Saturday, October 16, 2021

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कविता संग्रह नहीं, अवाम की लाचारी का दस्तावेज है ‘अंबर में अबाबील’

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हिंदी के लोकप्रिय और वैश्विक रूप से चर्चित कवि उदय प्रकाश का वाणी प्रकाशन से प्रकाशित कविता संग्रह ‘अंबर में अबाबील’ चर्चा में है। उदय प्रकाश ऐसे कवि और लेखक हैं, जो भारत के एक अत्यंत पिछड़े कस्बे से राजधानी दिल्ली आए।

साहित्य जगत की तमाम जातीय और क्षेत्रीय गिरोहबंदियों के बीच पाठकों पर छा गए। बहुत कम उम्र में मां और पिता को खोकर दुनिया की बेरहम हकीकतों से रूबरू होते पले-बढ़े और स्थापित हुए। इस कवि की कविताओं में वंचित समाज के दर्द से लेकर पशु-पक्षी और प्रेम छाया हुआ है।

अंबर में अबाबील शीर्षक उनकी कविताओं की जीवंतता को दर्शाता है। अबाबील एक अद्भुत छोटी चिड़िया होती है। माना जाता है कि वह अपने घोंसले को इतने करीने से बुनती-बनाती है कि उसी के मॉडल पर मनुष्य ने घर में तरह-तरह की जरूरतों के लिए कमरे बनाने की डिजाइन सीखी है। लिविंग रूम, भंडार कक्ष, सोने का कमरा, खिड़कियां और दरवाजे। अबाबील के घोंसले का इंटीरियर हैरतअंगेज होता है। वह बुनावट उदय प्रकाश के इस कविता संग्रह में नजर आती है।

कविताओं में मौजूदा व्यवस्था और आम आदमी की लाचारी का दर्द छलकता है, जब वह न्याय नाम की एक कविता में लिखते हैं…

उन्होंने कहा हम न्याय करेंगे
हम न्याय के लिए जांच करेंगे
मैं जानता था
वे क्या करेंगे
तो मैं हंसा
हंसना ऐसी अंधेरी रात में
अपराध है
मैं गिरफ्तार कर लिया गया

उदय प्रकाश गांवों, वंचितों और पिछड़ों के कवि हैं। मध्य प्रदेश के छोटे से कस्बे अनूपपुर में जन्मे। मकान की बाउंड्री से सटी सोन नदी बहती है। पशु, पक्षी, पठार, खेत, खलिहान में पले-बढ़े। बिल्कुल वैसे, जैसे हाल में नोबेल पुरस्कार पाने वाले अमेरिकी कवि बॉब डिलन। अमेरिका के हरे भरे, तूफानी आंधियों, झीलों के सुंदर इलाके मिनिसोटा के एक गांव में जन्मे डिलन को इलीट साहित्य ने कभी मान्यता नहीं दी। डिलन धुन बजाते और लिखते थे और रोजी रोटी के लिए न्यूयॉर्क का रुख किया।

कुछ उसी तरह गांव के वातावरण में पले-बढ़े उदय प्रकाश सागर विश्वविद्यालय में कम्युनिस्ट आंदोलन से जुड़कर 1975 के आपातकाल की फरारी में दिल्ली पहुंचे। उनकी आगे की पढ़ाई और जिंदगी का ठिकाना भी नहीं था। विज्ञान का छात्र जेएनयू पहुंचकर नाहक ही हिंदी साहित्य में घुस गया। साहित्य जगत में अछूत। गांव, गरीब, दलितों, आदिवासियों की बात करने, उनकी गरीबी, बदहाली फटेहाली, सत्ता की लूट और सामाजिक टूट को उजागर करने वाला एक आक्रोशित युवा। वह आक्रोश और टूटन, वह दर्द इस कविता के अंश में देखें, जो उन्होंने बैतूल के रेलवे प्लेटफॉर्म पर कुली के रूप में काम करने वाली महिला दुर्गा को संबोधित करते हुए लिखी है…

दुर्गा
क्या किसी भील या संथाल, कोल, बैगा या पनिका की बेटी है?
क्या उसके मोटे सुंदर होठों, चपटी मासूम नाक
और समूची सभ्यता को संदेह की नजर से देखती, भेदती आंखों
की मुक्ति के लिए ही
अफ्रीका में लड़े थे नेल्सन मंडेला और बैरिस्टर मोहनदास करमचंद
क्या इसी दुर्गा के लिए गाया था जूनियर मार्टिन लूथर किंग ने
हम होंगे कामयाब ।।।होंगे कामयाब एक दिन
वेंसेरेमास… वेंसेरेमास… कहते हुए बोलीविया कोलंबिया के घने
जंगलों में मारा गया था
चे गुवेरा…

कविताओं में मौजूदा व्यवस्था पर तीखा व्यंग्य है। कई कविताओं को मिलाकर एक साथ पढ़ने पर एक लंबी कहानी बन जाती है, जो मौजूदा वर्षों में चल रही व्यवस्था की कलई खोलती है। या कहें कि तमाम कविताएं ऐसी नजर आती हैं, जैसे किसी चल रही हजारों पृष्ठ की औपन्यासिक घटना का संक्षेपण कुछ पंक्तियों में कर दिया गया है। अखबार और चैनलों की चीख और सत्ता का समर्थन करते चाटुकारों की कहानियां कुछ ही पंक्तियों में कह दी गई हैं।

फिलहाल शीर्षक से लिखी कविता में अपनी वाहवाही करते नेताओं को कहते हैं कि एक गत्ते का आदमी लौह पुरुष बन गया और बलात्कारी संत हो चुके हैं। ‘सिद्धार्थ कहीं और चले जाओ’ शीर्षक से लिखी कविता में उदय प्रकाश जर्मनी में हिटलर की तानाशाही के दौर के आश्वित्ज को याद करते हुए लिखते हैं…

घर बन जाए आश्वित्ज
सांसों में आए भोपाल के कार्बाइड की गैस
नींद आए तो आएं देवता
लिए हुए हथियार
सपनों में दिखें देवियां
जिनकी जीभ से बूंद-बूंद टपकता हो रक्त

उदय प्रकाश जिंदगी के कठिन दौर से गुजरे हैं। साहित्य जगत के हमलों, आर्थिक संकटों, माफियाओं और तरह-तरह के अपराधों से जूझता एक कवि अब जिंदगी के साठ बरस पार कर चुका है। उदय प्रकाश जब महज 8-9 साल के थे तो सोन नदी में तैराकी सीखते हुए डूबने लगे। उस समय नदी के घाट पर कपड़े धो रही धनपुरिहाइन नाम की एक महिला नदी में कूद गई और नदी की धार में तैरकर, खोजकर उन्हें निकाला। जब उस महिला ने देखा कि बच्चा जिंदा है तो वह आश्चर्य में फूट-फूटकर रोने लगी। उस घटना को बताते हुए उदय प्रकाश कहते हैं कि तब से मैं स्त्रियों को बहुत चाहता हूं, सिर्फ स्त्रियां जानती हैं कि किसी जीवन को जन्म या पुनर्जन्म कैसे दिया जा सकता है।

महज 12-13 साल की उम्र में उदय प्रकाश की मां की मृत्यु श्वांसनली के कैंसर से हो गई और जब वह 17 साल के हुए तो गलफड़े के कैंसर से पिता की मृत्यु हो गई। टीन एज में माता पिता को गंवा चुके उदय प्रकाश का जिंदगी से मोहभंग हो गया, लेकिन वह अपनी उस छोटी बहन को देखकर मर भी न पाए, जो पिता की शवयात्रा में फेंके जा रहे बताशे उठाकर खा रही थी। उसी समय से उदय प्रकाश की जिंदगी का संघर्ष जारी है।

उनकी जिंदगी की तुलना स्पेन के एक पिछड़े गांव में जन्मे मिगुएल हर्नांदेज से की जा सकती है, जो जीवनयापन के लिए भेड़ चराते थे। हर्नांदेज की पढ़ने-लिखने की उत्कंठा तीव्र थी, लेकिन जब वह रात में ढिबरी की रोशनी में कोई किताब खोलते तो उनके पिता पिटाई चालू कर देते थे कि अगर तू पढ़ लेगा तो भेड़ कौन चराएगा, लेकिन हर्नांदेज ने ऐसी विलक्षण कविताएं लिखीं जो शहरी संभ्रांत नागरिक जीवन के अनुभवों से भिन्न थीं।

हर्नांदेज की कविताएं जब आसपास के कस्बों की पत्रिकाओं में छपीं तो उन कविताओं ने लोगों को चौंका दिया। उसके बाद जब वह मैंड्रिड पहुंचे तो हर्नांदेज को पहचान के लिए कोई परिचय पत्र नहीं था और पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। उन्हें छुड़ाने वाला कोई नहीं था और गरीब पिता ने चंदा लगाकर उनकी जमानत कराई। हर्नांदेज की कविताओं को उनकी गरीबी, प्रताड़ना, सामाजिक विलगाव ने धार दी और वह पूरी दुनिया में जाने गए।

पाठकों ने उन्हें लोकप्रिय बनाया था। उदय प्रकाश भी पाठकों के कवि हैं। भारत के हिंदी इलीट वर्ग में उदय प्रकाश मान्य नहीं हुए। वह अपनी निराशा, लाचारी, बेचारगी अपने पाठकों से छिपाते नहीं हैं। ‘एक ठगे गए मृतक का बयान’ शीर्षक से लिखी गई कविता में वह कहते हैं…

मैं राख हूं, फकत राख
मत फूंको
आंख तुम्हारी ही जलेगी

कविता संग्रह का नाम: अम्बर में अबाबील
कवि: उदय प्रकाश
प्रकाशक: वाणी प्रकाशन, 4695, 2-ए, दरियागंज नई दिल्ली
मूल्यः 199 रुपये
प्रथम संस्करण: 2019

(सत्येंद्र पीएस बिजनेस स्टैंडर्ड में वरिष्ठ पद पर कार्यरत हैं।)

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