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लाजवाब है प्रधानमंत्री जी का कॉन्फिडेंस

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दो बातों पर दाद हर किसी को देनी चाहिए। पहली, वो जबरदस्त भाषण देते हैं। दूसरा, वो कोई भी बात पूरे आत्मविश्वास के साथ कहते हैं।

एक बड़े नेता ने कभी “चतुर बनिया” वाली बात कही थी। उनकी इस बात पर खूब हल्ला मचा। इसलिए मैं जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल नही करूंगा। पर एक दूसरे बड़े नेता ने “गंजों को कंघे बेच डालने” की बात कही थी। खैर इसे भी छोड़िये।

ऐसा ही कुछ प्रधानमंत्री ने न्यूयॉर्क में ब्लूमबर्ग ग्लोबल बिजनेस फोरम में कही। वो भी घाघ इन्वेस्टर्स के बीच। उन्होंने प्रधानमंत्री की बात को कैसे लिया होगा, कौन जाने?

मोदीजी ने ग्लोबल इनवेस्टर्स से कहा, “भारत के फलते-फूलते रियल्टी बाजार में पैसा लगाओ”। जब मोदीजी ने ये बात पूरे कॉन्फिडेंस से कह ही दी है; तब दो-तीन बातें ही बच जाती हैं।

■ एक, या तो वो देश के रियल्टी सेक्टर की बेहाली से बेखबर हैं।

■ या; दूसरा, वो समझते हैं कि उनका कॉन्फिडेंस, निवेशकों के दिमाग पर जादू बनकर छा जाएगा, और वो अपनी आंखों पर पट्टी बांध डूबते बाजार में पैसा लगाने दौड़ेगा।

■ या फिर तीसरा, मोदी जी ने रियल्टी सेक्टर को उभारने और फिर तेजी से आगे बढ़ाने की योजना तैयार कर ली है।

पर हकीकत क्या है?

■ रियल्टी कंसल्टेंट नाइट फ्रैंक इंडिया की जुलाई 2019 की रिपोर्ट बताती है, देश के 8 मेट्रो शहरों में 4,50,263 घर अनसोल्ड हैं। माने बिल्डर घर बनाये बैठा है, पर खरीदार फटकता नहीं।

■ ये रिपोर्ट कहती है कि सबसे ज्यादा अनसोल्ड घर मुंबई में हैं। यहां 1,36,525 घर अनबिके हैं।

■ एनसीआर में अनसोल्ड घरों की संख्या 1.30 लाख है।

■बेंगलुरु में 85,387 घर अनसोल्ड हैं।

16 अगस्त की इकॉनॉमिक टाइम्स ने रेटिंग एजेंसी ICRA के हवाले से एक रिपोर्ट छापी। इस रिपोर्ट में लग्जरी रेसिडेंशियल रियल एस्टेट की खराब हालत का जिक्र है।

■ रिपोर्ट के मुताबिक इस साल जून में लग्जरी रेसिडेंशियल रियल एस्टेट में अनसोल्ड इन्वेंटरी 52% से 54% के बीच है।

मतलब बिल्डर ने 100 घर बनाये, पर 52-54 घर बिके ही नहीं।

नोट करें, ये लग्जरी रेसिडेंशियल प्रोजेक्ट की बात हो रही है।

ये सब एक दिन में नहीं हुआ।

2014 के बाद रियल्टी सेक्टर में जो सुस्ती आयी, वो 2016 में बीमारी बन गयी।

पहले नोटबंदी, फिर जीएसटी ने बुनियाद हिलायी। रेरा के इम्प्लीमेंटेशन का भी असर पड़ा। इस बीमारी को बढ़ाया एनबीएफसी क्राइसिस ने। और आग में घी डाला, सुस्ती की ख़बरों ने।

हालत ये है कि डेवलपर पैसे की तंगी से जूझ रहे हैं। मंदी से घबराया ग्राहक भी अपना पैसा कहीं फंसाने से बच रहा है।

सोचिये, घरों की कीमत 2013 के स्तर पर हैं। होम लोन भी सस्ता है। इन्वेंटरी भी है। पर खरीदार नहीं है।

पर प्रधानमंत्री जी का कॉन्फिडेंस लाजवाब है।

कोई है, जो बतायेगा कि आखिर ये क्यों हो रहा है। और तीन चार साल में इस संकट से निपटने के लिए क्या किया गया?

(जितेंद्र भट्ट इलेक्ट्रानिक मीडिया से जुड़े हुए हैं और आजकल एक प्रतिष्ठित न्यूज़ चैनल में कार्यरत हैं।)

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