवारिक जीवन में शारीरिक श्रम कम करने की बात कही जाती है।
जो दृढ़ता, अहिंसा, त्याग, दया और करुणा इस आंदोलन में दिखी उसने आजादी के आंदोलन के दौर की यादें ताजा कर दी। देश के कोने-कोने से लोगों ने दान दिया और जोमौटो, स्विग्गी जैसी कम्पनियों से खाने की बड़े मात्रा में सप्लाई की। इस आंदोलन में जेन जी द्वारा मोदी सरकार और खुद प्रधानमंत्री मोदी को दी गई गालियों के जरिए इस पीढ़ी पर बड़े हमले किए जा रहे हैं। पूरे देश में सरकार की ट्रोल आर्मी हंगामे पर उतर आई है। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष समेत तमाम सांसद उन पर आरोप प्रत्यारोप लगा रहे हैं। कुछ उन्हें देशद्रोही और कुछ समाज पर बोझ बता रहे हैं। संवेदनहीनता की हालत यह है कि अपने ही इन बच्चों को गोली मारने की बात भी कही जा रही है।
दरअसल छात्रों-नौजवानों के व्यंग्य के माध्यम से शुरू हुए इस आंदोलन में जो गालियां दी भी गई हैं, वह उनके समेकित गुस्से का प्रतिवाद था। जो स्वाभाविक तौर पर पिछले 12 सालों से देश का बैंड बजा रही इस सरकार की कारस्तानियों से पैदा हुआ है। अभी भी सरकार और खुद मोदी जी व आरएसएस इससे सीखने को तैयार नहीं हैं। छात्रों पर दर्ज एफआईआर रद्द करने, उनका उत्पीड़न न करने और 20 जुलाई को हुए बर्बर दमन के दोषी अधिकारियों को दंडित करने के वादे को पूरा नहीं किया गया। हद यह है कि प्रतिबंधित पैलेट गन का इस्तेमाल करने, पुलिस मैनुअल के विरूद्ध सादी वर्दी में बच्चों पर अत्यधिक बल प्रयोग करने, कील लगी लाठियों से मारने और करेंट लगाने के लिए जिम्मेदार गृह मंत्री इस्तीफा देना तो दूर माफी तक मांगने को तैयार नही हैं।
उल्टा पश्चिम बंगाल में भाजपा सरकार ने छात्रों पर एनएसए लगा दिया। बिहार में तो हद हो गई है बाकायदा अखबारों में जेल में बंद हजारों छात्रों की फोटो प्रकाशित कराई गई। सिवान में एके 47 से फायरिंग की गई और हजारों छात्र अभी भी जेल में बंद हैं। जबकि आंदोलन के दबाव में बिहार सरकार ने मुकदमा वापसी और रिहा करने का आदेश दे दिया है, लेकिन उस पर अमल नहीं हो रहा है। महाराष्ट्र और असम में भी दमन जारी है।
कल ही सीपीएम नेशनल आफिस में घुसकर एसएफआई राष्ट्रीय सह सचिव आईशी घोष को गिरफ्तार करने की कोशिश की गई। हद है कि जिस नकारे शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा छात्रों ने कराया उन्हें संसद में सत्ता पक्ष के लोगों ने ऐसे सम्मानित किया मानो वो कोई राष्ट्र सम्मान का काम करके सदन में आए हों। यही नहीं जिस आरएसएस के अनमोल सितारे प्रहलाद जोशी को नया शिक्षा मंत्री बनाया गया है वह बलात्कारियों और लड़कियों के अपमान करने वालों के संरक्षणदाता हैं।
संसद में जो सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक 2026 सरकार लेकर आई है, उसमें भी सजा की वृद्धि के अलावा नया कुछ भी नहीं है। जबकि दिन के उजाले की तरह साफ है कि महज कड़ा कानून बना देने से पेपर लीक रुकने वाला नहीं है। पेपर लीक के कारणों को और सरकार की नियति को आप एक उदाहरण से समझ सकते हैं। सरकार ने नीट समेत तमाम परीक्षाओं को कराने के लिए राष्ट्रीय टेस्टिंग एजेंसी (एनटीए) जैसी सोसाइटी एक्ट में पंजीकृत गैर संवैधानिक संस्था का निर्माण किया। इसकी यदि कार्यप्रणाली को देखें तो 2024 के नीट पेपर लीक के समय एनडीए के डीजी रहे सुबोध कुमार सिंह को पुरस्कार देकर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री का प्रमुख सचिव भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने बनाया हुआ है।
हद यह है कि एनटीए के अध्यक्ष प्रदीप कुमार जोशी जिनके समय 2024 और 2026 में नीट का पेपर लीक हुआ है उन्हें आज तक उनके पद से हटाया नहीं गया। यह वही महोदय हैं जिनके पब्लिक सर्विस कमीशन का चेयरमैन रहते चर्चित व्यापम घोटाला हुआ था। आज तक पेपर लीक करने वालों को सजा नहीं हुई उलटे वह जमानत पर रिहा हुए हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री द्वारा फास्ट ट्रैक कोर्ट की बात भी पर्याप्त नहीं है। इसलिए एनटीए जैसी गैर जवाबदेह, गैर संवैधानिक संस्था को खत्म करने की बच्चों की मांग जायज है लेकिन सरकार इस पर विचार करने को तैयार नहीं है।
यह भी देखना होगा कि मोदी सरकार के विरुद्ध यह जो गुस्सा पैदा हुआ है इसका कारण लोकतांत्रिक और संवैधानिक अधिकारों को लगातार खत्म किया जाना भी है। असहमति की हर आवाज को सरकार ने दमन कर दबा दिया। आनंद तेलतुम्बड़े, गौतम नवलखा, उमर खालिद, प्रवीर पुरकायस्थ, सुधा भारद्वाज, सत्यम वर्मा जैसी देश की सर्वोच्च मेधा को जेल की सलाखों में डाला गया। धरना, प्रदर्शन, उपवास, आंदोलन, यात्राएं मुश्किल ही नहीं देश में लगभग असंभव हो गईं। लोकतंत्र को मजबूत करने वाले जो लोग सामाजिक सरोकारों से जुड़े हुए थे उन्हें आंदोलनजीवी, देशद्रोही यहां तक की कॉकरोच की संज्ञा से नवाजा गया। जो संस्थाएं लोकतांत्रिक प्रणाली को मजबूत करती हैं और लोगों के आक्रोश को संस्थाबद्ध करके उनका लोकतांत्रिक समाधान करती हैं, उन सारी संस्थाओं को नष्ट कर दिया गया।
सबसे बड़ी बात पूरे देश को सरकार ने देशी विदेशी बड़े पूंजी घरानों के हवाले करने का काम किया। देश की प्राकृतिक सम्पदा और सार्वजनिक सम्पत्ति पूंजी घरानों के नाम कर दी गई। जिस तरह से सरकार ने अमेरिका के सामने आत्मसमर्पण किया और देश की आर्थिक संप्रभुता को आघात पहुंचाने का काम किया उससे पूरा देशभक्त भारतीय मानस हिल गया है। आज हालात यह हो गई है कि अरबपतियों की संख्या लगातार बढ़ रही है।
पूंजी का संकेंद्रण कुछ पूंजी घरानों के हाथ में होता जा रहा है और देश की बड़ी आबादी हाशिए पर धकेली जा रही है। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, आवास जैसे संवैधानिक अधिकार लोगों के हाथ से छीन लिए गए। दो करोड़ रोजगार देने का वादा गृहमंत्री के शब्दों में जुमला बन गया। सरकारी सेवाओं में आमतौर पर पद खत्म कर दिए गए और जो भर्तियां निकल रही है वह पेपर लीक और भ्रष्टाचार के हवाले हो गई।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार लाखों प्राथमिक विद्यालय बंद कर दिए गए और सरकारी शिक्षा की गुणवत्ता लगातार कम की गई। आरएसएस द्वारा सीधी दखल के कारण उच्च शैक्षिक संस्थानों में अध्यापक से लेकर कुलपति तक की नियुक्ति संघ पृष्ठभूमि के लोगों की गई। पाठ्यक्रम से लेकर सभी चीज सांप्रदायिक नजरिया से बदली जा रही है। जंतर-मंतर आंदोलन के दौरान मेरे पत्रकार मित्र ने बताया कि दिल्ली के तमाम प्रोफेशनल कोर्सेज में अबकी बार एडमिशन नहीं हो रहे।
क्योंकि लाखों रुपया देकर प्रोफेशनल कोर्स करने के बावजूद बच्चों को उसके अनुरूप नौकरियां नहीं मिल रही हैं। शिक्षा का बजट लगातार घटता जा रहा है। जहां यह 2016-17 में 3.6 प्रतिशत था वहीं 2025-26 में 2.6 प्रतिशत है। दुनिया एआई की तरफ जा रही है और इस युग को तकनीक का युग कहा जा रहा है। वहीं हमारे बजट में विज्ञान व प्रौद्योगिकी का अंश बेहद कम महज 0.38 प्रतिशत है वह भी 2016-17 के 0.55 प्रतिशत की तुलना में घटता ही जा रहा है।
स्वास्थ्य सेवाओं का हाल बुरा है। सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं में पैसा लगाने की जगह पूरा पैसा आयुष्मान कार्ड जैसी बीमा योजनाओं में बजट का दे दिया गया। यह योजना पूरे तौर पर विफल साबित हुई है। कर्मचारियों की पुरानी पेंशन छीन ली गई और पेंशन को शेयर मार्केट के हवाले कर दिया गया। 2022 तक हर व्यक्ति को घर देने का वायदा आज तक पूरा नहीं हुआ। जंतर-मंतर पर बड़ी संख्या में गिग, कांट्रैक्ट, प्लेटफार्म पर काम कर रहे नौजवानों की भी थी।
जो सामाजिक सुरक्षा और कम वेतन के कारण अपनी जिंदगी में जूझ रहे हैं। महंगाई सुरसा की तरह दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। पेट्रोल, डीजल, गैस के दाम आसमान छू रहे हैं। पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने और वाहनों की आयु तय करने से आम मध्य वर्ग गंभीर रूप से परेशान हो चुका है। भारतीय उद्योग गहरे संकट का शिकार है और छोटे मझोले उद्योग, एमएसएमई तो पूरी तौर पर बर्बाद हो गए।
सब मिला-जुला कर कहा जाए तो इन सबसे गहरा आक्रोश लोगों में लगातार पनप रहा था। जिसे जंतर मंतर आंदोलन ने एक मंच प्रदान किया और लोगों का गुस्सा वहां प्रकट हुआ है। सबसे प्रमुख बात इस आंदोलन से जो निकली है वह जवाबदेही का प्रश्न है। लोकतंत्र में जवाबदेही सबसे मूल तत्व है। आने वाले समय में रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, पेंशन और भूमिहीनों के आवास के संवैधानिक अधिकार को सुनिश्चित करने के लिए सरकार की जवाबदेही तक आंदोलन से पैदा हुई यह ऊर्जा बढ़ेगी। इसी को आवाज देने और संयोजित करने के लिए छात्रों और नौजवानों की तरफ से 9 अगस्त से मिर्जापुर से शुरू करके पूर्वांचल के 10 जिलों में यात्रा निकाली जा रही है। उम्मीद है आने वाले समय में उत्तर प्रदेश में नए राजनीतिक आंदोलन की आहट सुनाई देगी।
(दिनकर कपूर आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट, उत्तर प्रदेश के महासचिव हैं।)