Wednesday, February 1, 2023

ग्राउंड रिपोर्ट: इलाहाबाद बन गया है छात्रों के लिए मृत्यु की उपत्यका घाटी

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प्रयागराज। कभी इलाहाबाद आईएएस-पीसीएस की फैक्ट्री के तौर पर जाना जाता था। लेकिन आए दिन होने वाली छात्रों की खुदकुशियों ने इसकी पहचान बदल दी है। अब इसे ‘मौत के कुएं’ के तौर पर जाना जाता है। अखबारों में बन रहीं आत्महत्या की ये सुर्खियां बताती हैं कि इलाहाबाद अब छात्रों के सपनों को परवाज देने वाला शहर नहीं बल्कि ‘मृत्यु की उपत्यका घाटी’ बन गया है। जहां बारी-बारी से छात्र अपनी जीवन इहलीला समाप्त करने के लिए आते हैं। इलाहाबाद की ये स्थिति अचानक नहीं बनी होगी। आखिर इसके पीछे क्या कारण हैं इसको जानने के लिए जनचौक संवाददाता ने छात्रों की रिहाइश वाली डेलीगेसियों सलोरी, गोविंदपुर, शिवकुटी, बघाड़ा, छोटा बघाड़ा का दौरा किया। यहां जो चीजें सामने आयीं वो बेहद परेशान करने वाली हैं।   

मरम्मत कार्य प्रगति पर होने के चलते फाफामऊ पुल महीने भर के लिये बंद है। लिहाजा फाफामऊ से तेलियरगंज के लिये तीन गुना अधिक किराया चुकाकर पीपा पुल से बालू फांकते हुये छात्रों के पहले रहनिवासी सलोरी में जाना हुआ। जहां 42 डिग्री तापमान की तपती दोपहरी में बिजली नहीं थी। सैकड़ों लॉजों के बीच मौजूद एक लॉज के एक कमरे में घुसा जहां न इन्वर्टर था, न कूलर। धूल, मिट्टी और मक्खियों के मल से पटा छत से लटकता सीलिंग फैन गर्मी की क्रूर सत्ता के ख़िलाफ़ प्रतियोगी छात्र की मनोदशा का प्रतीक सा लगा, ख़ैर। पानी का गिलास मेरे आगे बढ़ा, पसीना पोछते हुए प्रतियोगी छात्र ने कहा, “जब से तापमान बढ़ा है दोपहर में बिजली की कटौती बढ़ गई है”। इससे पहले अपना परिचय देते हुए आने के मकसद के बारे में बताया। तभी उनमें से एक छात्र ने कहा कि आपका नाम हमने सुना है। विश्वविद्यालय के पूर्व वीसी रतन लाल हांगलू और महिला साहित्यकार पर आपकी कई ख़बरें उस समय हमने पढ़ी है।

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छात्रों की खुदकुशी के मुद्दे पर बात करने पर एक सीनियर छात्र जो विगत कई वर्षों से सलोरी के एक लॉज में रहकर तैयारी कर रहे हैं, ने कहा कि देखिये अनौपचारिक तौर पर आप चाहे जो पूछ लीजिये, बात कर लीजिये कोई दिक्क़त नहीं है। लेकिन औपचारिक बात-चीत करने, मीडिया बाइट देने और तस्वीरें छपने से हम छात्रों के चिन्हित होने का ख़तरा है। रिपोर्ट में छात्रों का नाम और तस्वीर  न आने की शर्त पर वो लोग बातचीत के लिए तैयार हुए। और फिर बारी-बारी से कई छात्रों ने बात की। एक छात्र ने बताया कि “उत्तर प्रदेश में राजनैतिक सत्ता परिवर्तन का पूरा भरोसा था, जो कि नहीं हुआ। पिछले पांच साल में प्रदेश में भर्तियां नहीं निकली। जो निकलीं उनमें पेपर आउट हो गया। पिछले पांच साल में 18 परीक्षाओं के पेपर लीक हुये”। 

प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में लगे छात्रों के सामने आने वाली परेशानियों का जिक्र करते हुए एक दूसरे छात्र का कहना था कि “दूर दराज के जिलों से आये अधिकांश छात्र ग़रीब परिवारों से हैं। माता-पिता कुछ पैसा गेहूँ-चावल बेंचकर भेजते हैं और कुछ छात्र ट्यूशन देकर मैनेज करते हैं। इसी आशा में कि कोई परीक्षा क्लियर हो जायेगी तो घर परिवार के दिन फिर जायेंगे। साल दर साल उम्र निकली जा रही है, न भर्ती निकल रही है, न समय से और पारदर्शी तरीके से परीक्षा हो रही है। घर-परिवार की उम्मीदों को पूरा करने का हर मौका सरकार छात्रों से छीन ले रही है ऐसे में छात्र करें भी तो क्या करें”।

सलोरी के बाद इस संवाददाता ने गोविंदपुर और शिवकुटी के लॉजों का रुख किया। शिवकुटी के एक तिमंजिला मकान में एक सिंगल कमरे में दो लड़के शेयर करके रहते हैं। कमरे में तख्त, किताबों और कुछ बर्तनों के अलावा और कुछ नहीं दिखा। कमरे में पहुंचने परे एक छात्र हर्ष प्रेशर कुकर की सीटी निकालते दिखा जिसमें जुगाड़ से दाल, चावल और आलू एक साथ पकाया जा रहा था। कुकर में लोटा यह अपने किस्म का अजूबा दृश्य था। छात्रों की अपनी जरूरत और सहूलियत के लिहाज से यह प्रयागराज की अनूठी खोज दिखी। 

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हर्ष, प्रतियोगी छात्र

यूनिवर्सिटी छात्र व एसएससी की तैयारी कर रहे हर्ष बताते हैं कि “शिवकुटी में पिछले दो सालों में कई प्रतियोगी छात्रों ने खुदकुशी की है। आलम यह है कि यहां मकान मालिक इतने आशंकित रहते हैं कि चार-चार घंटे पर दरवाजा खटखटाते रहते हैं। पढ़ाई और घर परिवार का हाल चाल पूछते रहते हैं। वहीं घर परिवार के लोग कहते हैं कि इतने बड़े इलाहाबाद में शिवकुटी छोड़ और कोई जगह नहीं मिली क्या तुम्हें रहने के लिए। कहीं और ले लो कमरा। शिवकुटी में किसी छात्र के आत्महत्या की ख़बर पढ़ते-सुनते हैं तो दिल धक्क सा हो जाता है”। 

यह पूछने पर कि आखिर छात्रों में इतनी हताशा क्यों है जो वो खुदकुशी करने जैसा कदम उठा रहे हैं। इस पर कमरे में मौजूद और सीए की तैयारी कर रहे अभिनव कहते हैं कि “बेरोज़गारी बड़ा कारण है। इतने साल तैयारी के बाद भी जब एक अदद नौकरी हाथ न लगे और उम्र के साथ उम्मीद भी साथ छोड़ने लगे तो ये कदम उठाने पर विवश हो जाते हैं छात्र। हालांकि मेरा मानना है कि परिस्थिति कितनी भी विषम क्यों न हो संघर्ष छोड़कर आत्महत्या जैसा कदम नहीं उठाना चाहिये”।

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अभिनव, प्रतियोगी छात्र

छोटा बघाड़ा और बघाड़ा के तिमंजिला मकानों में प्रतियोगी छात्र-छात्राओं के लिये हजारों लॉज हैं। यहां मकान मालिकों की आमदनी का एक ज़रिया प्रतियोगी छात्रों के लिये बने लॉज भी हैं। जिन्हें वो किराये पर प्रतियोगी छात्रों को देते हैं। 25 जनवरी को आधी रात पुलिस ने यहां के कई लॉजों में घुसकर प्रतियोगी छात्रों पर लाठियां बरसाई थी। ज्यूडिशियल सर्विस (PCS J) की तैयारी कर रहे अतुल प्रतियोगी छात्रों की खुदकुशी के मसले पर कहते हैं, “मौजूदा सरकार शिक्षा, प्रतियोगिता और छात्रों को हतोत्साहित कर रही है। ज्यूडिशियरी, शिक्षा, सिविल, रेलवे, चिकित्सा समेत तमाम विभागों में लाखों पद खाली पड़े हैं। इससे एक ओर जहां समाज पर भार बढ़ा है वहीं दूसरी ओर नौकरी पाने की उम्र में खड़े प्रतियोगी छात्रों पर भी दबाव बढ़ा है। एक-दो शिक्षकों के बल पर पूरा प्राथमिक स्कूल चल रहा है। 4.7 करोड़ केस कोर्ट में लंबित पड़े हैं लेकिन जजों की नियुक्ति नहीं हो पा रही है। यह आंकड़ा खुद सरकार ने 25 मार्च को लोकसभा में दिया है”। 

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बघाड़ा का वह लॉज चहां पुलिस ने किया था लाठीचार्ज

अतुल की आवाज़ में निराशा उतर आई। ठंडी सांस लेने के बाद उसने आगे कहा, “प्रतियोगी छात्रों के साथ-साथ उनके परिजन अपने संसाधन, रुपया पैसा उम्र सब बर्बाद करने के बाद जब हाथ निराशा लगती है तो छात्र आत्महंता बन बैठता है”।     

बता दें कि इलाहाबाद में पिछले 15 दिनों में तीन छात्रों ने खुदकुशी की है। ये छात्र जिले के ही दूर गांव से इलाहाबाद शहर तैयारी करने आये थे। बात पिछले छः महीने की करें तो इस दरम्यान 10-12 छात्रों ने खुदकुशी की है। इसी 4 अप्रैल को बांदा जिले की 26 वर्षीय स्वराजनगर निवासी दीक्षा मिश्रा पुत्री कैलाश नाथ मिश्रा ने एसएन पांडेय होस्टल में फांसी लगकार आत्महत्या कर ली। दीक्षा जज बनने की तैयारी कर रही थीं। इसी के ठीक एक सप्ताह पहले सोमवार 28 मार्च को 25 वर्षीय कुलदीप यादव पुत्र नंद लाल यादव ने गोविंदपुर के चिल्ला स्थित पवन लॉज में फांसी लगाकर आत्महत्या किया था। इससे पहले 22 मॉर्च को इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के हॉलैंड हॉल में शोध छात्र संजय पटेल (28 वर्ष) पुत्र अरविंद ने फांसी लगाकर अपने जीवन को समाप्त कर लिया था। संजय बांदा जिले के बबेरू थाना अंतर्गत पलानी गांव के निवासी थे। संजय साल 2011 से इलाहाबाद में रहकर पढ़ाई और नौकरी की तैयारी कर रहे थे। इससे पहले 7 जनवरी को सराय शिवकुटी में ही दुर्गा प्रसाद सिंह लाला (22 वर्ष) ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। वो बस्ती जिले के रहने वाले थे और प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहे थे।      

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शिवकुटी में स्थित कुछ लॉज

 छात्राओं में भी बढ़ी आत्महत्या की प्रवृत्ति

सिर्फ़ छात्रों में ही नहीं बल्कि इलाहाबाद में रहकर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रही छात्राओं में भी आत्महत्या की प्रवृत्ति बढ़ी है। 4 अप्रैल को जहां दीक्षा मिश्रा (26 वर्ष) नामक छात्रा ने आत्महत्या कर लिया। वहीं 4 दिसंबर 2021 शनिवार को जया पांडेय (24 वर्ष) पुत्री विजय कुमार पांडेय ने ब्लड प्रेशर की 45 गोलियां खाकर आत्महत्या कर ली थी। जया पांडेय मोती लाल नेहरू प्रौद्योगिकी संस्थान प्रयागराज में एमटेक की पढ़ाई कर रही थी और आईएचबी गर्ल्स होस्टल में रहती थी। जया मूल रूप से बिहार के रोहतास जिले की धरकंदा के दावद क्षेत्र की थी।

11 जुलाई, 2021 रविवार को रेनू शुक्ला उर्फ साक्षी (20 वर्ष) पुत्री अरुण कुमार शुक्ला ने आत्महत्या कर लिया था। वो इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में बीकॉम की छात्रा थीं और सोहबतिया बाग़ में किराये का कमरा लेकर पढ़ाई कर रही थीं। कोरांव के रवनिया गांव की रहने वाली थीं। 22 फरवरी, 2021 सोमवार को मोती लाल नेहरू मेडिकल कॉलेज में एनस्थीसिया छात्रा ने आत्महत्या की कोशिश कि हालांकि वो बचा ली गई। 1 जून, 2021 को सुल्तानपुर निवासी अंजू यादव (22 वर्ष) पुत्री अशोक कुमार यादव ने आत्महत्या कर ली थी। वो बीए तृतीय वर्ष की छात्रा थी और प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रही थी।  

तेलियरगंज में रहकर सिविल सर्विस की तैयारी कर रही आंचल लड़कियों में बढ़ती आत्महत्या की प्रवृत्ति पर चिंता जाहिर करते हुये कहती हैं, “लड़कियों को जो छूट मिली है वो टर्म और कंडीशन के साथ मिली है। स्नातक करते-करते 21 साल बीत जाते हैं। उन्हें तैयारी करने के लिये बमुश्किल 4-5 साल मिलते हैं। घर वाले अल्टीमेटम देकर रखते हैं कि 24 साल की उम्र तक जो करना है कर लो। 25 वां लगते ही शादी कर देंगे, अधिक उम्र की लड़कियों के लिये अच्छे रिश्ते नहीं मिलते”। आंचल सामतंवादी पितृसत्ता के अलावा मौजूदा सत्ता को भी क़सूरवार मानती हैं। जो एक भर्ती के फॉर्म निकालने से लेकर उसे अंजाम तक पहुंचाने में पांच-सात साल लगा देती है।     

 छात्र आंदोलन के गढ़ में बेरोज़गारी को लेकर कोई आंदोलन नहीं

इलाहाबाद, लखनऊ और वाराणसी ये तीनों शहर छात्र आंदोलनों के गढ़ रहे हैं और इन शहरों का छात्र आंदोलन का गौरवमयी इतिहास रहा है। लेकिन इधर बेरोज़गारी दर आज़ादी के बाद रिकॉर्ड उच्चतम स्तर पर होने के बावजूद बेरोज़गारी के मुद्दे को लेकर कोई बड़ा छात्र आंदोलन नहीं उभरा है। इससे छात्रों में गहरी निराशा है। उन्हें अपने अधिकारों को लेकर कहीं भी संघर्ष होता हुआ नहीं दिख रहा है। अगर छात्र आंदोलन होता तो छात्रों की उम्मीदों को बल मिलता कि उनके रोज़गार के लिये कहीं तो कुछ संघर्ष हो रहा है। लेकिन उन्हें अपनी हताशा, अपना गुस्सा निकालने का कोई ज़रिया नहीं मिल रहा है इससे वो अवसाद का शिकार होकर आत्महत्या करने जैसा क़दम उठा रहे हैं। 

इधर रोज़गार के मुद्दे पर जो छिट-पुट आंदोलन हुये भी वो आंदोलन कम खानापूर्ति ज़्यादा दिखे। आंदोलन छात्रों को संघर्ष करने के लिये प्रेरित करते हैं उनमें जिजीविषा पैदा करते हैं, छात्र आंदोलनों की एक सिरे से ग़ैरमौज़ूदगी ने छात्रों को निराशा और अवसाद में धकेला है। 

सरकार ने इलाहाबाद यूनिवर्सिटी समेत तमाम शैक्षणिक संस्थानों में छात्र संघ के चुनाव को ख़त्म करके छात्रों के संघर्ष और राजनैतिक चेतना के विकास के मार्ग को अवरुद्ध कर दिया है। रोज़गार के मुद्दे पर कभी छिट-पुट आंदोलन होने की स्थिति बनती भी है तो प्रशासन दमन के बल पर छात्रों के हौसले तोड़ देता है। देखा जाये तो पिछले 10 सालों से कोई मजबूत छात्र आंदोलन नहीं हुआ है। इस गैप के चलते नौजवानों छात्रों में लड़ने का ज़ज्बा खत्म हो गया है। ऐसे ही पहले किसानों के साथ था। पिछले बीस साल में देश भर में लाखों किसानों ने आत्महत्या की है। लेकिन सफल और लंबे किसान आंदोलन के बाद किसानों के आत्महत्या की ख़बरें एक सिरे से ग़ायब हो गई हैं। किसान अब आत्महत्या करने, मरने के बजाय संघर्ष करने में विश्वास करने लगा है। लेकिन नौजवानों के मोर्चे पर यह चीज ग़ायब है। इसी के चलते छात्रों में अचानक से आत्महत्या के मामले बहुत ज़्यादा बढ़ गये हैं। छात्र लीडरशिप छात्रों को दिशा नहीं दे पा रही है। 

(प्रयागराज से जनचौक के विशेष संवाददाता सुशील मानव की रिपोर्ट।)

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