Saturday, November 27, 2021

Add News

डॉ. मुल्कराज आनंदः भारत के चार्ल्स डिकेंस

ज़रूर पढ़े

डॉ. मुल्कराज आनंद, मुल्क की उन बाकमाल शख्सियतों में शामिल हैं, जिन्होंने विदेशियों को यह बतलाया कि एक हिंदुस्तानी भी उन्हीं की जुबान में उन जैसा उत्कृष्ट लेखन कर सकता है। अंग्रेजी जुबान उनके लिए कोई टैबू नहीं है। बीबीसी ने अपनी डाक्यूमेंटरी में उन्हें इंडियन डिकेेंस कहते हुए, भारत में अंग्रेजी लेखन का जनक बतलाया था। अपनी 99 साला जिंदगी में मुल्कराज आनंद ने 100 से ज्यादा किताबें लिखीं, जिनका दुनिया की 22 जुबानों में अनुवाद हुआ और यह किताबें सभी जगह सराही गईं। मुल्कराज आनंद की किताबों का यदि प्रकाशन-क्रम देखें, तो जब से उन्होंने लिखना शुरू किया, तब से लगभग हर साल उनकी कोई न कोई किताब प्रकाशित हुई।

देश-दुनिया के बड़े लेखकों आरके नारायण, सज्जाद जहीर, अहमद अली और राजा राव, ईएम फोस्टर, हरबर्ट रीड, हेनरी मिलर, जॉर्ज ऑरवेल से उनके दोस्ताना तआल्लुक रहे। मुल्कराज आनंद, प्रगतिशील लेखक संघ के संस्थापक सदस्य थे। साल 1935 में लंदन में भारतीय प्रगतिशील लेखकों का जब पहला ग्रुप बना, तो उसमें डॉ. मुल्कराज आनंद का बड़ा रोल था। लंदन में रीजेंट स्क्वायर स्थित उनके एक कमरे में इन भारतीय लेखकों की बकायदा मीटिंगें होती थीं। अपने लेखन से वे मुल्क की आजादी में किस तरह का योगदान दे सकते हैं?, इसके बड़े-बड़े मंसूबे बनते थे। आगे चलकर प्रगतिशील लेखक संघ के घोषणा-पत्र का जो पहला मसैदा बना, उसको तैयार करने में भी मुल्कराज आनंद की बड़ी भूमिका रही।

12 दिसंबर, 1905 को अविभाजित भारत के पेशावर में जन्मे मुल्कराज आंनद की शुरुआती तालीम खालसा कॉलेज, अमृतसर और पंजाब यूनिवर्सिटी में हुई। उनकी आगे की तालीम कैंब्रिज यूनिवर्सिटी लंदन से हुई, जहां साल 1929 में उन्होंने फिलॉस्फी में पीएचडी की डिग्री हासिल की। पीएचडी की उपाधि प्राप्त करने के बाद मुल्कराज आनंद ने ‘लीग ऑफ नेशंस स्कूल ऑफ इंटेलेक्चुअल को-ऑपरेशन’ जिनेवा में अध्यापन किया।

दूसरी आलमी जंग के दौरान उन्होंने लंदन में बीबीसी के लिए एक पटकथा लेखक के तौर पर काम किया। इसके अलावा ब्रॉडकास्टर की भी अहम जिम्मेदारी निभाई। जॉर्ज ऑरवेल भी उस वक्त बीबीसी से जुड़े हुए थे। देश की आज़ादी का संघर्ष जब चरम पर पहुंचा, तो कुछ योजनाओं और नये विचारों के साथ मुल्कराज आनंद साल 1946 में भारत लौट आए। साल 1948 से 1966 तक उन्होंने देश के कई विश्वविद्यालयों में अध्यापन किया। अंग्रेजी पत्रकारिता भी की।

डॉ. मुल्कराज आनंद ने लंदन में अपनी जिंदगी का काफी वक्त बिताया। लंदन में पढ़ाई के दौरान ही उनके बहुचर्चित उपन्यास साल 1935 में ‘अनटचेबल’ (अछूत) और साल 1936 में ‘कुली’ प्रकाशित हो गए थे। अपने इन दोनों उपन्यासों में वे देश की वर्ण व्यवस्था और वर्ग व्यवस्था से सीधे-सीधे टकराते हैं। मुल्कराज आनंद बीस साल की छोटी उम्र से ही लिखने लगे थे। ‘टू लीव्स एंड अ बड’, ‘द विपेज’, ‘अक्रॉस द ब्लैक वाटर्स’, ‘द सोर्ड एंड द सिकल’, ‘द प्राइवेट लाइफ़ ऑफ़ ऐन इंडियन प्रिंस’ उनकी दीगर अहम किताबें हैं।

इन किताबों के अलावा मुल्कराज आनंद ने सात खंडों में ‘सेवन एजेज ऑफ मैन’ (इंसान की सात उम्रें) शीर्षक से अपनी आत्मकथा भी लिखी है। जो अलग-अलग समय प्रकाशित हुई। मसलन साल 1951 में ‘सेवन समर्स’ (बचपन), साल 1968 में ‘मॉर्निंग फेस’ (किशोरावस्था का ब्योरा), साल 1976-‘कन्फेशन ऑफ ए लव्हर’ (युवावस्था), साल 1984-‘दि बबल’ (प्रौढ़ावस्था) इसी तरह के बाकी तीन और खंड हैं। साल 1946 में आई किताब ‘एपॉलॉजी फॉर हिरोइज्म’ भी मुल्कराज आनंद की एक दीगर आत्मकथा है। इस किताब को उन्होंने पंडित जवाहरलाल नेहरू को समर्पित किया था।

मुल्कराज आनंद को अपने पहले ही नॉवेल ‘अनटचेबल’ से खूब मकबूलियत मिली, लेकिन इस उपन्यास को छपवाना, उनके लिए आसान नहीं रहा। उपन्यास के विषय को देखते हुए, कई प्रकाशकों ने इसे छापने से इंकार कर दिया था। आखिरकार इंग्लिश ऑथर ईएम फॉर्स्टर की कोशिशों से यह उपन्यास प्रकाशित हुआ। प्रकाशित होते ही इस उपन्यास ने पूरी दुनिया में धूम मचा दी। चौबीस भाषाओं में इसका अनुवाद हुआ। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी तक ने इस उपन्यास की तारीफ की। किताब की प्रस्तावना ईएम फॉर्स्टर ने लिखी थी।

अपनी इस प्रस्तावना में फॉर्स्टर ने लिखा है, ‘‘शब्दाडंबर और वाक् जाल से बचते हुए किताब सीधे पाठक के दिल तक जाती है और उसे शुद्ध कर देती है। हममें से कोई भी शुद्ध नहीं है। यदि होते, तो हम जीवित न होते। निष्कपट व्यक्ति के लिए सब कुछ शुद्ध हो सकता है और यही उसके लेखन की निष्कपटता है, जिसमें लेखक पूरी तरह से कामयाब हुआ है। ‘अछूत’ जैसा उपन्यास कोई भारतीय ही लिख सकता है और वह भी ऐसा भारतीय जिसने अछूतों का भली-भांति अध्ययन किया हो। कोई यूरोपियन भले ही कितना सहृदय क्यों न हो, भाखा जैसे चरित्र का निर्माण नहीं कर सकता। क्योंकि वह उसकी मुसीबतों को इतनी गहराई से नहीं जान सकता। और कोई अछूत भी इस पुस्तक को नहीं लिख सकता।’’     

‘अनटचेबल’ पर ईएम फॉर्स्टर की यह राय, पूरी तरह से सटीक है। ‘अछूत’ एक ऐसे शख्स, भाखा की कहानी है, जो मैला ढोता है। ब्रिटिश उपनिवेशवाद के तहत देश में दलितों के जो भयावह हालात थे, वे उपन्यास में बखूबी सामने आए हैं। एक अलग विषय और उतने ही संवेदनशील तरीके से विषय की प्रस्तुति की वजह से उपन्यास ‘अछूत’ खूब पसंद किया गया। इस उपन्यास के बाद मुल्कराज आनंद ‘भारत के चार्ल्स डिकेंस’ कहे जाने लगे।

मुल्कराज आनंद ने अपने दूसरे उपन्यास ‘कुली’ (साल 1936) में भी सर्वहारा वर्ग के दुःख-दर्द की बात की। उनकी जिंदगी की दारुण स्थितियों को दिखलाया। वहीं साल 1937 में आए उनके एक और चर्चित उपन्यास ‘टू लीव्स एंड अ बड’ (एक कली दो पत्तियां) में सर्वहारा वर्ग का नायक, पूंजीवाद से टकराता है। उपन्यास चाय के बागान में काम करने वाले एक पंजाबी मजदूर की दुःखमय कहानी है, जिसका शोषण, बागान का अंग्रेज अफसर करता है। ‘टू लीव्स एंड अ बड’ भारत के अलावा एक साथ ब्रिटेन और अमेरिका में भी छपा। सभी जगह इसको तारीफ मिली।

उपन्यास, मशहूर निर्माता-निर्देशक-लेखक ख्वाजा अहमद अब्बास को भी पसंद आया। उन्हें इस स्टोरी में भारतीय समाजवाद के उभार का एक पहलू दिखलाई दिया। इस एक नुकते का छोर पकड़कर, अब्बास ने साल 1956 में फिल्म ‘राही’ बनाई। अलबत्ता यह बात अलग है कि देव आनंद, बलराज साहनी, नलिनी जयवंत और हबीब तनवीर जैसे बेहतरीन अदाकारों, प्रेम धवन और अनिल विश्वास जैसे होनहार गीतकार, संगीतकार के बाद भी फिल्म बॉक्स ऑफिस पर नाकाम रही।

साल 1940 में मुल्कराज आनंद का उपन्यास ‘एक्रास द ब्लैक वाटर्स’ प्रकाशित हुआ। यह उपन्यास दूसरी आलमी जंग में लड़े हिंदुस्तानी सोल्जर की जिंदगी पर केंद्रित है। उन्होंने अपने उपन्यासों में जो भी विषय चुने, वे बेहद चुनौतीपूर्ण थे। लिखने से पहले वे उस विषय पर काफी शोध करते थे, ताकि उनमें विश्वसनीयता दिखाई दे। नॉवेल ‘द प्राइवेट लाइफ़ ऑफ़ ऐन इंडियन प्रिंस’ (साल 1953) में भी मुल्कराज आनंद भारत की ही बात करते हैं। भारतीय स्थितियों और देश की समस्याओं से वे अच्छी तरह से वाकिफ थे, लिहाजा लंदन में होने के बाद भी वे अपने लेखन के जरिए बार-बार भारतीय विषयों को दुनिया भर के सामने लाते थे।

उन्होंने यह सब लेखन एक रणनीति के तहत किया। ताकि दुनिया भारत और वहां की स्थितियों के बारे में ज्यादा से ज्यादा जाने। डॉ. मुल्कराज आनंद एक रिवोल्यूशनरी थे और उनकी यह क्रांतिकारी विचारधारा उनकी रचनाओं में भी झलकती थी। इस ख्याल से उनका नाता ताउम्र रहा। अपने उपन्यास, कहानियों के अलावा दीगर लेखन में भी समाजवाद उनका केंद्रीय बिंदु होता था। वे बड़ी मुखरता से अपनी बात कहते थे। साल 1946 में आई किताब ‘अपॉलॉजी फॉर हीरोइज्म’ में उन्होंने सोशलिज्म को इंसान की हर समस्या का हल बतलाया था। उनके मुताबिक़ सोशलिज्म से ही आर्थिक और राजनीतिक आज़ादी हासिल होगी।

मुल्कराज आनंद इंसानियत और वैश्विक भाईचारे के तरफदार थे। उनके उपन्यास और कहानियों के जो भी किरदार हैं, उनमें एक अलग तरह की जिजीविषा और जीवटता दिखलाई देती है। अन्याय, अत्याचार और गैरबराबरी के खिलाफ वे संघर्ष करते हैं। अपने शानदार लेखन की वजह से मुल्कराज आनंद की ख्याति पूरी दुनिया के लेखकों के बीच थी। ब्रितानी लेखक जॉर्ज ऑरवेल तक उनके बड़े प्रशंसक थे।

मुल्कराज आनंद की किताब ‘द सोर्ड एंड द सिकल’ (साल 1942) पर अपनी राय रखते हुए ऑरवेल ने कहा था, ‘‘आनंद का नॉवेल (भारतीय) सांस्कृतिक जिज्ञासा जगाता है।’’ मुल्कराज आनंद ने अंग्रेजी में जरूर लिखा, लेकिन वे हमेशा भारतीय बने रहे। अंग्रेज़ी के वे पहले लेखक हैं, जिन्होंने अपने लेखन में पंजाबी और हिंदी शब्दों का जमकर इस्तेमाल किया। भारतीय जबानों को लेकर उनमें कोई हीनता बोध नहीं था। चूंकि मुल्कराज आनंद की आला तालीम लंदन में हुई और उन्होंने अपनी जिंदगी का भी काफी वक्त वहां बिताया। लिहाजा लेखन में वे अंग्रेजी जबान में सहज थे। अंग्रेजी को ही उन्होंने अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया।

डॉ. मुल्कराज आनंद जब तक जिंदा रहे, ‘प्रोग्रेसिव राइटर एसोसिएशन’ से उनका गहरा तआल्लुक रहा। इस तंजीम को मुल्क में आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने हर मुमकिन-नामुमकिन काम किया। कलकत्ता में जब प्रगतिशील लेखक संघ की दूसरी अखिल भारतीय कॉन्फ्रेंस हुई, तो आनंद उस वक्त लंदन में थे, लेकिन इस कॉन्फ्रेंस में शामिल होने के लिए वे खास तौर से भारत आए। भारत आते ही उन्होंने जोश-ओ-खरोश से कॉन्फ्रेंस की तैयारी शुरू कर दी। लखनऊ में उनका कयाम हुआ और उन्होंने यहां से ही प्रगतिशील लेखक संघ के काम-काज को रफ्तार दी। संगठन की मैगजीन ‘न्यू इंडियन लिटरेचर’ की जिम्मेदारी उन्होंने अपने कंधों पर ले ली। मैगजीन के संपादन मंडल में उनके अलावा डॉ. अब्दुल अलीम और अहमद अली भी शामिल थे।

मुल्कराज आनंद ने बंबई, कलकत्ता, लाहौर, अमृतसर और कई शहरों में घूम-घूम कर मैगजीन के स्थायी सालाना मेंबर बनाए और इसके अलावा अन्य लोगों से चंदा भी इकट्ठा किया। बहरहाल मैगजीन के दो अंक ही आ सके। साल 1939 में अपनी किताबों के प्रकाशन के सिलसिले में मुल्कराज आनंद इंग्लैंड वापस गए, तो जाहिर है कि मैगजीन भी बंद हो गई। मुल्कराज आनंद न सिर्फ कलकत्ता कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष मंडल में शामिल थे, बल्कि उन्होंने कॉन्फ्रेंस में तरक्की पसंद तहरीक की विस्तृत रूपरेखा और उसकी आगामी चुनौतियों पर बहुत शानदार वक्तव्य भी दिया। उनका यह वक्तव्य ‘न्यू इंडियन लिटरेचर’ मैगजीन के पहले अंक में प्रकाशित हुआ।

साल 1939 में लंदन पहुंचने से पहले डॉ. मुल्कराज आनंद, स्पेन गए। स्पेन में उन्होंने देखा, किस तरह इंग्लैंड, फ्रांस, तमाम यूरोप एवं अमेरिका के तरक्कीपसंद लेखक और बुद्धिजीवी फासिज्म के खिलाफ लड़ रहे हैं? उन्होंने वहां देखा, ‘लेखकों की यह जद्दोजहद महज जबानी या कलमी नहीं थी, बल्कि बहुत-से लेखक और बुद्धिजीवी वर्दियां पहनकर, जनतांत्रिक सेना की टुकड़ी ‘इंटरनेशनल ब्रिगेड’ में शामिल हो गए थे और प्रगतिशीलता और प्रतिक्रियावाद के सबसे निर्णायक और खतरनाक मोर्चे पर अपना खून बहा कर और अपनी जानें देकर शांति और संस्कृति की दुश्मन ताकतों को रोकने की कोशिश कर रहे थे।’ (किताब-‘रौशनाई तरक्कीपसंद तहरीक की यादें’, लेखक-सज्जाद जहीर, पेज-162, 163)

जाहिर है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर साम्राज्यवाद और फासिज्म के खिलाफ लेखक जिस तरह से दूसरी जनतांत्रिक ताकतों के साथ एकजुट होकर संघर्ष कर रहे थे, ठीक उसी तरह का संघर्ष और आंदोलन वे भारत में भी चाहते थे। भारत आते ही उन्होंने यह सब किया भी। सज्जाद जहीर लिखते हैं, ‘‘उन्होंने भारत के लेखक और बुद्धिजीवियों में यह विद्युत तरंग पैदा करने की कोशिश की, जो उस समय पश्चिमी यूरोप के लेखक-बुद्धिजीवियों के मन में दौड़ रही थी।

उन्होंने देश के बड़े-बड़े शहरों में विद्यार्थियों, लेखकों और बुद्धिजीवियों की सभाओं में स्पेन की लड़ाई के अंतरराष्ट्रीय महत्त्व पर ओजस्वी भाषण दिए और अपने सहधर्मी साहित्यकारों के समूह को खास तौर पर दुनिया के तमाम मानवता प्रेमी बुद्धिजीवियों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर युद्धोन्माद और प्रतिक्रियावाद के खिलाफ संघर्ष करने के लिए प्रेरित किया।’’ (किताब-‘रौशनाई तरक्कीपसंद तहरीक की यादें’, लेखक-सज्जाद जहीर, पेज-164) मुल्कराज आनंद ने यह सारी कवायद, भाग-दौड़ प्रगतिशील लेखक संघ के बैनर पर ही की।

डॉ. मुल्कराज आनंद की शख्सियत और उनके पूरे मिजाज को अच्छी तरह से जानना-समझना है, तो उनके खास दोस्त सज्जाद जहीर, इसके लिए मौजू होंगे। अपनी किताब ‘रौशनाई तरक्कीपसंद तहरीक की यादें’ में वे लिखते हैं, ‘‘आनंद स्वभाव से बड़ी जोशीली तबीयत के आदमी हैं। उनकी लेखनी जिस तेजी से चलती है, उससे ज्यादा तेजी के साथ उनकी जबान चलती है। अगर उनमें किसी बात की धुन हो जाए, तो फिर वे अपनी बात को मनवाने के लिए या अपने काम को अंजाम देने के लिए जमीन-आसमान के कलाबे मिला देते हैं। वे उन गिनती के चंद लेखकों में से हैं, जो किताब लिखने पर ही नहीं उसके मुद्रण और प्रकाशन पर भी उतनी ही मेहनत करते हैं। एक भारतीय लेखक के लिए इंगलैंड में अंग्रेजी में नॉवेल लिखकर इंग्लैंड की किताबों की मंडी में अपने लिए एक ऊंची जगह बना लेना, आनंद का ही काम था।’’ (किताब-‘रौशनाई तरक्कीपसंद तहरीक की यादें’, लेखक-सज्जाद जहीर, पेज-163)

सज्जाद जहीर यहीं नहीं रुक जाते, बल्कि उनकी और भी कई खूबियों को बयां करते हुए कहते हैं, ‘‘कई बार तो आनंद के दोस्त यह महसूस करते हैं कि वे एक अच्छे और संवेदनशील साहित्यकार ही नहीं, बल्कि अपनी किताबों के एक कुशल व्यापारी भी हैं। इसके बावजूद उनका अदबी मर्तबा कम नहीं होता। वे तमाम सांस्कृतिक और साहित्यिक प्रगतिशील आंदोलनों में आगे बढ़कर हिस्सा लेते हैं। और अगर ऐसे मौकों पर किसी खास काम की जिम्मेदारी उन्होंने अपने ऊपर ले ली, तो फिर वे निचले नहीं बैठते। वे अपने साथ अपने इर्द-गिर्द बल्कि दूर के लोगों को भी हिलने-डुलने पर मजबूर कर देते हैं। और जैसे भी हो वे उस काम को अंजाम देते हैं कि मालूम होने लगता है, वह उनका ज़ाती या निजी काम है।

कई लोगों को आनंद के कामों में आत्मप्रदर्शन दिखाई देता है, लेकिन आनंद को इसकी बिल्कुल परवाह नहीं होती और वे अपने काम में जुटे रहते हैं। उनके स्वभाव में जो व्यग्रता और बेचैनी है, वह उनकी अतिशय संवेदनशीलता और मस्तिक की तेजी का नतीजा मालूम होती है। और जब उनके भीतर भावनाओं का ज्वार उठता है, तो इससे उनका अहंवाद नहीं, बल्कि उनके मन की कोमलता व्यक्त होती है।’’ (किताब-‘रौशनाई तरक्कीपसंद तहरीक की यादें’, लेखक-सज्जाद जहीर, पेज-163)

मुल्कराज आनंद का सारा लेखन, मकसदी लेखन है। उन्होंने जो भी लिखा, उसमें हमें कहीं न कहीं एक मकसद दिखलाई देता है। अपने उद्देश्यों के लिए उन्होंने लगातार संघर्ष किया और उसे हासिल भी किया। तमाम संवैधानिक प्रावधानों के बाद भी देश में जो वर्ण व्यवस्था, अस्पृश्यता है, उससे मुल्कराज आनंद को तकलीफ होती थी। दलित वर्ग की स्थिति में वे और सुधार एवं उन्हें समानता देने की बात करते थे। इसके लिए वे सामूहिक प्रयास करने की बात करते थे। आरक्षण के भी वे हिमायती थे और यह आरक्षण सही तरह से अमल में आए, इसकी भी वकालत करते थे।

मुल्कराज आनंद तरक्कीपसंद, जनवादी ख्याल के थे और आखिरी दम तक उनका इस ख्याल में अकीदा रहा। मुल्क में तरक्कीपसंद तहरीक जैसी मुहिम हमेशा चलती रहे, इसके वे हिमायती थे। नई पीढ़ी के लेखकों से उनका कहना था, ‘‘अपने लेखन से वे समाज को आगे ले जाएं, उसे एक नई दिशा दें।’’ मुल्कराज आनंद एक साथ कई विषयों पर आसानी से लिख लेते थे। वे एक हरफनमौला लेखक थे। उपन्यास भी लिख रहे हैं, किसी विषय पर कोई लेख लिखना है, तो वह भी बीच में लिख दिया। यही नहीं, कहीं भाषण देने जाना है या किसी व्याख्यानमाला में शिरकत करना है, तो वह भाषण भी तैयार कर लिया।

मुल्कराज आनंद दर्शन और इतिहास के विद्वान थे। भारतीय साहित्य, कला, पुरातत्व और संस्कृति का भी उन्हें खासा ज्ञान था। वीके कृष्ण मेनन के साथ उन्होंने इंडिया लीग में काम किया। साल 1965 से लेकर 1970 तक वे ललित कला अकादमी के अध्यक्ष रहे। यही नहीं, साल 1967-68 में इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस स्टडीज, शिमला के विजिटिंग प्रोफेसर रहे। उन्होंने ‘मार्ग’ नामक पत्रिका की स्थापना की और ‘कुतुब पब्लिशर्स’ के निदेशक रहे। साहित्य के अलावा मुल्कराज आनंद ने कला, संस्कृति, राजनीति और इतिहास पर भी खूब लिखा। ‘मार्क्स ओर ऐंगल्स इन इंडिया’, टैगोर, नेहरू आदि शख्सियतों के अलावा एसोप्स, केबल्स, कामसूत्र आदि अलग-अलग विषयों पर भी अपनी कलम चलाई।

मुल्कराज आनंद अपने साहित्यिक लेखन के लिए कई पुरस्कार-सम्मान से नवाजे गए। साल 1972 में उनकी किताब ‘मॉर्निंग फेस’ को साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला, तो भारत सरकार ने साल 1967 में मुल्कराज आनंद को उनकी साहित्यिक सेवाओं के लिए ‘पद्म भूषण’ सम्मान से सम्मानित किया गया। विश्व शांति परिषद् ने उन्हें ‘अंतरराष्ट्रीय शांति पुरस्कार’ से नवाजा। इतनी विराट शख्सियत होने के बाद भी मुल्कराज आनंद सादा जीवन जीने में यकीन करते थे। अपना आखिरी समय उन्होंने महानगरों के शोरगुल से दूर महाराष्ट्र के खंडाला में बिताया। जहां का प्राकृतिक वातावरण उन्हें बहुत रास आता था। 28 सितंबर, 2004 को यह भारतीय लेखक जिसकी अंतरराष्ट्रीय ख्याति थी, 99 साल की उम्र में हमसे हमेशा के लिए जुदा हो गया।

(मध्य प्रदेश निवासी लेखक-पत्रकार जाहिद खान, ‘आजाद हिंदुस्तान में मुसलमान’ और ‘तरक्कीपसंद तहरीक के हमसफर’ समेत पांच किताबों के लेखक हैं।)

तत्काल समाचारों के लिए, हमारा जनचौक ऐप इंस्टॉल करें

Latest News

जजों पर शारीरिक ही नहीं सोशल मीडिया के जरिये भी हो रहे हैं हमले:चीफ जस्टिस

चीफ जस्टिस एनवी रमना ने कहा है कि सामान्य धारणा कि न्याय देना केवल न्यायपालिका का कार्य है, यह...
जनचौक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें

Janchowk Android App

More Articles Like This

- Advertisement -