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हरिवंश जी, आप का भास्कर का लेख बताता है! सत्ता के मोह और कुर्सी की लालच के नीचे दफ़्न हो जाया करते हैं आदर्श

भारत में जब संसद चलती है तो यह देश हर दिन 2 करोड़ रुपये उसे चलाने के लिए फूंक देता है। राज्य सभा में जाने के लिए इसके उम्मीदवार करोड़ों रुपये खर्च करते हैं। जाहिर है कि वह सिर्फ दो लाख रुपये महीने की तनख्वाह के लिए तो राज्य सभा में नहीं जाता होगा? ये कौन लोग हैं और राज्य सभा में जा कर क्या करते हैं? इसे बताने के लिए नमूने के तौर पर मैंने राज्य सभा के एक सदस्य को चुना है जो एक अख़बार के संपादक रहे हैं, प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के मीडिया सचिव रहे हैं और मौजूदा समय में राज्य सभा के उपसभापति रहे हैं। उन्हें राज्य सभा जदयू की तरफ से भेजा गया है। इन साहब ने कोयले की नीलामी पर दैनिक भास्कर अख़बार में एक लेख लिखा।अभी शायद और भी कड़ियाँ उस आलेख की आएंगी। क्या लिखा है पहले उसे देख लेते हैं।

ये लिखते हैं कि भारत के पास आर्थिक सुपर पावर बनना विकल्प नहीं है बल्कि यह अब एकमात्र रास्ता है। वे आगे लिखते हैं कि यह अर्थ का दौर है और विचार, सिद्धांत, वसूल सब नेपथ्य में चले गए हैं। वे एक अर्थशास्त्री का हवाला दे कर सवाल करते हैं कि भारत अगर 10 ख़रब डॉलर की अर्थव्यवस्था होती तो क्या चीन इसकी तरफ आंख उठा कर देखता? फिर भारत द्वारा कोयला आयात और कोयले के रिज़र्व का हवाला दे कर कोयले की नीलामी को सही ठहराने की कोशिश करते हैं। वे कहते हैं कि प्राइवेट सेक्टर में कोयले का उत्पादन होने से पूंजी निवेश होगा और लगभग 280000 लोगों को रोजगार मिलेगा।

मजदूरों को बेहतर मज़दूरी मिलेगी। आय का बेहतर वितरण होगा और वे आगे कहते हैं कि नयी व्यवस्था के तहत जिलों को सीधे इस आय का हिस्सा मिलने लगेगा। फिर वे कोयले की माइनिंग के बाद पारिस्थितिक तंत्र पुनर्बहाली के उपायों के तरीके बताते हैं। यानी वे अर्थशास्त्र और संविधान दोनों को अपनी बात में शामिल करते हैं। वे क्या नहीं कह रहे हैं और कितना समझते हैं संविधान और अर्थशास्त्र? यही इस आलेख का विषय है और अंत में आपको उस सवाल का जवाब भी मिल जाएगा कि राज्य सभा में जाने के लिए ये लोग इतने पैसे क्यों खर्च करते हैं, क्यों विधायकों को खरीदते हैं और किसका हित पोषित करते हैं ये लोग!

यूपीए की सरकार ने कोयले के ब्लॉक के अंतिम उपयोग (end use) के आधार पर नीलामी की और 2004 से 2009 तक कोयले के ब्लॉक प्राइवेट कंपनियों को आवंटित किया। सीएजी (CAG) जिसके मुखिया उस समय विनोद रॉय थे, ने ऑडिट के क्षेत्र में एक नया शब्द प्रचलित किया और बताया कि कोयले के आवंटन में देश को 10.67 लाख करोड़ रुपये का अनुमान से सिद्ध नुकसान (presumptive loss) हुआ है।

उससे पहले उन्होंने 2 जी स्पेक्ट्रम में भी 1.76 लाख करोड़ रुपये के नुकसान को भी उद्घाटित किया था। भाजपा उस समय विपक्ष में थी। देश में काफी शोर शराबा हुआ। 2014 में सर्वोच्च न्यायालय ने आवंटन में अनियमितता पाते हुए 204 आवंटनों को रद्द कर दिया। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने उक्त आदेश में काफी सख्त टिप्पणियां की थीं। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि उक्त सारे आवंटन बिना किसी वस्तुपरक मानदंड के, बिना ख़बरदार रहे, बिना किसी दिशा-निर्देश या मंत्रालयों या राज्य सरकारों की सिफारिशों के, तुलनात्मक योग्यता के आकलन के बिना, आवेदनकर्ता की आवश्यकता और ब्लॉक की एक रिज़र्व क्षमता के बिना मूल्यांकन के आवंटित की गई थीं। और आवंटन का दृष्टिकोण तदर्थ और आकस्मिक था। कोई भी आवंटन संगत, पारदर्शी और निष्पक्ष नहीं था।

2016 में भाजपा की सरकार ने विनोद राय को पद्म भूषण से सम्मानित किया। उसके बाद लगभग छह साल बीत गए 2जी स्पेक्ट्रम और कोयला घोटाले के फौजदारी मामलों में कोई प्रगति नहीं हुई। कोई नया आरोपित नहीं हुआ न ही कोई नया आरोपी फिर जेल ही गया। न ही वे 10.67 लाख करोड़ रुपये जो अनुमान से सिद्ध नुकसान हुए थे वे भारत सरकार के खजाने में ही आये।

आते तो मोदी की सरकार को रिज़र्व बैंक के खजाने पर 1.76 लाख करोड़ रुपये का डाका नहीं डालना पड़ता। और क्या साम्यता है देखें कि 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में भी अनुमान से सिद्ध नुकसान 1.76 लाख करोड़ रुपये का ही था! तो क्या भाजपा ने विनोद रॉय का इस्तेमाल किया था? इस विनोद रॉय पर फर्जी रपट देने के लिए कोई फौजदारी मुकदमा क्यों नहीं दायर किया गया? विनोद रॉय आज यूनाइटेड नेशंस के बाहरी लेखा परीक्षकों के पैनल के मुखिया हैं, रेलवे के एडवाइजरी बोर्ड में हैं, रेलवे के काया कल्प कौंसिल में हैं। क्या ये मुआवजा नहीं है?

कहा जाता हैं कि मोदी सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय के उक्त आदेश को एक तरह से ख़ारिज करने के लिए कोयला खदान विशेष प्रावधान अधिनियम, 2015 बनाया और अब तक वह 85 कोल् ब्लॉक (जिसमें कुल 24 आबद्ध खान हैं ) की नीलामी कर चुकी है। हरिवंश जी यह नहीं बताते हैं कि सर्वोच्च न्यायालय ने जो ताकीद 2014 के उस आदेश में की थी उनका इन आवंटनों में अक्षरशः पालन हुआ है या नहीं?

भारत 640 मिलियन मीट्रिक टन कोयले का सालाना उत्पादन करता है और लगभग 200 मिलियन मीट्रिक टन आयात करता है। भारत के आयात का बिल 1 लाख करोड़ रुपये सालाना का है। मोदी सरकार कह रही है कि भारत में खुद अपनी क्षमता है तो आयात क्यों करें? इसकी सच्चाई क्या है? आइये देखते हैं।

कोयले के चार प्रकार होते हैं। एन्थ्रेसाइट, बिटुमिनस, लिग्नाइट और सेमी बिटुमिनस। एन्थ्रेसाइट कोयला सबसे अच्छा माना जाता है क्योंकि इससे सबसे कम प्रदूषण होता है। एन्थ्रेसाइट में 80% कार्बन होता है जबकि बिटुमिनस कोयले में 60% से 80%।  बिटुमिनस कोयला भारत के झारखण्ड, ओड़ीशा, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में मिलता है और एन्थ्रेसाइट कोयला सबसे ज्यादा अमेरिका, रूस, यूक्रेन, नार्थ कोरिया, साउथ अफ्रीका, वियतनाम, इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और चीन में मिलता है। चीन इसका सबसे बड़ा उत्पादक है। भारत में यह कोयला केवल जम्मू कश्मीर में मिलता है। बिटुमिनस कोयला भारत में कुल प्रदूषण का 40% का हिस्सेदार है। इससे सल्फर डाई ऑक्साइड भी निकलता है जो भारत में एसिड की बारिश का कारण है। हरिवंश साहब इस पर कुछ नहीं लिखते हैं।

…… जारी…….

(अखिलेश श्रीवास्तव कोलकाता हाईकोर्ट में एडवोकेट हैं। और आजकल कोलकाता तथा जमशेदपुर दोनों जगहों पर रहते हैं।)

This post was last modified on July 25, 2020 9:53 pm

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