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रिबेरो को दिए जवाब में पुलिस कमिश्नर की लीपा-पोती, कहा- दिल्ली पुलिस के खिलाफ बुना जा रहा है भ्रम का जाल

जेएनयू के छात्र, उमर खालिद को गिरफ्तार करके जब अदालत में पेश किया गया तो, पुलिस ने पुलिस कस्टडी रिमांड पर उमर खालिद को, दस दिनों के लिये मांगा। अदालत विवेचक से यह भी जानना चाहती थी कि इतने दिनों के रिमांड की ज़रूरत क्यों है। पुलिस ने रिमांड के कारण बताए और यह कहा कि उनके पास अभियुक्त के खिलाफ 10 लाख पन्नों की चार्जशीट है, यानी लंबी पूछताछ करनी पड़ेगी। अमूमन दिल्ली की अदालतें, पुलिस कस्टडी रिमांड आसानी से दे भी देती हैं, जबकि उत्तर प्रदेश में यह रिमांड आसानी से नहीं मिलती है। अब उमर खालिद, दस दिनों के पुलिस कस्टडी रिमांड पर हैं और उनसे दिल्ली पुलिस क्या पूछताछ करती है, यह तो बाद में ही ज्ञात होगा। 10 लाख पन्नों की चार्जशीट, शायद ही कभी किसी क्रिमिनल केस में अब तक सामने आयी हो।

इन्हीं दंगों में सीपीएम के महासचिव सीताराम येचुरी, दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डॉ अपूर्वानन्द, पूर्व आईएएस अफसर हर्ष मंदर जैसे कुछ अन्य सामाजिक कार्यकर्ता जिनका कभी किसी आपराधिक कृत्य से लेना देना भी नहीं रहा है, के नाम भी दंगे भड़काने वालों में, अगर मीडिया की खबरों पर यकीन करें तो सामने आ रहे हैं। यह सब सरकार विरोधी दृष्टिकोण के लोग हैं और नागरिकता संशोधन कानून 2019 के विरोधी हैं। अगर सरकार के किसी भी कदम का शांतिपूर्ण प्रतिरोध और विरोध करना धरना, प्रदर्शन और ज्ञापन देना भी साम्प्रदायिक दंगे फैलाने जैसे कृत्य के समकक्ष माना जाने लगे तो, संविधान के मौलिक अधिकारों का कोई अर्थ भी नहीं रह जायेगा।

इसी बीच, जुलियो रिबेरो की दिल्ली पुलिस कमिश्नर को दिल्ली दंगों के बारे में लिखी चिट्ठी और फिर इसी के समर्थन में, लिखी गयी 9 अन्य रिटायर्ड आईपीएस अफसरों के पत्र के बाद दिल्ली पुलिस के पुलिस कमिश्नर एसएन श्रीवास्तव का रिबेरो सर को दिया गया जवाब भी आज एक वेबसाइट पर आ गया है।

दिल्ली पुलिस के सीपी ने जुलियो रिबेरो को उनके पत्र के संदर्भ में सूचित करते हुए लिखा है कि, ” फरवरी में हुए उत्तर-पूर्वी दिल्ली के साम्प्रदायिक दंगों में कुल 751 एफआईआर दर्ज कराई गयीं थीं, जिनमें से 410 एफआईआर अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों द्वारा दर्ज कराई गयी हैं। यह मेरा कर्तव्य है कि मैं इन सभी दर्ज एफआईआर की विवेचना सदाशय और विधिनुकूल ढंग से पूरा कराऊँ।”

आगे वे लिखते हैं, ” दूसरे समुदाय ने लगभग 190 एफआईआर दर्ज कराई है। इसके अतिरिक्त शेष एफआईआर पुलिस ने अपनी तरफ से अपनी सूचना के अनुसार दर्ज कराए हैं। अब तक कुल 1,571 लोग बिना किसी धार्मिक और जातिगत पक्षपात के दिल्ली पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए जा चुके हैं। लगभग सभी गिरफ्तार लोग गम्भीर अपराधों के अभियुक्त हैं जिन्हें अदालत ने ज्यूडिशियल या पुलिस रिमांड पर या तो जेल भेजा है या पूछताछ के लिये पुलिस अभिरक्षा में दिया है। इनमें से बहुतों की अभी जमानतें भी नहीं हुई हैं। बहुत से दर्ज मुकदमों में आरोपपत्र (चार्जशीट ) अदालतों में दाखिल की जा चुकी हैं और अन्य कुछ मामलों में अभी विवेचना चल रही है।”

जुलियो रिबेरो ने अपने पत्र में क्रिमिनल इंवेस्टिगेशन, आपराधिक विवेचना के सिद्धांत पर तफ्तीश करने की बात कही थी। इस पर दिल्ली के पुलिस आयुक्त का कहना है कि, ” यह एक तयशुदा सिद्धांत है कि कोई भी निष्कर्ष उन तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर ही निकाला जा सकता है, जो विवेचना के दौरान सामने आ रहे हैं।”

लेकिन पुलिस कमिश्नर ने उन मुकदमों का विवरण यह कह कर नहीं दिया कि

” यह सब आरोपपत्र में है और आरोपपत्र पर अदालत ही कार्यवाही करने में सक्षम है, अतः उसे इस पत्र में उल्लेख करना उचित नहीं होगा।”

पुलिस आयुक्त दिल्ली की यह बात विधिनुकूल है कि आरोप पत्र के तथ्य और साक्ष्य पर सार्वजनिक चर्चा जब तक अदालत उस पर संज्ञान न ले ले, नहीं किया जाना चाहिए।

आगे श्रीवास्तव लिखते हैं कि, ” आप ने दिल्ली दंगों की विवेचनाओं की निष्पक्षता पर सन्देह व्यक्त किया है और इस बारे में मेरी आप से फोन पर बात भी हुई थी। आप ने भी यह स्वीकार किया कि आप के पास इन विवेचनाओं के संदर्भ में कोई फर्स्ट हैंड इन्फॉर्मेशन, प्रमाणित सूचना या जानकारी नहीं है। मुझे अफसोस है कि दिल्ली पुलिस का कोई अफसर आप को दंगों और इनकी विवेचनाओं के बारे में कुछ तथ्यों से अवगत भी नहीं करा सका। एक अत्यंत अनुभवी पुलिस अधिकारी होने के कारण आप इस बात से सहमत होंगे कि कोई भी केवल पब्लिक डोमेन में उपलब्ध सीमित सूचनाओं के कारण, किसी भी घटना के बारे में उचित निष्कर्ष पर नही पहुंच सकता है।”

आगे पुलिस आयुक्त ने लिखते हैं, ” ऐसे बहुत से लोग हैं जो अपने-अपने दृष्टिकोण से अपने पूर्वाग्रहों द्वारा भ्रम का एक जाल पुलिस के खिलाफ कोई न कोई मिथ्या नैरेटिव गढ़ने के लिये बुनते रहते हैं। ”

आगे वे लिखते हैं, ” अत: यही उचित होगा कि क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम को अपने तंत्र में व्याप्त विधिक चेक और बैलेंसेस के द्वारा काम करने दिया जाए। अनजाने में किसी का भी नाम उभार देना मनगढ़ंत और प्रेरक कहानियों को विश्वसनीयता और प्रामाणिकता का मिथ्या आवरण प्रदान करना है। “

दिल्ली पुलिस कमिश्नर आगे कहते हैं, ” आपराधिक मामलों में पुलिस की जांच तथ्यों और साक्ष्यों पर आधारित होती है, न कि किसी की प्रतिष्ठा और हैसियत द्वारा। इसके अतिरिक्त विवेचना से असंतुष्ट किसी भी व्यक्ति के लिये न्यायिक उपचार का विकल्प तो है ही। ”

जुलियो रिबेरो तथा अन्य और दिल्ली के सीपी सभी एक अनुभवी अधिकारी हैं और पुलिस को किन-किन परिस्थितियों में कब-कब काम करना पड़ता है इन सबसे भलीभांति परिचित हैं। दिल्ली पुलिस आयुक्त के इस आश्वासन के बाद भी कि विवेचनायें साक्ष्य और तथ्यों के ही आधार पर होंगी हो सकता है लोगों को अब भी कहीं न कहीं निष्पक्ष विवेचना पर संदेह हो। यहीं यह सवाल उठता है पुलिस की साख का और पुलिस के विधिनुकूल दृष्टिकोण का। साख का यह संकट केवल दिल्ली पुलिस के ही सामने नहीं है बल्कि यह संकट गांव के एक छोटे से थाने से लेकर देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी एनआईए और सीबीआई तक संक्रमण की तरह व्याप्त है। इसका समाधान कैसे और कब तक होगा फिलहाल तो इस पर कुछ नहीं कहा जा सकता है। उम्मीद है दिल्ली पुलिस अपने आयुक्त के दृष्टिकोण के अनुसार, विधिनुकूल तफ्तीशें पूरी करेगी।

( विजय शंकर सिंह रिटायर्ड पुलिस अफसर हैं और आजकल कानपुर में रहते हैं।)

This post was last modified on September 16, 2020 2:23 pm

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