Saturday, May 28, 2022

हिंदू राष्ट्रवाद पर आयोजित अमेरिकी सम्मेलन के वक्ताओं को जान से मारने की धमकियां

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नई दिल्ली। अमेरिका में हिंदू राष्ट्रवाद पर होने वाले एक अकादमिक सम्मेलन को दक्षिणपंथियों ने अपने हमले का निशाना बनाया हुआ है। इन समूहों से जुड़े लोग सम्मेलन में भागीदारी करने वालों को लगातार जान से मारने की धमकी दे रहे हैं जिसके चलते कुछ भागीदारों ने अपने नाम भी वापस ले लिए हैं। बहरहाल इन तमाम धमकियों के बावजूद सम्मेलन आज से शुरू हो रहा है और उसमें भारत से महिला एक्टिविस्ट और सीपीआई एमएल की नेता कविता कृष्णन तथा एक्टिविस्ट और बुद्धिजीवी भंवर मघेवंशी हिस्सा ले रहे हैं।

सम्मेलन का नाम ‘वैश्विक हिंदुत्व का ध्वीस्तीकरण’ है। और इसे हार्वर्ड, स्टैनफोर्ड, प्रिंस्टन, कोलंबिया, बर्कले, शिकागो, पेन्निसेलवेनिया समेत 53 विश्वविद्यालयों ने मिलकर आय़ोजित किया है। आयोजन उस समय हमले का निशाना बना जब भारत और अमेरिका के कुछ समूहों ने इसे भारत विरोधी करार देना शुरू किया।

आज से शुरू होने वाले इस सम्मेलन का लक्ष्य हिंदुत्व पर बहस के लिए कुछ विद्वानों को एक साथ लाना है। क्योंकि हिंदू राष्ट्र में विश्वास करने वाले आरएसएस और मौजूदा सत्ता में शामिल बीजेपी का मानना है कि भारत को एक हिंदू राष्ट्र होना चाहिए न कि सेकुलर राष्ट्र।

और देश के मौजूदा प्रधानमंत्री मोदी ने इसी एजेंडे को आगे बढ़ाया है। जिसके चलते भारत के तकरीबन 20 करोड़ मुसलमानों को भेदभाव और हमले का सामना करना पड़ रहा है।

सम्मेलन के आयोजनकर्ताओं ने बताया कि हाल के दिनों में दक्षिणपंथ से जुड़े अराजक तत्वों ने सम्मेलन में बोलने वालों पर हमले को गोलबंद किया है। जिसमें उन्होंने हिंदुत्व की विचारधारा पर बातचीत को हिंदू पर हमले के तौर पर पेश किया है।

एक बयान में आयोजनकर्ताओं ने बताया है कि कार्यक्रम के प्रायोजक विश्वविद्यालयों पर इन अराजक तत्वों द्वारा सम्मेलन को रद्द करने के लिए लगातार दबाव डाला गया है। साथ ही उन्होंने इसके घातक परिणाम की धमकी दी है।

जिसका नतीजा यह हुआ है कि सम्मेलन में भाग लेने वाले बहुत सारे लोग पीछे हट गए हैं। क्योंकि उनको इस बात की आशंका है कि अगर वह इसमें हिस्सा लेते हैं तो देश वापस लौटने पर उन पर पाबंदी लगायी जा सकती है। या फिर हवाई अड्डे पर उतरने पर ही उन्हें गिरफ्तार किया जा सकता है। सम्मेलन में शामिल होने वाले दर्जनों वक्ताओं के परिवार के सदस्यों के खिलाफ हिंसक धमकियां दी गयी हैं। एक वक्ता मीना कंडास्वामी ने अपने बच्चे की एक फोटो दिखाया जिसको सोशल मीडिया पर डालने के बाद धमकी देने वाले ने लिखा है कि “तुम्हारा बेटा बेरहम मौत मारा जाएगा।” इसके साथ ही उन्हें जातीय गालियां दी गयी हैं। दूसरे बौद्धिकों को लगातार मिलने वाली धमकियों के चलते पुलिस में शिकायत दर्ज करानी पड़ी है।

सम्मेलन के आयोजन में शामिल विश्वविद्यालयों के अध्यक्षों, प्रोवोस्ट और कर्मचारियों को तकरीबन 10 लाख से ज्यादा ईमेल प्राप्त हुए हैं जिसमें उन पर सम्मेलन को रद्द करने का दबाव डाला गया है। या फिर उससे बाहर होने की मांग की गयी है। इनमें भारत और अमेरिका में शामिल तमाम वे समूह हैं जो इन दक्षिणपंथी संगठनों से जुड़े हुए हैं। न्यू जर्सी में स्थित ड्रियू विश्वविद्यालय को कुछ ही मिनटों में 30,000 ईमेल हासिल हुए जिसके चलते विश्वविद्यालय का सर्वर क्रैश हो गया।

सम्मेलन के एक आयोजक ने अपने बयान में कहा है कि हम इस बात को लेकर बेदह चिंतित हैं कि ये सारे झूठों को मिलाकर उन लोगों को बदनाम करने की कोशिश की जाएगी जो सम्मेलन में बोलेंगे। या फिर इससे भी बुरा यह होगा कि उन्हें शारीरिक तौर पर चोट पहुंचाने की कोशिश की जाएगी। यहां तक कि उनके आयोजकों की हत्या भी की जा सकती है। “इन धमकियों के अलग-अलग रूप होने के चलते पिछले दो-तीन दिनों में ढेर सारे बोलने वालों ने सम्मेलन से अपना नाम वापस ले लिया है।”

सम्मेलन के आयोजकों में से एक सांटा क्लारा विश्वविद्यालय के एसोसिएट प्रोफेसर रोहित चोपड़ा ने कहा कि नफरत का स्तर बढ़ता जा रहा है। उन्होंने कहा कि आयोजक और वक्ताओं को जान से मारने की धमकी, यौन हिंसा और उनके परिवारों को धमकियां मिल रही हैं। महिला भागीदारों को महिला संबंधी भद्दी-भद्दी गालियां दी जा रही हैं। जबकि सम्मेलन में शामिल धार्मिक अल्पसंख्यकों को जातीय और सांप्रदायिक गालियों से नवाजा जा रहा है।

चोपड़ा ने बताया कि उन्हें ढेर सारे ऐसे ईमेल मिले हैं जिनमें उन्हें हिंदुओं से गद्दारी करने की बात कही गयी है। ये ईमेल हैं या फिर उन्हें सोशल मीडिया पर डाला गया है सभी में आने वाले संदेशों में सम्मेलन में शामिल लोगों को आतंकी, हिंदुओं से घृणा करने वाले, हिंदूफोबिक, भारत विरोधी आदि तरह-तरह के संबोधन से नवाजा गया है।

आयोजकों को भेजे गए एक ई-मेल में कहा गया है कि “अगर यह कार्यक्रम होता है तो मैं ओसामा बिन लादेन बन जाऊंगा और सभी वक्ताओं को मार डालूंगा, इसलिए मुझे जिम्मेदार मत ठहराइएगा”।  

प्रिंस्टन विश्वविद्यालय में दक्षिण एशियाई अध्ययन के निदेशक बेन बेयर ने कहा कि हम लोगों में से कुछ जिन्होंने भारत में पढ़ाई की है और वास्तव में वहां कुछ सालों तक रहे हैं वे अच्छी तरह से जानते हैं कि ये सब दावे बिल्कुल झूठे हैं। यहां तक कि ये दुर्भावनापूर्ण रूप से भ्रामक भी हैं।

सम्मेलन को लेकर भारत के टीवी चैनलों ने भी बहस शुरू कर दी है। इसमें कहा जा रहा है कि सम्मेलन की फंडिंग सीआईए, विदेशी सरकारें और जार्ज सोरोस ने की है। इसके साथ ही उनका कहना है कि इसे तालिबान को समर्थन के लिए तैयार किया गया है।

सम्मेलन के खिलाफ अभियान चलाने वाले संगठनों में हिंदू जनजागृति समिति एक भारतीय संगठन है जिस पर बुद्धिजीवियों और पत्रकारों की हत्या का आरोप है। इसके साथ ही अमेरिका में स्थित दक्षिणपंथी समूह हिंदू अमेरिकन फाउंडेशन और उत्तर-अमेरिका के हिंदुओं का समूह शामिल है।

इस सप्ताह अमेरिका में स्थित आरएसएस के सहोदर संगठन हिंदू स्वयंसेवक संघ ने सम्मेलन में शामिल सभी विश्वविद्यालयों से अपना हाथ खींचने की अपील की थी। उन्होंने इस ऑनलाइन कार्यक्रम पर गहरी चिंता जाहिर की थी। उन्होंने कहा था कि वे इस तरह के किसी भी आयोजन की तीखी आलोचना करते हैं जो हिंदूफोबिया फैलाने का काम करते हैं और ऊपर से हिंदुओं के प्रति नफरत पैदा करते हैं। और इसके साथ ही पश्चिम में हिंदुओं के खिलाफ हिंसा की आशंका को बल देते हैं।

हिंदू जागृति समिति ने भारत के गृहमंत्री को पत्र लिखकर आयोजन में शामिल होने वाले लोगों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है। यहां तक कि जो सम्मेलन में शामिल नहीं हैं उनको भी हिंसक धमकियां मिल रही हैं। ऑड्रे ट्रस्के जो रुटगर्स विश्वविद्यालय में दक्षिण एशियाई इतिहास की प्रोफेसर हैं और उनका मुगल इतिहास पर काम है, उन्हें भी दक्षिणपंथी हिंदुओं ने अपने हमले का निशाना बनाया है। जिसके बाद उन्होंने पुलिस में शिकायत की है। खासकर उन्हें एक वायस मेल मिला है जिसमें उनको धमकियां दी गयी हैं।

पिछले सप्ताह पूरी दुनिया में 900 से ज्यादा अकैडमीशियन और 50 से ज्यादा संगठनों ने जो दक्षिण एशिया से जुड़े हुए हैं, सम्मेलन के समर्थन में सामूहिक बयान जारी किया था। चोपड़ा का कहना था कि दक्षिणपंथी हिंदू संगठनों की धमकियों और विद्वानों को दबाने के चलते कोई भी हिंदुत्व को विश्लेषित करने की हिम्मत नहीं कर पाता।

उन्होंने कहा कि यह अकादमिक स्वतंत्रता का विषय है। जिसमें हिंदुत्व के बारे में बौद्धिक बातचीत के लिए कोई जगह नहीं है या फिर उससे जुड़ा कोई भी विषय हिंसा, बहुसंख्यकवाद और फासीवादी विचारधारा का मसला बन जाता है।

(द गार्डियन की रिपोर्ट के आधार पर।)

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