Thursday, January 20, 2022

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अकाली और जेजेपी: किसान राजनीति के दो अवसरवादी चेहरे

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किसान आंदोलन में दो सबसे बड़े अवसरवादी चेहरे सामने आये हैं। ये हैं- पंजाब का अकाली दल और हरियाणा की जननायक जनता पार्टी (जेजेपी)। दोनों दल अब किसानों के मुद्दे पर मसीहा बनने को उतावले नज़र आ रहे हैं।

देश के किसानों के खिलाफ जब तीनों काले कानून का बिल सबसे पहले लोकसभा में लाया गया था तो अकाली दल सुप्रीमो प्रकाश सिंह बादल की बहू हरसिमरत कौर बादल केंद्रीय मंत्री थीं।  उन्होंने एक बार भी इस बिल के खिलाफ नहीं बोला और न ही कोई संदेह जताया। उनके ससुर प्रका़श सिंह बादल और पति सुखबीर सिंह बादलभी चुप रहे।

अब प्रकाश सिंह बादल अपना पद्म सम्मान लौटाने की घोषणा कर रहे हैं। बहुत दर्दीली आवाज़ में बातें बना रहे हैं। पर, यह लोग आख़िर किसको बेवकूफ बनाना चाहते हैं?

यह बात बहुत साफ़ है कि अकाली और भाजपा हमेशा साथ रहे हैं और आगे भी साथ रहेंगे। ये थोड़े समय के लिए किसानों को बेवकूफ बनाकर अपना टाइम पास कर रहे हैं। इनके घड़ियाली आंसुओं पर कोई तरस न खाये। अकाली दल का अब ये कहना कि बीजेपी या प्रधानमंत्री मोदी ने हमसे राय नहीं ली, बहुत बड़ा झूठ है। आपकी ज़िम्मेदारी थी, उस समय आप लोग बड़े कॉरपोरेट घरानों से आगे की कॉन्ट्रैक्ट फॉर्मिंग पर चर्चा कर रहे थे, अपनी एग्रो कंपनियाँ बनाने पर विचार कर रहे थे। रिलायंस से समझौता कौन करेगा, इसकी ज़मीन तैयार कर रहे थे। 

अब जेजेपी की बात…

हरियाणा की जनता ने पिछले विधानसभा चुनाव में बीजेपी को ख़ारिज कर दिया था। इस अल्पमत की पार्टी ने जेजेपी से गठबंधन कर राज्य में फिर सरकार बना ली। जबकि चुनाव प्रचार समाप्त होने के आख़िरी दिन दुष्यंत चौटाला का भाषण वीडियो में आज भी मौजूद है, जिसमें उन्होंने मोदी और संघ का पूरी ज़िन्दगी विरोध करने की क़समें खाई थीं। हरियाणा के जाटों ने पिछले चुनाव में वोट ही बीजेपी के खिलाफ दिया था। इसी वजह से कांग्रेस और जेजेपी की ठीक ठाक सीटें आईं थीं।  जेजेपी ने उनका वोट ही बीजेपी और संघ विरोध के नाम पर माँगा था। खट्टर के पिछले कार्यकाल में जाट आंदोलन से सरकार ने कैसे निपटा था, उसे याद था। कांग्रेस से जेजेपी का तालमेल होता इससे पहले दुष्यंत दिल्ली में अमित शाह के आवास पर प्रेस कॉन्फ़्रेंस करते नज़र आये। हरियाणा का जाट मतदाता तिलमिला कर रह गया। वो इसे भूला नहीं है।

जेजेपी का संस्थापक अजय चौटाला यानी दुष्यंत चौटाला के पिता अजय चौटाला अपने पिता ओमप्रकाश चौटाला के साथ करप्शन मामले में जेल में थे।

दुष्यंत ने बीजेपी से डील की और पिता अजय चौटाला बाहर आ गये। अजय चौटाला पैरोल पर बाहर हैं। कोई नहीं जानता कि इस पैरोल की अवधि कितनी लंबी है।

नहीं अजय चौटाला अब कह रहे हैं कि अगर एमएसपी के मामले में किसानों के साथ नाइंसाफ़ी हुई तो मेरा बेटा हरियाणा सरकार से बाहर आ जाएगा। मतलब कि जेजेपी सरकार में नहीं रहेगी। किसानों के लिए ये घड़ियाली आँसू अजय चौटाला और दुष्यंत चौटाला अब तक क्यों रोक रखे थे? ज़ाहिर है कि ये भी टाइमपास बयान है। हरियाणा के डिप्टी सीएम का पद छोड़ने के लिए बहुत बड़ा कलेजा चाहिए। परिस्थितियाँ ऐसी हैं कि अजय चौटाला यह फ़ैसला नहीं ले सकते।

जेजेपी के तीन चार विधायक पार्टी से पहले ही बग़ावत कर चुके हैं। बरोदा उपचुनाव में ज़ोर लगाने के बावजूद जेजेपी अपने सहयोगी दल बीजेपी प्रत्याशी और अंतरराष्ट्रीय पहलवान को नहीं जिता सकी। जेजेपी का किसानों के हक में अब बोलना अवसरवादिता है। लोकसभा में जब इस बिल को लाया गया तब जेजेपी क्यों सो रही थी? 

हरियाणा की खट्टर सरकार को समर्थन दे रहे निर्दलीय विधायक सोमबीर सांगवान का किसानों के मुद्दे पर सरकार से समर्थन वापस लेना हरियाणा का मूड बताने को काफ़ी है। सोमबीर सांगवान को खट्टर ने राज्य लाइवस्टाक बोर्ड का चेयरमैन बना रखा था। सोमबीर ने चेयरमैनी छोड़ दी है। सोमबीर का कहना है कि हरियाणा की सारी खाप किसानों के खिलाफ बने तीनों काले कानून के विरोध में हैं। ऐसे में वे कैसे खट्टर सरकार और बीजेपी का समर्थन करें?

अकाली दल और जेजेपी जो घड़ियाली आँसू बहा रहे हैं, दरअसल सोमबीर के बयान से उनकी असलियत और खुलकर सामने आ गई है। हुआ ये है कि किसानों के दम पर अपनी राजनीति चमकाने वाले अकाली दल और जेजेपी के पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक चुकी है। इसकी आहट उन्होंने सुन ली है। यही वजह है कि अब किसानों के हमदर्द बनकर सामने आने की कोशिश में जुट गए हैं। पर, ये काम इतना आसान नहीं है। इसीलिए बीजेपी के इशारे पर अकाली और जेजेपी पंजाब-हरियाणा के किसान संगठनों में फूट डालने की कोशिश में साथ-साथ जुटे हैं।

अकालियों का अवसरवाद पहली बार सामने नहीं आया है। भाजपा के हमनिवाला और हमप्याला ये वही पार्टी है जिसके सुप्रीमो प्रकाश सिंह बादल दिल्ली आकर संविधान की प्रतियाँ तक जला चुके हैं। उस समय राष्ट्रवादियों और हिन्दुत्व के खैरख्वाह अटल और आडवाणी बादल की इस हरकत पर चुप रह गए थे। एक बार भी विरोध नहीं किया। जब अटल – आडवाणी नहीं बोले तो तथाकथित देशप्रेमी आरएसएस भला क्यों बोलता। प्रकाश सिंह बादल ने संविधान की प्रतियाँ जलाने की ये हरकत महज उस समय सक्रिय कुछ चरमपंथी गुटों को ख़ुश करने के लिए की थी। लेकिन अकालियों की ये हरकत इतिहास के पन्नों में दर्ज है, इसलिए ये तथ्य हमेशा बीजेपी और अकालियों का पीछा करते रहेंगे।

बहरहाल, उम्मीद है कि तमाम किसान संगठनों पर बीजेपी के दायें और बायें बाजू बनी इन दोनों पार्टियों अकाली दल और जेजेपी से सावधान रहेंगे। क्योंकि आरएसएस-बीजेपी भी अपने किसान संघ के नेता से बयान दिलवाकर किसानों से दायें-बायें से फ़र्ज़ी हमदर्दी जता रहे हैं। लेकिन बीजेपी में फ़िलहाल वही होगा जो मोदी और अमित शाह चाहेंगे। कॉरपोरेट और विश्वबैंक की सलाह से बनाये गये तीनों काले क़ानूनों पर मोदी-शाह झुकेंगे, इसकी संभावना क्षीण है। 

अकाली, जेजेपी, बीजेपी, आरएसएस इस समय किसानों के मामले में किसी भी हद तक जा सकते हैं, इसलिए किसानों को चौकन्ना रहने की ज़रूरत है। देश में “भगवा फासिस्ट क्रोनी कैपिटिलिस्ट ग्रुप” (एसएफसीसीजी) बहुत मज़बूत स्थिति में है। ये पूरा समूह ही किसान और देश के लोगों के खिलाफ बनाया गया है। परिस्थितियाँ सचमुच भयावह हैं। हम लोग सजगता और एकजुटता से ही इस समूह का मुक़ाबला कर सकते हैं। 

(यूसुफ किरमानी वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं)

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