Wed. Jan 29th, 2020

नागरिकता संशोधन विधेयक: अब तक का संविधान पर सबसे बड़ा हमला

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अमित शाह उत्तर-पूर्व के नेताओं के साथ।

कल कैबिनेट से पारित हुआ नागरिकता संशोधन विधेयक देश के धर्म के आधार पर विभाजन पर सैद्धांतिक मुहर है। अभी तक भारत धर्म के आधार पर देश और राष्ट्र की कल्पना को खारिज करता रहा है। यही वजह है कि उसने अपना आईन सेकुलर रखा जिसमें नागरिकों के साथ धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाएगा। और न ही उनकी नागरिकता धर्म के आधार पर होगी। इस विधेयक के पारित हो जाने के बाद देश धर्म के आधार पर चीजों को तय करने वाले देशों में शुमार हो जाएगा।

यह संविधान के सेकुलर मिजाज पर मर्मांतक चोट होगी। और यह दरार इतनी गहरी होगी कि आने वाले दिनों में पूरे संविधान को दो चाक कर सकती है। और उसके साथ ही हिंदू राष्ट्र का रास्ता साफ हो सकता है। विधेयक में तीन देशों पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के मुसलमानों को छोड़कर बाकी सभी धर्मों के लोगों के उत्पीड़ित नागरिकों को नागरिकता देने का प्रावधान है। सरकार का कहना है कि उनके पास जाने के लिए भला और कौन स्थान है। सरकार का यह तर्क ईसाई और बौद्धों के लिए खारिज हो जाता है क्योंकि दुनिया में तमाम देश ऐसे हैं जो ईसाई और बौद्ध बहुल हैं। किसी को नहीं भूलना चाहिए कि यूएन चार्टर में यह कहा गया है कि किसी संकट के दौर में शरणार्थी बनाते समय देश धर्म, जाति, क्षेत्र, लिंग या किसी भी इस तरह की पहचानों के आधार पर भेदभाव नहीं करेंगे। और भारत ने भी उस पर हस्ताक्षर कर रखा है।

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सरकार का कहना है कि इस विधेयक को लाने के पीछे मुख्य मकसद घुसपैठियों को बाहर करना है। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि इस समस्या से सबसे ज्यादा प्रभावित उत्तर-पूर्व के राज्यों को इसमें छोड़ दिया गया है। तब कोई पूछ ही सकता है कि आखिर यह बिल लाया किसके लिए गया है। इसका मतलब है कि इसे किसी समस्या को हल करने के लिए नहीं बल्कि नई समस्या पैदा करने के लिए लाया जा रहा है। इस विधेयक के जरिये सरकार पहली बार एक ऐसे आधार पर संसद को फैसला लेने के लिए बाध्य करने जा रही है जो उसकी संवैधानिक मान्यताओं के खिलाफ है। इसके जरिये मोदी सरकार नागरिकता को धर्म के आधार पर परिभाषित किए जाने का रास्ता खोल रही है। और मूलत: अपने हिंदू राष्ट्र की स्थापना के लक्ष्य पर सैद्धांतिक मुहर लगवाना चाहती है।

यह देश की मूल आत्मा के खिलाफ है। यह आईडिया ऑफ इंडिया के विचार के खिलाफ है। यह साझी-विरासत और साझी शहादत के पूरे ताने-बाने को छिन्न-भिन्न करने का फैसला है।

सरकार की गलत नीयत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जिस एनआरसी के जरिये पूरे देश में घुसपैठियों को बाहर निकालने का अमित शाह ऐलान कर रहे हैं। इस बिल में उसके सबसे प्रभावित इलाको को छूट दे दी गयी है। और उससे भी बड़ी बात यह है कि कहने के लिए यह पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश तीन देशों पर लागू होगा। लेकिन सच यही है कि पाकिस्तान और अफगानिस्तान से शायद ही कोई मुस्लिम भारत में नागरिक बनने के लिए आता हो। अगर अफगानिस्तान के कुछ लोग आते भी हैं तो उसके पीछे दोनों देशों के बीच सालों-साल से स्थापित ऐतिहासिक एकता और सौहार्द प्रमुख कारण रहा है। लेकिन यह बिल उसे भी खत्म कर देगा। इस मामले में सबसे ज्यादा फोकस बांग्लादेश पर होगा। वह बांग्लादेश जिसको बनवाने में भारत की अहम भूमिका रही है और अच्छे-बुरे हर मौके पर वह भारत का साथ देता रहा है। लेकिन अब इस विधेयक के जरिये हम उसे भी अपने से दूर कर देंगे।

जबकि सच्चाई यह है कि वहां से आने वाले घुसपैठियों की समस्या फिर भी हल नहीं होने जा रही है। क्योंकि उसके सबसे बड़े प्रभावित इलाके में सरकार ने छूट दे दी है।

तब फिर आखिर हासिल क्या करना चाहती है इस बिल के जरिये सरकार? दरअसल केंद्र की बीजेपी सरकार आरएसएस के एजेंडे को आगे बढ़ा रही है। और देश में हिंदू-मुस्लिम विमर्श को बनाए रखना उसकी प्राथमिक शर्त और जरूरत दोनों है। क्योंकि विकास से लेकर वेलफेयर तक सारे मोर्चों पर वह फेल हो रही है। उसने कभी मंदिर-मस्जिद किया तो कभी गाय-गोबर, कभी कश्मीर तो कभी तीन तलाक। लेकिन इन सभी के निचुड़ने के बाद उसके पास बचा भी कुछ नहीं था। सांप्रदायिक विमर्श को जारी रखने के लिए उसे नये मुद्दों को तलाश थी। लिहाजा उसने अपने तर्कश से इसे बाहर कर दिया है।

लेकिन यह अब तक के तमाम मुद्दों से इसलिए अलग हो जाता है क्योंकि यह देश और संविधान की नींव पर चोट करता है। सैद्धांतिक तौर पर एक बार अगर यह स्वीकार कर लिया गया कि देश धर्म के आधार पर अपने नागरिकों के साथ भेदभाव करेगा तो फिर व्यवहार में ताकतवर धर्म के वर्चस्व का रास्ता साफ हो जाएगा। इसकी तार्किक परिणति नागरिकता के बराबरी के सिद्धांत की तिलांजलि के तौर पर होगी । और फिर आने वाले दिनों में अगर कोई हिंदू राष्ट्र की औपचारिक मान्यता की बात करने लगे तो किसी को अचरज नहीं होना चाहिए। प्रज्ञा ठाकुर से लेकर साक्षी महाराज जैसे भगवाधारियों की संख्या ऐसे ही नहीं सदन में बढ़ायी जा रही है। साथ ही गांधी और गोडसे का विमर्श भी सदन में खड़ा किया जाने लगा है।

यह बिल पूरी आजादी की विरासत को छिन्न-भिन्न कर देगा। इससे बड़े और उदात्त देश के तौर पर स्थापित भारत की छवि मटियामेट हो जाएगी। दुनिया के स्तर पर अब तक तमाम देशों की अगुआई करने वाला भारत एक पिद्दी देश में बदल जाएगा। और आखिर में यह गांधी की जगह गोडसे को पूजने के जरिये सावरकर के द्विराष्ट्र सिद्धांत पर आधिकारिक मुहर लगा देगा।  

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