सुनीलम की आंखों देखी

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आज से 26 साल पहले 12 जनवरी 1998 को मुलताई किसान आंदोलन पर पुलिस गोलीचालन किया गया था जिसमें 24 किसान शहीद हुए थे, 150 किसानों को गोली लगी थी। किसान आंदोलन की शुरुआत परमंडल के किसानों द्वारा अतिवृष्टि, ओलावृष्टि से नष्ट हुई फसलों का मुआवजा देने की मांग संबंधी ज्ञापन जिलाधीश बैतूल को देने से हुई थी।

किसानों ने 25 दिसंबर 1997 तक मुआवजा नहीं दिए जाने पर आंदोलन करने की चेतावनी दी थी। उसी दौरान मैं नर्मदा भवन में जनता दल के प्रशिक्षण शिविर के लिए आया था।  परमंडल के किसानों ने मुझसे आंदोलन की रूपरेखा तय करने के लिए सलाह मांगी थी।

तब 25 दिसंबर 1997 को किसानों की बैठक बुलाने का निर्णय हुआ, जिसमें पांच हजार किसान पहुंचे। वहां सभी ने अपनी पार्टियां छोड़कर किसान संघर्ष समिति गठित करने तथा तहसील परिसर में अनिश्चितकालीन धरना  देने का निर्णय किया।

संघर्ष समिति ने 25 दिसंबर 1997 के गठन के बाद सोयाबीन और गेहूं की फसल लगातार 4 वर्षों तक खराब होने के कारण सरकार से फसल बीमा का लाभ देने, 5 हजार रुपये प्रति हेक्टेयर का सोयाबीन का मुआवजा देने, कर्जा माफी, बिजली बिल माफी और जानवरों को चारा उपलब्ध कराने की मांग करते हुए अनिश्चितकालीन धरना शुरू किया था। 9 जनवरी को ऐतिहासिक 75 हजार किसानों की 50 किलोमीटर दूर बैतूल तक रैली निकाली थी तथा 11 जनवरी को सफल बंद किया था।

सब कुछ पुलिस, प्रशासन की जानकारी में ही शांतिपूर्ण तरीके से हो रहा था। अधिकारियों की सहमति से ही यह तय हुआ था कि कांशीराम जी की सभा के बाद 12 बजे किसान संघर्ष समिति का तहसील की तालाबंदी का कार्यक्रम होगा।

उस दिन बैतूल जिले के मुलताई तहसील के ग्राम सोनेगांव से साढे ग्यारह बजे मैं निकला था। मुलताई शहर के नागपुर नाका आते-आते हजारों किसान जुड़ गये। मुलताई गुड़ बाजार के आसपास अफरा-तफरी का माहौल था। पता चला कि कांशीराम जी सभा जल्दी खत्म कर हैलीकॉप्टर से वापस चले गये। थाने के सामने गोदी में छोटा सा बच्चा लेकर बाड़ेगांव की एक महिला मिली, जिसके सिर से खून बह रहा था। उसने बताया कि तहसील पर पुलिस वाले पत्थर और गोली चला रहे हैं।

मैंने सीधे मुलताई थाने के सामने रुककर थाना प्रभारी से पूछा कि पुलिस गोली क्यों चला रही है? उसने कहा तुम चिंता मत करो तुम्हारी नेतागीरी खत्म कर देंगे। मैंने सोचा कि मुलताई तहसील पहुंच कर देखता हूं लेकिन जब बस स्टैंड पहुंचा तब मैंने तहसील की छत से बड़ी संख्या में पुलिस वालों को फायरिंग करते देखा। 

लेकिन जब हम मुलताई तहसील कार्यालय के एकदम सामने बस स्टैंड पहुंचे, तब हमने पुलिस गोलीचालन होते हुए देखा। मैं जीप के बोनट पर खड़ा हुआ, लाउडस्पीकर से बार-बार चिल्ला रहा था कि गोलीचालन बंद करो, किसान शांतिपूर्ण आंदोलन कर रहे हैं।

तभी अचानक मेरे आसपास खड़े दो साथी गिर पड़े। मेरी नजर तहसील कार्यालय की खिड़की पर पड़ी, जहां मैंने तत्कालीन पुलिस अधीक्षक जी पी सिंह को गोली चलाते देखा। मैं समझ गया कि मुझे जान से मारने का इरादा है तथा गलती से बगल के दो साथियों को गोली लग गयी है। मैं बोनट से कूद गया और साथियों की मदद से गोलीचालन में घायल साथियों को जीप में बिठाया।

गाड़ी का स्टेयरिंग सदाशिव गडेकर ने संभाला जो बाद में मुलताई के जनपद उपाध्यक्ष बने।  हम 50 मीटर की दूरी पर स्थित शासकीय चिकित्सालय में गये। अस्पताल के सभी कमरे खचाखच भरे हुए थे। सभी कमरों में किसान थे। मुझे अस्पताल की नर्सों ने महिलाओं के प्रसूति वार्ड में अंदर भेज दिया, वहां संस्थापक प्रदेश अध्यक्ष टंटी चौधरी जी, कलावती बाई और 10-12 साथी मौजूद थे।

बाहर गोलियां चलने की आवाज आ रही थी। पुलिस अस्पताल में भी गोली चला रही थी। शहर में कर्फ्यू लगा दिया गया। मैंने सभी साथियों को कमरे से निकाल कर जबरजस्ती गांव भिजवा दिया। क्योंकि मुझे डर था कि पुलिस जब मुझ पर गोली चलाएगी तब मेरे साथी की जान भी खतरे में पड़ सकती है। चिकित्सा अधिकारी डॉ.पी के तिवारी ने जिलाधीश रजनीश वैश्य को सूचना दे दी।

ज्यों ही रात का अंधेरा हुआ, स्वयं पुलिस अधीक्षक और जिलाधीश आकर मुझे मुलताई थाने की हवालात में ले गये। कपड़े उतार कर लात-जूता-बेल्ट और लाठियों से पीटना शुरू किया, जिसे थर्ड डिग्री ट्रीटमेंट कहा जाता है।

अमानवीय यातनाओं का दौर 36 घंटे चला। मैं लहूलुहान था। जो भी पुलिस वाला आता, बेहोशी की हालत में मुझे  जूते बेल्ट से पीटता था। अगले दिन रात को मुझे पारेगांव रोड पर ले जाया गया। बंदूक के साथ झाड़ियों में बेहोशी की हालत में फेंक दिया गया। फोटो खींचे गये। तभी आपस में पुलिस अधिकारी झगड़ने लगे, कहने लगे कि इसने 24 किसानों को मरवा दिया है। यह हमें भी मरवा देगा, यह नक्सली है, हमारे भी बाल-बच्चे हैं। आईजी साहब खुद आकर एनकाउंटर करें।

मुझे वापस ले जाया गया। खाली कागजों पर अंगूठे लगवाये गये। अगले दिन सुबह मुझे हथकड़ी और बेड़ी लगाकर मजिस्ट्रेट के घर ले जाकर पेश किया गया। मजिस्ट्रेट ने हथकड़ी बेड़ी खोलने को कहा। इंस्पेक्टर ने इन्कार कर दिया। उसने कहा कि यह खूंखार आतंकवादी है।

मजिस्ट्रेट ने कहा कि मैं जानता हूं कि आतंकवादी कौन है? पूरा गोलीचालन मैंने अपनी आंखों से देखा है। अगर हथकड़ी-बेड़ी नहीं खोलोगे तो मैं तुम्हारी गिरफ्तारी का आदेश निकाल दूंगा।

फिर उन्होंने आवाज देकर अपनी बेटी को बुला कर कहा कि देखो कभी-कभी देवता इस रूप में भी आते हैं। हल्दी का दूध पिलवाया। डेटॉल से खून साफ करवाया और कहा कि मुझे मालूम है कि पुलिस एनकाउन्टर करना चाहती है। मैं सीधे भोपाल जेल पुलिस वैन में ताला लगवाकर भेज रहा हूं। भोपाल जेल में मुझे 7 तालों में रखा गया जिस तरह फांसी की सजा होने के बाद अपराधी को सेल में रखा जाता है।

मुलताई गोलीचालन होने के बाद एसपी, कलेक्टर को निलंबित किया गया, न्यायिक आयोग गठित किया गया। किसानों ने आयोग का बहिष्कार किया क्योंकि हम जानते थे कि जांच आयोग किसानों को कटघरे में खड़ा करने तथा मुझे दोषी साबित करने के उद्देश्य से गठित किया गया है।

मुझे मालूम था कि जिस तरह गोली चालन के बाद मेधा पाटकर जी ने सीबीआई से जांच कराने और एक ही घटना के 67 मुकदमें एक साथ क्लब करने के लिए हाईकोर्ट में याचिका डाली थी, तब याचिका दर्ज करने वाले वकील को जस्टिस बना दिया था।  इसी तरह न्यायिक आयोग के जिला जज को हाई कोर्ट जज बना दिया जाएगा, ऐसा ही हुआ।

मेरी  4 महीने बाद जबलपुर हाईकोर्ट से जमानत हुई। जबलपुर उच्च न्यायालय में सरकार ने जमानत देने का विरोध करते हुए तर्क दिया कि यदि डॉ. सुनीलम मुलताई जाएगा, तो किसान उसे जिंदा जला कर मार डालेंगे, क्योंकि उसने किसानों की हत्या करवायी है। लेकिन तमाम धमकियों के बावजूद जेल से मैं सीधा मुलताई गया। पुलिस दमन झेला। हर 12 तारीख को किसान महापंचायत का सिलसिला जारी रखा। किसान पंचायत में जो भी आता था, उसको पुलिस पीट कर जेल भेज देती थी। पुलिस किसान पंचायत भी नहीं करने देती थी।

देश भर में सभी सक्रिय संगठनों के प्रतिनिधि मंडल मुलतापी आए। गोली कांड की जनसुनवाई भी हुई। स्वयं उपमुख्यमंत्री सुभाष यादव और प्रभारी मंत्री हजारीलाल रघुवंशी ने मुलताई पुलिस गोली चालन के लिए एसपी, कलेक्टर को दोषी माना लेकिन एसपी, कलेक्टर एवं अन्य अधिकारियों पर हत्या के मुकदमे दर्ज नहीं किए गए।

परमंडल के ग्राम वासियों एवं किसान संघर्ष समिति के किसानों ने हर माह की 12 तारीख को किसान पंचायत का सिलसिला शुरू किया, जो आज भी जारी है। अब तक 312 किसान पंचायत हो चुकी है। गत 25 वर्षों से 25 दिसंबर को किसान संघर्ष समिति का स्थापना दिवस और 12 जनवरी को शहीद किसान स्मृति सम्मेलन आयोजित किया जाता है। कोरोना काल में भी यह सिलसिला नहीं टूटा। सम्मेलन के पहले  हम लगभग 100 गांवों का दौरा नियमित करते हैं।  12 जनवरी 2024 को 313 वीं किसान पंचायत होगी।

देश भर के किसान संगठनों के बड़े नेता महेंद्र सिंह टिकैत, विजय जांवंधिया, शरद जोशी, नंजुल स्वामी, राकेश टिकैत, वी एम सिंह, राजू शेट्टी, जनसंगठनों के नेता मेधा पाटकर, स्वामी अग्निवेश, सुनील भाई, योगेंद्र यादव, समाजवादी नेता पूर्व  सांसद सुरेन्द्र मोहनजी, पूर्व केंद्रीय मंत्री मधु दंडवतेजी, शरद यादव, जयपाल रेड्डी जी, पूर्व प्रधानमंत्री वी पी सिंह, देवेगौडा, भी मुलताई आ चुके हैं।

पीयूसीएल सहित  तमाम मानव अधिकार संगठनों ने जनसुनवाई की है। डॉ. बी डी शर्माजी और सुरेन्द्र मोहनजी ने लगातार किसान संघर्ष समिति का साथ दिया, मुलताई आकर लगातार किसानों का मार्गदर्शन किया।

चिखलीकला की महापंचायत में डॉ. बी डी शर्माजी, मेधा पाटकरजी तथा मेरे बार-बार मना करने के बावजूद किसान महापंचायत ने मुझे चुनाव लड़ाने का फैसला किया। चुनाव हुआ। कुल वोट के 50 प्रतिशत वोट देकर मुझे किसानों ने विधायक बनाया। 5 साल बाद भी 60 प्रतिशत वोट देकर फिर एक बार विधायक चुना।

इस बीच मुझ पर तथा 250  किसानों पर 67 मुकदमे चलते रहे। हालांकि मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह द्वारा मुकदमे वापस लेने, शहीद स्तंभ बनवाने, शहीद किसानों के परिवारों को स्थाई नौकरी दिलवाने की घोषणा सदन के भीतर और बाहर लगातार की जाती रही, लेकिन मुकदमे चलते रहे।

साजिश पूर्वक तरीके से पहले बैतूल लोकसभा क्षेत्र को आरक्षित कर दिया गया। बाद में मुलताई क्षेत्र का परिसीमन कर, करोड़ों रुपये खर्च कर जातिगत समीकरण बनाकर मुझे हराया गया। चुनाव हारते ही सभी केस तेजी से चलने लगे। हर हफ्ते हमें पेशी पर जाना पड़ता था, मुझ पर एवं सभी किसानों पर दर्ज किये गये सभी 140 प्रकरणों में एड. आराधना भार्गव ने नि:शूल्क पैरवी की।

17 वर्ष बाद तीन प्रकरणों में षडयंत्रपूर्वक मुझे और तीन साथियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गयी। मुझे कुल 54 वर्ष की सजा हुई। 4 महीने जेल काटने के बाद मैं जमानत पर रिहा हुआ। तब से आज तक जबलपुर हाईकोर्ट से जमानत पर हूं। इस कारण आज भी मुलताई और बैतूल न्यायालय में लगातार जाना होता है। 

मुझे संतोष हैं कि गत वर्षों में मैं किसानों की एकजुटता बढ़ाने में कामयाब रहा हूं। किसान संघर्ष समिति शुरू से ही जन आंदोलनों के साथ जुड़ी रही। मंदसौर गोलीकांड के बाद हमने अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति का गठन किया।

सम्पूर्ण कर्जा मुक्ति और लाभकारी मूल्य की गारंटी कानून बनाने और लागू करने का प्रयास किया लेकिन सरकार ने 3 किसान विरोधी कानून लागू कर दिए, जिन्हें रद्द कराने में संयुक्त किसान मोर्चा को 380 दिन लग गए। 732 किसानों की शहादत हमें झेलनी पड़ी।

केंद्र सरकार को किसानों की ताकत के आगे घुटने टेकने पड़े। तीन किसान विरोधी कृषि कानूनों को रद्द करने के लिए मजबूर होना पड़ा। किसान संगठन फिर अपनी एमएसपी पर खरीद की कानूनी गारंटी लागू कराने की मांग को लेकर राष्ट्रव्यापी आंदोलन शुरू कर चुके हैं। 26 नवंबर 23 को देश भर में राजभवनो पर भारी प्रदर्शन किए गए हैं। 

यक्ष प्रश्न यह है कि इस बार सरकार आंदोलन से कैसे निपटेगी? कानून बनाएगी या मुलताई और मंदसौर की तरह गोलीचालन के माध्यम से किसानों से निपटेगी? 

हम मुलताई गोली चालन के बाद से ही जनांदोलनों पर आंदोलनों के दौरान पुलिस गोलीचालन पर कानूनी प्रतिबंध की मांग कर रहे हैं लेकिन अब तक सरकारें इस मांग को नजरंदाज करती रही हैं। राजनीतिक दलों ने भी इस मांग को अपने चुनावी एजेंडा में स्थान नहीं दिया हैं। सभी पार्टियां चाहती हैं कि उनके पास सरकार में काबिज होने पर जनांदोलनों को हिंसात्मक तरीके से कुचलने का अधिकार होना चाहिए।

निचोड़ यह है कि मुलताई गोली चालन से सरकारों और राजनैतिक दलों ने कोई सबक नहीं सीखा है। वे किसान, किसानी और गावों के खात्में पर अमादा है परंतु किसान भी आंदोलन के लिए कमर कसकर तैयार है। जहां तक किसानों के मुद्दों का सवाल है। किसानों को राजस्व और फसल बीमा का मुआवजा 

पहले की तुलना में अधिक मिल रहा है परंतु अभी भी मुआवजा नाकाफी है। अनावरी तय करने की इकाई अभी किसान का खेत तो नहीं हुई परंतु तहसील की जगह पटवारी हल्का हुई है, जो किसानों के लिए नाकाफी है।

25 वर्षों में यह अंतर जरूर आया है कि किसान अपने अधिकारों के लिए पहले की तुलना में अधिक सजग और संगठित हैं। इस स्थिति तक पहुंचाने में किसान संघर्ष समिति ने भी अपनी सीमित ताकत के साथ अहम भूमिका का निर्वहन किया है।

(डॉ. सुनीलम, पूर्व विधायक एवं किसान संघर्ष समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।)

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