बाउम्मीद होना हमेशा हौसला-अफ़्ज़ा होता है, ख़ास तौर पर तब जब युवा अपनी उम्मीद की एक दुशवार झलक देते हैं। लेकिन नौजवानी दुनिया को देखने का कोई नज़रिया या विचारधारा नहीं होती। युवा लोगों ने हमें निराशा भी दी है। वे ज़ायनवाद के साथ अमेरिकी साँठ-गाँठ के खिलाफ़ संघर्षरत हैं। लेकिन वे उन 90% इज़रायलियों में भी शामिल हैं जो फ़िलिस्तीन में जारी क़त्लेआम का समर्थन करते हैं। अपने ही देश की बात करें तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नौजवानों को नात्सियों की तरह सींचते और तैयार करते हैं।
सोवियत संघ में युवा कम्युनिस्ट लीग का सदस्य होना उस ख़्वाब के भविष्य को मूर्त रूप देना था, जो बहुत जल्द ही फ़ीका पड़ गया।
दक्षिण एशिया के युवा कार्यकर्ता मिली-जुली प्रतिक्रिया को जन्म देते हैं, जहाँ राजनीति ने वामपंथ और दक्षिणपंथ के बीच की विभाजक रेखा को ख़तम कर मध्यमवाद और व्यवहारवाद से बदल दिया है। व्यवहारवाद अक्सर खोटे सिक्के पर मुलम्मा चढ़ाने का बहाना मात्र होता है।
यह स्थिति चिन्ताजनक है, लेकिन राज्य की ओर से होने वाले एक सुनियोजित दमन के लिए तैयार रहने की और भी वजहें मौजूद हैं, ख़ासकर तब जब बलप्रयोग के साधनों पर एकाधिकार जमाये सिरफिरा शासकवर्ग ख़ुद के अस्तित्व के लिए ख़तरा महसूस करने लगे; जैसा की दिल्ली में कॉकरोच पार्टी के आन्दोलन में शामिल हुए युवाओं से हुआ।
तथ्यों पर ग़ौर फ़र्माएँ। बारह लातिन अमेरिकी देश वामपंथ की ओर झुकाव रखने वाली पिछली ‘गुलाबी-लहर’ को पलटते हुए दक्षिणपंथ की ओर रुख़ कर चुके हैं। चुनावी चक्रों की एक लहर ने इस इलाक़े के राजनीतिक परिदृश्य को बुनियादी रूप से बदल दिया है। इस तबदीली में उल्लेखनीय देश हैं कोलम्बिया, पेरु, अर्जेन्टीना, एल साल्वाडोर, चिली, इक्वाडोर, बोलिविया, पनामा, कोस्टा रिका, होन्डुरस और पैराग्वे।
वजहें दक्षिण एशिया के कारणों से अलहदा नहीं हैं। मुद्रास्फ़ीती, सामाजिक ग़ैर-बराबरी, भ्रष्टाचार, महामारी के बाद आर्थिक ठहराव जैसे मसले जनता में सत्ता विरोधी भावनाओं का कारण बने। ‘ट्रम्प प्रभाव’ को भी एक वजह माना जाता है, बेशक यूरोप और एशिया में यह धारणा प्रचलित हो चुकी है कि तेल-समृद्ध खाड़ी क्षेत्र में अमेरिका का प्रभाव ख़त्म होने की कगार पर है।
लातिन अमेरिका के कई नेता सक्रिय रूप से एल साल्वाडोर के तानशाह से उधर लिए समूहिक कारावास और कठोर सुरक्षा पंक्ति वाले ‘बुकैले मॉडल’ की नक़्ल उतार रहे हैं। दक्षिण एशिया भी इससे अछूता नहीं रहा है। एक देश के पदच्युत नेता कारावास में बन्द हैं, जबकि दूसरे देश की अपदस्थ नेता उन लोगों से बचती फिर रही हैं, जिन्होंने सड़क की ताक़त के बल पर उन्हें सत्ता से बेदख़ल कर दिया था।
भारत के दक्षिणपंथी प्रधानमंत्री ने उन लोगों के लिए एक नया नाम गढ़ लिया है जो उनका अगला निशाना हो सकते हैं — सोचने वाले युवा। तो आख़िर कौन हैं “दिमाग़ी नक्सल” जिनके बारे में मोदी ने देश को चेतावनी दी है? चे ग्वेरा और जॉन कीट्स के जीवनकालों के बीच एक सदी का फ़ासला था, लेकिन शायद वे इस बात की ओर इशारा करते कि नरेन्द्र मोदी के निशाने पर आख़िर कौन हो सकता है।
चे ने कहा था, “अगर हर ना-इंसाफ़ी पर तुम्हारा खून खौल उठता है, तो तुम मेरे कॉमरेड हो।” एक बोहेमियान बुलबुल के सामने इन्सानों के सूरत-ए-हाल को बयान करते हुए कीट्स ने कहा था “जहाँ कि चिन्तन होता है केवल विषाद-भावों से भरे जाना।”
मोदी के ताकतवर शिक्षा मंत्री, कॉकरोच आन्दोलनकारी जिनके हटाये जाने की माँग कर रहे थे, के इस्तीफ़े पर खुशी में मग्न उमड़ी भीड़ में शामिल होने से पहले यह याद कर लेने में कोई बुराई नहीं कि आपातकाल लागू किए जाने से पहले के दौर में इन्दिरा गांधी को भी इसी तरह अपने दो मुख्यमंत्रियों — गुजरात में चिमनभाई पटेल और बिहार में अब्दुल ग़फूर — को हटाने के लिए मजबूर होना पड़ा था।
एक अदालती फ़ैसले द्वारा उन्हें सत्ता से हटाये जाने की माँग उठने के बाद जब वे चारों ओर से घिर गयीं, तो उन्होंने निर्णायक क़दम उठाया और अपने विरोधियों को जेल में डाल दिया। श्रीमती गांधी मूलतः लोकतंत्रवादी थीं, बेशक सबसे अच्छी लोकतंत्रवादी न सही लेकिन सबसे बुरी भी नहीं थीं। अपने ख़िलाफ़ खड़े हुए हिंसक उभार को कुचल देने के बाद उनके पास चुनाव को थामे रखने का कोई दूसरा वाजिब कारण नहीं था।
फिर हम यह कैसे जान सकते हैं कि अगर हालात फैसलाकुन होते नज़र आने लगे तो मोदी इससे भी कठोर क़दम उठाने की तैयारी नहीं करेंगे?
आज के राजनीतिक हालात 1975 में आपातकाल के पहले मौजूद परिस्थितियों की तुलना में कहीं अधिक पेचीदा प्रतीत होते हैं। 1977 के चुनावों (जो उन्होंने अपने इस ख़याल के आधार पर कराये थे कि वे भारी बहुमत से जीत जाएँगी) में इन्दिरा गांधी की हार के बाद उनके शासनकाल में हुई ज़्यादतियों की जाँच के लिए एक जाँच आयोग का गठन किया गया था। शाह आयोग ने जाँच के जो भी नतीजे निकाले वे उन्हें तिहाड़ जेल में एक रात से अधिक रखने के लिए नाकाफ़ी थे।
लेकिन आज मोदी के विरोधियों द्वारा गिनायी जा रही ज़्यादतियों की सूची पर नज़र डालिए। यही नहीं, गहरे तक पैठ बनाये ऐसे कई सारे देशी और विदेशी समूह हैं जो मोदी के सत्ता से बाहर होने की महज़ आशंका से खौफ़ज़दा हैं।
उन टीवी चैनलों और उनके दिग्गज एंकरों का क्या हश्र होगा, जो नफ़रती बयानबाज़ियों और सरकार की चाटुकारिता के मंच बन चुके हैं? राम मन्दिर घोटाले की जाँच का क्या होगा? अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर, गौतम अडानी पर लगाये गये 25 करोड़ डॉलर के भ्रष्टाचार के आरोप का क्या होगा और विपक्ष के उस दावे का क्या होगा कि डोनाल्ड ट्रम्प के सरकार में आने के बाद अमेरिकी न्याय विभाग ने इस मामले को ख़त्म करने की राह निकाल ली है?
यह फैसला कथित तौर पर तब आया, जब अडानी ने ट्रम्प के निजी वकील रॉबर्ट जे. जिउफ़्रा जूनियर को बतौर वकील नियुक्त किया और अमेरिकी अर्थव्यवस्था में 10 अरब डॉलर निवेश कर 15,000 रोज़गार पैदा करने की एक अनोखी पेशकश की।
विपक्ष के नेताओं का दावा है कि मोदी ने इस कॉर्पोरेट भ्रष्टाचार पर उच्च-स्तरीय अमेरिकी कूटनीतिक बैठकों में लीपापोती कर दी। मोदी सरकार के राजनीतिक गतिरोध में फँस जाने कि स्थिति में इज़राइल की प्रतिक्रिया क्या होगी? इंदिरा गांधी के आपातकाल के ख़िलाफ़ पूरा पश्चिमी जगत मुखर हो उठा था, शायद इस वजह से भी कि उन्हें सोवियत संघ की सहयोगी के रूप में देखा जाता था।
आज ग़ज़ा में जारी भीषण खूँ-रेज़ी पर पश्चिम ख़ामोश है; ऐसे में वह भारतीय लोकतंत्र के पक्ष में बोलने का साहस कैसे जुटाएगा, ख़ासकर तब, जब मोदी सरकार “उनके लिए काम” कर रही है?
अतः, सवाल यह है, क्या इस नयी पीढ़ी ने एक भयंकर दमनचक्र को झेलने की हिम्मत और प्रतिबद्धता तलाश ली है? भारत के पड़ोस में मौजूद पाकिस्तान ऐसे महत्वपूर्ण राजनीतिक बदलाव का चश्मदीद बना है जिनमें तख़्तापलट और ग़ासिबों का सत्ता से बेदख़ल होना, दोनों शामिल हैं। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि जब ज़ियाउल हक़ ने एक निर्वाचित प्रधानमंत्री को फाँसी के तख़्ते से लटका दिया, तब उनके अत्याचारों के ख़िलाफ़ वैसा जनविद्रोह नहीं हुआ, जिसकी उम्मीद ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो ने की थी।
तारिक़ अली ने अपने नाटक द लेपर्ड एंड द फॉक्स में इस विडम्बना को रेखांकित किया है। रावलपिण्डी, लाहौर और सिंध जैसे स्थानों पर स्थानीय स्तर पर सड़क के संघर्ष तो हुए, लेकिन भुट्टो की फाँसी के ख़िलाफ़ विरोध-प्रदर्शन बिखरे हुए ही रहे। इसलिए, जब “दिमाग़ी नक्सल” और तरह-तरह के “कॉकरोच” अपने अगले साहसिक यात्रा पर विचार करें, तो अपनी अटूट उम्मीदों के साथ थोड़ी-सी आमादगी भी जोड़ लें।
(जावेद नकवी का लेख डॉन से साभार। अनुवाद : वृषाली श्रुति)