Tuesday, November 29, 2022

सिब्बल के बाद अब दुष्यंत दवे ने जकिया जाफ़री,पीएमएलए फैसले और मास्टर ऑफ़ रोस्टर पर सवाल उठाए

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अभी पिछले ही हफ्ते वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने पीपुल्स ट्रिब्यूनल में गुजरात दंगों में राज्य के पदाधिकारियों को एसआईटी की क्लीन चिट को चुनौती देने वाली जकिया जाफरी की याचिका को खारिज करने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले की आलोचना और मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम अधिनियम के प्रावधानों को बरकरार रखने के फैसले की भी आलोचना की थी, जो प्रवर्तन निदेशालय को व्यापक अधिकार देते हैं।सिब्बल ने यह भी कहा था कि सुप्रीम कोर्ट से नहीं बची उम्मीद, संवेदनशील मामले कुछ जजों को ही सौंपे जाते हैं। अभी इसकी सुर्खियाँ भी नहीं सूखी थीं कि एक अन्य वरिष्ठ अधिवक्ता दुष्यंत दवे ने जकिया जाफरी और पीएमएलए एक्ट के फैसलों की कड़ी आलोचना करते हुए चीफ ज‌स्टिस द्वारा “मास्टर ऑफ रोस्टर” के रूप में सुप्रीम कोर्ट की पीठों को मामला सौंपने की प्रक्रिया पर चिंता व्यक्त की है। दवे ने कहा कि मुझे लगता है कि रोस्टर के मास्टर के रूप में चीफ जस्टिस के पास किसी भी मामले को किसी भी पीठ को सौंपने की कोई शक्ति नहीं होनी चाहिए। प्रक्रिया पूरी तरह से स्वचालित होनी चाहिए।

लाइव लॉ के साथ एक साक्षात्कार में दवे ने कहा कि प्रक्रिया पूरी तरह से स्वचालित होनी चाहिए और यह इतनी स्वचालित और कम्प्यूटरीकृत होनी चाहिए कि कोई भी मानवीय हस्तक्षेप इसे छू न सके। हां, चीफ जस्टिस पीठों के गठन का फैसला कर सकते हैं, चीफ जस्टिस उन पीठों को विषय-वस्तुओं के आवंटन का फैसला कर सकते हैं, लेकिन एक बार ऐसा करने के बाद, कंप्यूटर को स्वचालित रूप से कार्य करना चाहिए और मामलों को अपनी व्याख्या के अनुसार भेजना जारी रखना चाहिए। रजिस्ट्री या चीफ जस्टिस के जर‌िए मानवीय हस्तक्षेप बेहद परेशान करने वाला है।

दवे ने उदाहरण देते हुए कहा कि एक विशेष कॉरपोरेट घराने के मामले एक विशेष पीठ को आवंटित किए जाते थे। आप और कैसे समझाते हैं कि सबसे बड़े कॉरपोरेट घरानों में से एक के नौ निर्णय जस्टिस अरुण मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने दिए थे? 2019 जून में मेरे पत्र के बावजूद, उस समय तक चार मामले भेजे गए थे, जिसके बाद पांच और मामले चीफ जस्टिस गोगोई द्वारा भेजे गए। यह आपको क्या बताता है? जब जस्टिस गोगोई की पुस्तक का विमोचन हुआ तो उन्होंने उस पुस्तक के विमोचन पर अपने परिवार के साथ कॉर्पोरेट इकाई के प्रमुख का स्वागत किया? यह आपको क्या बताता है?

दवे ने कहा कि यह देखना वास्तव में परेशान करने वाला है इस तरह की घटनाएं हो रही हैं और सुप्रीम कोर्ट में हर कोई अपनी आंखें बंद करना चाहता है! जज क्या कर रहे हैं? सुप्रीम कोर्ट में दरअसल अच्छे जज होते हैं। अच्छे जज चुप क्यों हैं? क्या सुप्रीम कोर्ट की विशेष बेंच कॉरपोरेट हाउस के लिए है, यह बात लंबे समय से हो रही है!

दवे ने कहा कि मुझे याद है जब केरल के पूर्व मुख्यमंत्री पर आरोप लगाया गया था और- जस्टिस बालकृष्णन चीफ जस्टिस थे-उन दिनों, मामला उल्लेख करने पर केवल पहली पांच पीठों को सौंपा गया था, और मामला 9 या 10 अदालत में भेजा गया था और तुरंत एक अंतरिम आदेश दिया गया था। ऐसा बार-बार हो रहा है।

दवे ने कहा कि रजिस्ट्री का कामकाज अपारदर्शी है, युवा वकील परेशान हो रहे, जजों को बार की शिकायतें सुननी चाहिए। उन्होंने कहा कि कई युवा वकीलों में यह भावना बढ़ रही है कि उनके मामले महीनों तक सूचीबद्ध नहीं किए जाते हैं और कुछ शक्तिशाली एडवोकेट के मामले अचानक सूचीबद्ध हो जाते हैं, कभी-कभी भले ही उसी जजमेंट से अन्य एडवोकेट-ऑन -रिकॉर्ड ने सुप्रीम कोर्ट में बहुत पहले याचिका दायर की हो। ये सभी चीजें बेहद गलत संदेश भेजती हैं।

दरअसल “मास्टर ऑफ रोस्टर” का मामला उच्चतम न्यायालय के चार जजों के ऐतिहासिक प्रेस कांफ्रेंस में भी उठाया गया था, लेकिन प्रेस कांफ्रेंस में शामिल जस्टिस रंजन गोगोई ने भी अपने पूर्ववर्ती चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के मास्टर ऑफ रोस्टर की प्रणाली जारी रखी, जो पूर्व चीफ जस्टिस एसए बोबडे और वर्तमान चीफ जस्टिस एनवी रमना के कार्यकाल में भी जारी है।

दवे ने सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले की तीखी आलोचना की है। उन्होंने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट का धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के प्रावधानों को बरकरार रखने का फैसला काला धब्बा है। वह 27 जुलाई को जस्टिस एएम खानविलकर, जस्टिस दिनेश माहेश्वरी और जस्टिस सीटी रविकुमार की पीठ की ओर से दिए गए फैसले की चर्चा कर रहे थे, जिसमें गिरफ्तारी, छापे, कुर्की और बयान दर्ज करने और जमानत के लिए कड़ी शर्तें रखने और सबूत के उल्टे बोझ जैसी प्रवर्तन निदेशालय की विस्तृत शक्तियों को बरकरार रखा गया था। (विजय मदनलाल चौधरी और अन्य बनाम यूनियन ऑफ इंडिया)।

दवे ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) को हथियार थमा दिया है। उन्हें वह औज़ार दिया गया है, जिसे हम पिछले कुछ वर्षों से देख रहे हैं कि ईडी उसका दुरुपयोग कर रही है”। उन्होंने कहा कि जजों द्वारा की गई अधिनियम की व्याख्या आपराधिक न्यायशास्त्र के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है और यह निर्णय कई खामियों से ग्रस्त है। उन्होंने कहा कि मुझे लगता है कि यह निर्णय निश्चित रूप से सुप्रीम कोर्ट के अन्यथा अच्छे कामों पर, जिन्हें वह समय-समय पर करता रहा है, एक धब्बा है। वास्तव में इसे लंबे समय तक याद किया जाएगा, ‌जो कि सुप्रीम कोर्ट ने नागरिकों को दिया है, जिसे उसे नहीं करना चाहिए था।

दवे ने कहा कि जजों को उस चयनात्मक तरीके पर ध्यान देना चाहिए था, जिस तरीके से ईडी का इस्तेमाल राजनीतिक विपक्ष पर हमला करने के लिए किया जा रहा है। उन्होंने माना कि भ्रष्टाचार से सख्ती से निपटा जाना चाहिए, मगर समस्या यह है कि ईडी अपनी जांच में चयनात्मक रही है। उन्होंने कहा, क्या केवल विपक्ष में भ्रष्टाचार है? क्या पूरे देश में भाजपा नेतृत्व का एक भी व्यक्ति या उनके मित्र हैं, जिनकी जांच तक की गई है, ईडी ने गिरफ्तार तो बिल्कुल ही नहीं किया है? क्या हमें यह विश्वास करना चाहिए कि विभिन्न भाजपा सरकारों, उन नगरपालिका और अन्य प्राधिकरणों में, जिन पर भाजपा का नियंत्रण है, वहां कोई गलत काम नहीं हो रहा है? क्या हम इतने अंधे हैं कि हम उस संपत्ति को नहीं देखना चाहते जो देश भर के भाजपा नेताओं और उनके परिजनों ने जमा की है?

उन्होंने कहा कि जिन लोगों के पास दौलत है, उनकी जांच होनी चाहिए। हम सभी जानते हैं कि देश में क्या हो रहा है। माना जाता है कि बहुत कम लोग आज भी अपने करों का भुगतान करते हैं और वे आलीशान घरों में रहते हैं, फैंसी कारों में चलते हैं, वे अपने बच्चों की शादी में 100 या 200 करोड़ खर्च करते हैं। क्या यह सब ईडी नहीं देख रहा है?

दवे ने कहा कि मुझे लगता है कि जजों का न देखना ठीक नहीं है। उन्हें न्यायिक नोटिस लेना चाहिए। वे यह नहीं कह सकते कि वे आइवरी टावरों में रहते हैं। ऐसा पुराने दिनों में था। आज जज हर चीज से वाकिफ हैं। और ये जज एक अधिनियम की व्याख्या कर रहे हैं, जो मेरे विचार से, हर तरह से आपराधिक न्यायशास्त्र के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है। फैसले में कई खामियां हैं। उन्होंने कहा, परेशानी की बात यह है कि जज इसे देखने में विफल हैं और उन्होंने प्रवर्तन निदेशालय को ऐसी असाधारण शक्तियां दी हैं, जो संवैधानिक कानून, मौलिक अधिकारों और बुनियादी मानवीय मूल्यों के मूल सिद्धांतों के बिल्कुल विपरीत हैं।

दवे ने गुजरात दंगों के मामले (जकिया जाफरी बनाम गुजरात राज्य) में सुप्रीम कोर्ट के आदेश की तीखी आलोचना की है। उल्लेखनीय है कि उक्त मामले में फैसले के बाद सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ और गुजरात के पूर्व एडीजीपी आरबी श्रीकुमार को गिरफ्तार कर ‌लिया गया था। दवे ने तीस्ता और श्रीकुमार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के आदेश की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि मैं तीस्ता, श्रीकुमार और संजीव भट्ट के खिलाफ मुकदमा चलाने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले से बहुत परेशान हूं। मुझे लगता है कि सुप्रीम कोर्ट ने बहुत गलत संदेश भेजा है। मुझे लगता है कि सुप्रीम कोर्ट ने दूत को गोली मारने जैसा कार्य किया है, जो लोकतंत्र और कानून के शासन के लिए अच्छी खबर नहीं है।

दवे ने कहा कि मामले की सच्चाई यह है कि दंगे हुए थे, तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ आरोपों को परे रखें, फिर भी दंगे हुए थे। तथ्य यह है कि 5 दिनों के लिए सेना को नहीं बुलाया गया था और इसके परिणामस्वरूप बड़ी हिंसा हुई और हजारों निर्दोष लोगों की जान चली गई। निस्संदेह, पुलिस गोधरा कांड को रोकने में विफल रही थी। पुलिस को सावधान रहना चाहिए था, वे जानते थे कि गोधरा एक संवेदनशील जगह है, और इस बात के पर्याप्त संकेत थे कि हिंसा होने की आशंका है। यदि गोधरा हिंसा को पुलिस द्वारा नहीं रोका गया तो जो पुलिस अधिकारी ऐसा करने में विफल रहे, उनके विरुद्ध विभागीय कार्यवाही की जानी चाहिए थी, जो कभी नहीं की गई।

उन्होंने कहा कि उसके बाद हिंसा हुई, और तथ्य यह है कि आला अधिकारियों के आदेश के तहत निर्दोष कारसेवकों, जिन्होंने अपनी जान गंवाई थी, के शवों को खुले रास्ते से कई शहरों में अंतिम संस्कार के लिए ले जाया गया, जिसका नतीजा यह रहा कि हजारों लोग अंतिम संस्‍कार में शामिल हुए और उसके तुरंत बाद हिंसा भड़क उठी। यदि कोई समझदार सरकार रही होती तो उसने जिम्मेदारी के साथ यह सुनिश्चित किया होता कि अंतिम संस्कार यथासंभव शांति से हो और दुर्भाग्यपूर्ण कारसेवकों को हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार सम्मानजनक अंतिम संस्कार किया जाए। लेकिन ऐसा करना तो दूर, उनके शवों की परेड कराने की अनुमति दी गई, और इससे राज्य भर के लोगों में गुस्सा पैदा हुआ।

दवे ने कहा कि 1984 के सिखों के खिलाफ दंगों के तुरंत बाद भी पीड़ितों को नागरिक समाज से बहुत कम सहायता मिली थी हालांकि श्री फूलका जैसे साहसी वकीलों ने उनके मामलों को उठाया। उसकी तुलना में, 2002 में, कार्यकर्ता सामने आए और वास्तव में दंगा पीड़ितों की मदद की। शुरुआत में अद्भुत काम करने वाले सदस्यों में से एक श्री हरीश साल्वे थे। कई मामलों में, वह गुजरात दंगों से संबंधित मामलों में एक न्याय मित्र के रूप में न्यायालय की सहायता कर रहे थे। बंद किए गए कई दंगों के मामलों को फिर से खोल दिया गया था।

दवे ने कहा कि तीस्ता सीतलवाड़ लंबे समय तक एसआईटी और श्री साल्वे के संपर्क में रहीं। सुप्रीम कोर्ट द्वारा सीतलवाड़ के खिलाफ मुकदमा चलाने का दिया गया आदेश न केवल असंवैधानिक है, बल्कि मैं कहूंगा कि अत्यधिक अनैतिक है।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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