खतरे में न्याय व्यवस्था, संदर्भ दोषी सेंगर को जमानत

देश में न्याय के जिंदा रह पाने की आखिरी उम्मीद भी कल टूट गयी जब अदालत से एक बलात्कारी और वहशी दरिंदे की न केवल सजा निलंबित की गयी बल्कि लगे हाथ उसको जमानत भी दे दी गयी। यह काम किसी निचली अदालत से होता तो एकबारगी सोचा भी जा सकता था लेकिन फैसला देश की उच्च अदालत से आया है। और वह भी देश की राजधानी में स्थित हाईकोर्ट से। यह ऐसा केस था जिसमें सब कुछ दिन के उजाले की तरह साफ था। एक बच्ची के साथ बीजेपी के तत्कालीन विधायक कुलदीप सिंह सेंगर ने रेप किया था। इसी कड़ी में कई और लोगों ने भी उसको अपनी हवस का शिकार बनाया। गैंगरेप की शिकार इस बच्ची ने न केवल खुलेआम इस बात को स्वीकार किया बल्कि उसने मुकदमा भी दर्ज कराने की कोशिश की।

लेकिन उन्नाव की पुलिस ने मुकदमा दर्ज करने से इंकार कर दिया। जब मामला मीडिया में आया और बच्ची ने लखनऊ में मुख्यमंत्री आवास के सामने आग लगाकर खुद को मार डालने की कोशिश की तब जाकर दबाव में प्रशासन को कानून की बेहद कड़ी धारा पाक्सो के तहत मुकदमा दर्ज करना पड़ा। फिर शुरू हुआ बच्ची और उसके परिवार के उत्पीड़न का दौर। पीड़िता के घर जाकर विधायक के लोग धमकी देने लगे और मुकदमा वापस न लेने पर बुरे अंजाम की चेतावनी भी। जब इससे भी बात नहीं बनी तो पीड़िता के पिता की थाने में बेरहमी से पिटाई की गयी जिसमें उनकी जान चली गयी।

इसके बाद भी जब परिवार पीछे हटने के लिए तैयार नहीं हुआ तो एक दिन रायबरेली स्थित कोर्ट की सुनवाई के रास्ते में पीड़िता के साथ जा रहे परिवार के वाहन को दुर्घटनाग्रस्त कर दिया गया जिसमें पीड़िता की चाची के साथ एक और महिला का निधन हो गया और बाकी सवार गंभीर रूप से घायल हो गए। बावजूद इसके पीड़िता और उसका परिवार न्याय हासिल करने की अपनी जिद पर अड़े रहे। बाद में जब लगा कि न्याय भी प्रभावित हो सकता है और यूपी की अदालत से उसका मिल पाना बेहद मुश्किल है। तब पीड़िता की गुहार पर सुप्रीम कोर्ट ने मुकदमे को दिल्ली स्थित तीस हजारी कोर्ट में स्थानांतरित कर दिया।

दिल्ली की इसी अदालत ने तत्कालीन बीजेपी विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को बलात्कार और पीड़िता के पिता की हत्या का दोषी करार देते हुए पहले में उम्र कैद और दूसरे में 10 साल की सजा सुनायी। और उसी के बाद से सेंगर तिहाड़ जेल में सजा काट रहा था। लेकिन अपनी सत्ता हो और उसका नेता जेल में हो, भला यह कैसे हो सकता है? ऊपर से वह सवर्ण हो और उसे दोषी बताया जाए यह पूरी संघ संरक्षित मनुस्मृतीय संस्कृति के खिलाफ है। और वह भी एक महिला के लिए जिसे मनुस्मृति में न केवल दोयम दर्जा हासिल है बल्कि पुरुषों की सेवा ही उसका परम कर्तव्य बताया गया है। उसकी मानें तो बलात्कार किसी अपराध की श्रेणी में ही नहीं आता है। संघ के आसन्न हिंदू राष्ट्र की चौखट पर किसी पुरुष को किसी ‘अदना’ स्त्री के लिए सजा दी जाए और फिर उसको जेल भेजा जाए यह मनुस्मृतीय व्यवस्था के लिए किसी कलंक से कम नहीं है। 

जिन अदालतों को संविधान के संरक्षण और पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए बनाया गया था अब वही अन्याय का हथियार बन गयी हैं। वे न केवल सत्ता के साथ खड़ी हैं बल्कि उनके जज हर उस मुकदमे की सुनवाई से डर रहे हैं जिसमें सत्ता का कोई निहित स्वार्थ हो। अनायास नहीं दिल्ली दंगों और एलगार परिषद के आरोपियों को जमानत देने की कोई जज हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है। जेएनयू के छात्र नेता उमर खालिद की बेल पर केवल तारीख पड़ रही है लेकिन फैसला कोई नहीं हो रहा है। आखिर ये चीजें किस तरफ इशारा करती हैं? दिल्ली हाईकोर्ट और साथ ही सुप्रीम कोर्ट से भी यह पूछा जाना चाहिए कि खालिद और गुलफिशा का मामला क्या सेंगर से भी ज्यादा गंभीर है? उमर खालिद तो दिल्ली दंगों के दिन राजधानी में मौजूद भी नहीं थे। और सेंगर का तो पूरा मामला साबित हो चुका है। उसको निचली अदालत से दोषी करार दे दिया गया था। ऐसे में पहले बेल का हकदार खालिद था या फिर सेंगर? 

यह फैसला दिल्ली हाईकोर्ट के चेहरे पर एक बदनुमा दाग है। देश के जाने माने वकील प्रशांत भूषण ने भी अपने एक ट्वीट में लिखा है कि कभी इस कोर्ट को देश में आदर्श कोर्ट के तौर पर देखा जाता था और उसके फैसलों को दूसरी अदालतों में नजीर के तौर पर पेश किया जाता था लेकिन अब इसका पतन हो गया है। लेकिन यह स्खलन इस हद तक होगा कि पीड़िता के न्याय के अधिकार को रौंद कर वह एक दोषी और सजायाफ्ता शख्स को राहत देगा, किसी ने सोचा भी नहीं था। हालांकि इस बीच हाईकोर्ट के पतन की कहानी मीडिया की सुर्खियां बनने लगी थीं। जस्टिस वर्मा के घर आग लगने पर मिली जली नोटों की गड्डियों से देश के लोगों ने यह बात समझ लिया था कि दिल्ली हाईकोर्ट में फैसले अब न्याय की तराजू पर नहीं बल्कि नोटों की गड्डियों की चौड़ाई और लंबाई देखकर लिए जा रहे हैं। 

लेकिन इन ऊंची अदालत की कुर्सियों पर बैठे लोगों और देश की सर्वोच्च सत्ता के रहबरों को यह समझ लेना चाहिए कि किसी भी व्यवस्था के चलने का आधार न्याय होता है। किसी सभ्य समाज को चलाने के लिए न्याय बुनियादी उसूल का काम करता है। और एकबारगी अगर उससे भरोसा उठ गया तो न कोई व्यवस्था बचेगी और न ही कोई समाज। यहां तो लोकतंत्र है जिसकी बुनियादी कसौटी ही न्याय होता है। यहां तक कि राजे रजवाड़ों के दौर में भी राजाओं को अपनी नैतिक सत्ता बनाए रखने के लिए न्याय की ज़रूरत पड़ती थी।

वही राजा सबसे ज्यादा लोकप्रिय और बेहतर माना जाता था जिसके शासन में लोगों को न्याय सुचारू रूप से उपलब्ध हो। कहा जाता है कि मुगल शासन में जहांगीर को सबसे ज्यादा न्यायप्रिय माना जाता था। दरबार के सामने उसने एक ऐसा घंटा लगा रखा था जिसको बजा कर कोई भी फरियादी अपने लिए न्याय की गुहार लगा सकता था। घंटा लगाने और न्याय देने की बात तो दूर यहां राजनीतिक सत्ता के संरक्षण और दबाव में न्याय को खुलेआम रौंदा जा रहा है। 

यह वही दिल्ली है जिसमें कभी निर्भया को न्याय दिलाने के लिए लोग दिसंबर की ठिठुरन भरी रात को ठोकर मारकर राष्ट्रपति भवन की तरफ मार्च कर दिए थे। लेकिन अफसोस की बात यह है कि कल जब दोषी सेंगर को बेल दिए जाने के फैसले के खिलाफ पीड़िता ने एक सामाजिक कार्यकर्ता भयाना के साथ इंडिया गेट पर धरना देना शुरू किया तो उसके साथ गिनती के लोग भी इकट्ठा नहीं हो पाए। जिसका नतीजा यह रहा कि पुलिस ने पीड़िता को न केवल वहां से जबरन उठा लिया बल्कि उसके साथ बदसलूकी भी की। पूरे देश में उसका वीडियो वायरल है। लेकिन देश के भीतर अभी तक किसी बड़े प्रतिरोध की कोई जुंबिश तक नहीं दिख रही है। सोशल मीडिया पर भले ही इसको लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं आयी हैं लेकिन उसका अभी कोई नतीजा निकलता नहीं दिख रहा है।

चूंकि ये मामला दिल्ली का है और सुप्रीम कोर्ट की नाक के नीचे घटित हुआ है और हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि पूरा मामला भी उसकी निगरानी में था। बावजूद इसके अभी तक उसने इसका संज्ञान लेने का कोई संकेत नहीं दिया है। यह देश की सर्वोच्च अदालत के लिए भी किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है। अगर वह इसमें हस्तक्षेप कर फैसले पर रोक नहीं लगाता है तो यह माना जाएगा कि वह भी हाईकोर्ट के फैसले के साथ खड़ा है और अन्याय का पक्षधर है। इस घटना के साथ ही इस देश में न्याय की आखिरी उम्मीद के भी खत्म होने का ऐलान किया जा सकता है।

यह कोई अकेला मामला नहीं है जिसमें न्यायपालिका और सत्ता प्रतिष्ठान का रुख बेहद शर्मनाक है। उत्तराखंड के अंकिता भंडारी से लेकर बाबा राम रहीम और आसाराम बापू तक में न्याय औंधे मुंह गिर पड़ा। सत्ता पक्ष से नजदीकियों और रसूख के बल पर न्याय की दंडी को खुद के पक्ष में करने का नया दौर शुरू हो गया है। समरथ को नहीं दोष गोसाईं इस दौर का नया सिद्धांत है, जो किसी सभ्य नहीं बल्कि जंगली समाज में ज्यादा फिट बैठता है। इसके बल पर यह पूरे विश्वास के साथ कहा जा सकता है कि आने वाले दिनों में अपराध की परिभाषाएं भी बदल दी जाएंगी।

न्याय का पहिया अब उल्टी दिशा में चल पड़ा है। ‘वैदिक हिंसा हिंसा न भवति’ तक पहुंचने का इसने जो लक्ष्य रखा है उसके दायरे में आने वाला समाज समय के साथ और बर्बर होता जाएगा। जिसमें न केवल पुरुषों का प्रभुत्व होगा बल्कि जाति के पैमाने पर ब्राह्मण व्यवस्था का पुन:वर्चस्व होगा। जिसमें न्याय किसी स्वतंत्र इकाई की तरह काम करने की जगह उसे जाति, नस्ल, क्षेत्र, प्रभुत्व, रसूख और धर्म के खूंटे से बांध दिया जाएगा। नतीजतन समाज में न केवल भेदभाव होगा बल्कि उसमें हर तरह के अन्याय और उत्पीड़न के लिए जगह होगी। 

(महेंद्र मिश्र जनचौक के संपादक हैं।)

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