Thursday, December 1, 2022

डूब से बचाने के लिए सरदार सरोवर बांध का पानी खोलने को लेकर अनशन पर बैठीं मेधा की हालत बिगड़ी

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(मेधा पाटकर के अनशन के 8 दिन पूरे हो गए हैं। इस बीच उनकी हालत बिगड़ती जा रही है लेकिन न तो राज्य सरकार उनकी सुध ले रही है। न केंद्र को इसकी कोई खबर है। नर्मदा बांध पुनर्वास मसले की निगरानी करने वाले सुप्रीम कोर्ट ने भी इसका संज्ञान लेना जरूरी नहीं समझा। इस बीच, न केवल डूब क्षेत्र बढ़ता जा रहा है बल्कि लोगों की जिंदगियां भी तबाही के कगार पर पहुंच गयी हैं। मेधा के अनशन को लेकर पूर्व विधायक औऱ समाजवादी नेता डॉ. सुनीलम ने एक टिप्पणी की है। पेश है उनका पूरा लेख-संपादक)

वो सिर्फ इतना ही तो कह रही हैं कि सरदार सरोवर के द्वार खोल दो हमारे यहां बाढ़ आ गयी है। सिर्फ इतना कहने के लिए उन्हें 2 सप्ताह हो गए भूखा बैठे, ये है संवेदनशील लोकतंत्र?

उन्होंने अपना जीवन नर्मदा को दे दिया, हिंसा का रास्ता नहीं अपनाया तो क्या अहिंसा के प्रति और सत्याग्रह के प्रति हम यह रुख अख्तियार करेंगे इस देश में?

जब हम बड़े हो रहे थे तो वो लड़ रहीं थीं, कभी मुआवजे के लिए, कभी जमीन के लिए, कभी बांध की ऊंचाई के लिए तो कभी डूबते गांवों के लिए।

तुमने कितना मुआवजा बांटा, आओ हिसाब करें,
तुमने जितने विभाग बनाये उनके प्रमुख सब मालामाल हुए,

गांव को न मुआवजा मिला न विस्थापन,

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कहां गया? इसका हिसाब कौन देगा, तुम या मेधा पाटकर !

वो हिंसा अपनाती तो नक्सली होतीं, आज सत्याग्रह पर हैं तो इतनी अनदेखी, अरे इतनी अनदेखी तो अंग्रेज गांधी जी की नहीं कर पाते थे।

आने वाली पीढ़ियों को क्या यह साबित करना चाहते हो कि मेधा जी का रास्ता गलत था।

सुनो अगर नस्लों से अहिंसा गायब हुई तो तुम्हारी अट्टालिकाएं भी ध्वस्त होनी हैं।

क्या कांग्रेस, क्या भाजपा, क्या राज्य, क्या केंद्र?

सब एक जैसे हो गए हो सत्याग्रहों के प्रति!

वो तुमसे सिर्फ यह कह रही हैं, उनके साथ गांव वाले भी यह कह रहे हैं कि हुजूर ये द्वार खोल दो नहीं तो हमारा घर द्वार डूब जायेगा।

इतिहास उठाकर देख लो, जिनके भुजबलों पर सामर्थ्य शब्द भी गौरवान्वित हुआ, जनता का अनादर उन्हें भी रसातल में ले गया।

होश में आओ हुक्मरानों, होश में आओ व्यवस्थाओं, 
होश में आओ सत्ताओं।

अब पानी काफी ऊपर आ गया है, आधा टेंट डूब गया है। कहने के लिए कांग्रेस की सरकार आंदोलन की हिमायती है पर पानी के स्तर तक पर उसका अंकुश दिखलाई नहीं पड़ता।
मुख्यमंत्री को अभी तक समय नहीं मिला, क्या वे किसी मुहूर्त का इंतज़ार कर रहे हैं? या कानून व्यवस्था की स्थिति बिगड़ने का?

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गृहमंत्री और प्रभारी मंत्री आकर गए। प्रशासन और पुलिस के अधिकारी चिंतित दिख रहे हैं।
अभी तक NCA तो दूर NBDA तक का प्रमुख सत्याग्रह स्थल पर नहीं पहुंचा।
कांग्रेस पार्टी के पूर्व अध्य्क्ष राहुल गांधी या वर्तमान अध्यक्ष सोनिया गांधी के पास समय नहीं है 32,000 परिवारों की सुध लेने का या कांग्रेस अभी भी गुजरात की चिंता में फंसी हुई है तथा उसकी बड़े बांधों के प्रति नीति और सोच मे कोई अंतर नहीं आया है। और तो और पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह तक को समय नहीं मिला अभी तक छोटा बडदा जाने का। शायद वे कमलनाथ से कुछ निकलवाने की स्थिति में न हों तभी आकर अपनी मिट्टी नहीं कुटवाना चाहते हों। 
मोदी तो नीरो बने हुए हैं, जब रोम जल रहा था तब नीरो गुलामों को जला कर रोशनी में मौज करने में व्यस्त था।

सर्वोच्च न्यायालय मौन है जबकि 31 जुलाई तक उसने ही 2017 को सभी प्रभावितों को हटने का आदेश दिया था। क्योंकि उसे बताया गया था कि जीरो बैलेंस है। यानी सभी प्रभावितों का पुनर्वास हो चुका है।

अब तो स्वयं मध्यप्रदेश का मुख्य सचिव मान रहा है कि 6000 परिवारों का पुनर्वास बाकी है।
नर्मदा1 , नर्मदा 2 , डॉ बी डी शर्माजी जैसे तमाम प्रकरणों में स्वयं सर्वोच्च न्यायालय ने निर्देशित किया है कि विस्थापन के 6 महीने पहले पहले की स्थिति से बेहतर पुनर्वास का इंतजाम किए। विस्थापन अवैध और गैर कानूनी है। इसके बावजूद सर्वोच्च न्यायालय स्वतः संज्ञान नहीं ले रहा। क्यों 30 हजार से अधिक परिवारों की जल हत्या का इंतज़ार कर रहा है? 

मेधाजी की हालत बिगड़ रही है। पुलिस प्रशासन जोर देकर उन्हें अस्पताल पहुंचाने की जुगत लगा रहा है। 32,000 विस्थापित परिवार, नर्मदा बचाओ आंदोलन और मेधा जी का साथ दीजिये, मैदान में आइये।

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