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विशेष रिपोर्ट: भावनाओं के ग़ुबार, असीम पीड़ा और गहरी मानवीय संवेदनाओं के गवाह बन रहे हैं अमेरिकी अस्पतालों के इमरजेंसी वार्ड

न्यूजर्सी (अमेरिका)। पूरे अमेरिका में कोरोना संक्रमित लोगों की संख्या दस लाख के पार पहुँच चुकी है। देश भर में 63 हज़ार से अधिक मौतें हो चुकी हैं। मृतकों की सर्वाधिक संख्या न्यूयॉर्क प्रदेश में है।

न्यूयॉर्क शहर में कोरोना संक्रमित मृतकों की संख्या इतनी ज्यादा है कि उन्हें किराये के शीतक ट्रकों में संग्रहित करना भी मुश्किल हो रहा है। न्यूयॉर्क महानगर प्रशासन की अनुमति से लाशें ढोने के लिए 45  ट्रकों को अनुमति दी गयी थी। जब मृतकों की संख्या हज़ारों में पहुँच जाए तो उन्हें सम्मान पूर्वक अंतिम संस्कार करना एक समस्या बन सकती है।

28 अप्रैल को न्यूयॉर्क का ब्रूकलिन उपनगर: युटिका एवेन्यू स्थित एक फ्यूनरल होम (अंतिम संस्कार केंद्र) के बाहर खड़े ट्रकों से भयंकर दुर्गन्ध आने की शिकायत वहां के निवासियों ने पुलिस से की। पुलिस ने पाया-मृतकों के शव जिन ट्रकों में रखे गए थे , उनकी एयर कंडीशनिंग मशीन बिगड़ जाने के कारण सड़ रहे शवों की दुर्गन्ध स्थानीय निवासियों के लिए असहनीय बन गयी। दर्जनों लाशें सड़ रही थीं। ये सभी कोरोना पीड़ित थे।

मौत के आग़ोश में जाने के पूर्व अधिकांश मरीज़ इमरजेंसी वार्ड के वेंटिलेटर से गुज़रते हैं, जहाँ उनकी देख भाल इमरजेंसी वार्ड में तैनात नर्स और डॉक्टर करते हैं। इमरजेंसी वार्ड के इन कर्मचारियों को निरंतर न सिर्फ़ कोरोना के संक्रमण के ख़तरे झेलने पड़ते हैं, वरन गम्भीर रूप से संक्रमित मरीज़ों के हालात से भी गुज़रना पड़ता है जो कि आसान नहीं। कल्पना कीजिए, आप उस अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में कार्यरत डॉक्टर या कोई अन्य स्वास्थ्यकर्मचारी हैं।

दिन भर में वार्ड में सैकड़ों कोरोना पीड़ित मरीज़ इलाज के लिए लाये जाते हैं, उन्हें कई दिनों तक इलाज के बाद वेंटिलेटर पर रखा जाता है, जहाँ से वापस जीवित लौट पाना शायद आसान नहीं। वेंटिलेटर पर जाने वाले मरीज़ों को श्वास नली लगाने की नौबत आये, तो समझिए उसका स्वस्थ हो पाना कठिन है। ऐसी अवस्था में नर्स मरीज़ से कह देती है कि अपने घर वालों से फ़ोन से बात कर लें, क्योंकि श्वास नली लगाने के बाद अपने परिजनों से बात करना मुश्किल होगा। इन मरीज़ों के वेंटिलेटर की नालियाँ असंख्य वायरस हवा में छोड़ती रहती हैं ।

मौत से जूझ रहे इन मरीज़ों के पास उनके घर वाले, उनके परिजनों को जाने की इजाज़त नहीं। वे सिर्फ़ वट्सअप्प या फ़ेस टाइम से ही एक दूसरे से बातचीत कर सकते हैं। कोरोना पीड़ितों की देखभाल कर रही नर्सों की संवेदना टूटने की कगार पर पहुँच चुकी होती है, जब वे उन मरीज़ों की आँखों से आँखें मिलाने में अपने आप को असमर्थ पाती हैं । इमरजेंसी वार्ड में जब एक मरीज़ जीवन-मृत्यु के बीच झूल रहा होता है, वह किसी इन्सान के कंधे पर सर रखना चाहता है। लेकिन उस इन्सान के पास इमरजेंसी वार्ड के कर्मचारी, वहां कार्यरत नर्स या डॉक्टर के सिवा कोई नहीं होता।

ऊपर से कोरोना मरीज़ के कमरे में अस्पताल कर्मी संक्रमण के डर से ज्यादा देर तक नहीं ठहर सकते। स्वास्थ्य कर्मचारियों को कक्ष से ज़रूरी कार्य निपटा कर जितनी जल्दी हो सके, बाहर निकल जाना पड़ता है। इमरजेंसी वार्ड  में कार्यरत कर्मचारी-नर्स और डॉक्टरों की मानसिक स्थिति की झलक उन्हीं के शब्दों में न्यूयॉर्क टाइम्स में प्रकाशित हुई।

एक नर्स कहती है, ”सामान्य तौर पर मैं मरीज़ों से पूछती हूँ-आप कहाँ से हैं, आप के परिवार में कौन कौन हैं? संक्रमित मरीज़ों के साथ इस प्रकार के संवाद सम्भव नहीं! मरीज़ों के चेहरे पर भय साफ तौर पर देखा जा सकता है। वे चाहते हैं कोई उन्हें ढांढस दे, उनके  पास बैठे । ज़्यादा देर वहाँ ठहरना बहुत बड़ा ख़तरा उठाना है, संक्रमण का ।”

“बारह वर्षों से नर्स के रूप में कार्य करने के बाद अपने मरीज़ को अकेला देखना, उसे अकेले मरते हुए देखना बहुत कष्टकर है। ये मरीज़ सचमुच बहुत अकेले हैं, उनके पास नर्सों और वार्ड के अन्य कर्मचारियों के सिवा कोई नहीं ।” “मरीज़ों का हाल देख कर मेरा एक सहकर्मी रो पड़ा। उसे रोता देख मैं भी रो पड़ी। मुझे रोती देख एक और सहकर्मी भी रो पड़ी। हम सभी अपने मास्क के अंदर रो रहे थे…” एक अन्य नर्स कहती है, “इन मरीज़ों को देख पाना कितना मुश्किल है। कई तो बहुत ही अकेले हैं, उनके परिवार नहीं हैं, उनकी आँखों में घबराहट देखी जा सकती है, जैसे पूछ रहे हों-क्या मैं मर जाऊँगा/जाऊँगी?”

न्यूयॉर्क-प्रेस्बिटेरियन एलेन अस्पताल की इमरजेंसी विभाग की मेडिकल डायरेक्टर डॉ. लोर्ना ब्रीन उन्हीं कर्मचारियों में से एक थीं। 49 वर्षीय लोर्ना इमरजेंसी रूम में हफ्तों से कार्य कर रही थीं…रोज मरीज़ों को ईलाज के लिए वार्ड में लेती, और उनके अंत समय तक साथ रहती थीं। आखिर उसे संक्रमण हो ही गया।” लोर्ना को क्वारंटाइन में हफ्तों रहना पड़ा, जिसके बाद वह स्वस्थ हो गयी। लेकिन स्वस्थ होते ही फिर से इमरजेंसी वार्ड में काम करने चली गयी। बीमार मरीज़ों को मौत के मुँह में जाते देखना उसके मानस पर भारी बोझ बनता जा रहा था। इस बोझ को सहना मुश्किल हो गया- अंततः उसने आत्म हत्या कर ली।

मरीज़ों को जीवन से मौत की तरफ जाते देखना शायद लोर्ना के लिए संभव नहीं हो सका। उसे संक्रमण हुआ और वह स्वस्थ होने के लिए अपने घर चली गयी। लेकिन लोर्ना जब अपने घर बीमारी से उबर रही थी, इमरजेंसी वार्ड के दृश्य उसका पीछा नहीं छोड़ रहे थे। स्वस्थ होकर वह वापस मरीज़ों की सेवा करने अस्पताल आ गयी, लेकिन इस बार वह मरीज़ों का दर्द सहन न कर सकी। वह निरंतर मरीज़ों की सेवा करती रही-दिन, रात! उसे चैन नहीं था- कोरोना पीड़ितों के दर्द में सहभागी बन कर वह स्वयं को जैसे सजा देर ही हो…..आख़िरकार इमरजेंसी वार्ड के हालात उस पर हावी हो गए और लोर्ना अपनी ही जान की दुश्मन बन गयी। न्यू यॉर्क-प्रेस्बिटेरियन एलेन अस्पताल की इमरजेंसी विभाग की मेडिकल डायरेक्टर डॉ. लोर्ना ब्रीन अस्वस्थता के कारण अपने परिवार के साथ रहने शर्लॉट्सविल्ल, वर्जीनिया, चली गयी थीं जहाँ अप्रैल के अंतिम रविवार को इस दुनिया से चल बसी। उसने आत्महत्या कर ली थी।

पुलिस ने उसकी मौत का कारण ‘खुद को लगी चोट’, यानी ‘सेल्फ इन्फ़्लिक्टेड इंजरीज’ बताया। पिछले डेढ़ सौ वर्षों से डॉक्टरों की आत्म हत्या के बारे में जानकारी उपलब्ध है। सन 1977 में यह अन्दाज़ा लगाया गया था कि अमेरिका में प्रति वर्ष तीन चार सौ डॉक्टर यानी प्रतिदिन एक डॉक्टर आत्म हत्या कर लेता है। चूँकि डॉक्टर कैन्सर या दिल की बीमारी के बारे में जागरूक होते हैं, सावधानियाँ बरत लेते हैं, लेकिन मेडिकल छात्रों में आत्महत्या से मौत सामान्य बात है। कितना बड़ा दुर्भाग्य है?

अमरीका में कोरोना से संक्रमण के छह हफ्ते गुजर जाने के बाद आज भी जांच यानी टेस्टिंग के पर्याप्त अवसर उपलब्ध नहीं हैं। यदि आप इस बात का पता लगाना चाहें कि आप संक्रमित हैं या नहीं तो सबसे पहले अपने फैमिली फ़िज़िशियन को संपर्क करना होगा जो कि आपसे कुछ प्रश्न पूछेगा संक्रमण के सम्बन्ध में, जिसके बाद ही आपको जांच या टेस्टिंग के लिए समय या अपॉइंटमेंट मिल सकता है। कोरोना जांच के लिए अस्पताल, एम्बुलेंस, नर्सिंग होम आदि सेवाओं में लगे मेडिकल कर्मचारियों, आवश्यक सेवा, ग्रोसरी (घरेलू खाद्य सामग्री), खान पान की दुकानों, गैस स्टेशनों (पेट्रोलपंप), औषधि दुकान (फार्मेसी) के कर्मचारी, पुलिस बल, नगरपालिका, ट्रेन सेवा से सम्बद्ध कर्मचारियों को प्राथमिकता मिल रही है ।

उनकी जाँच के बाद ही सामान्य नागरिकों को टेस्टिंग या जांच का अवसर मिल सकेगा। अधिक मौतों के बाद कोरोना संक्रमण से लड़ने के लिए संगठित तरीक़े दिखाई पड़ने लगे हैं: महानगर लॉस ऐंजेलेस में सभी नागरिकों की टेस्टिंग (कोरोना संक्रमणके लिए) की व्यवस्था की जा रही है। न्यूयॉर्क प्रदेश में सभी औषधि दुक़ानों, डॉक्टर क्लीनिक संक्रमण की जाँच के लिए तैयार किए जा रहे हैं। लेकिन ज़रा ठहरिए, अनेक प्रदेशों में ‘लॉक डाउन’ के आदेश वहाँ के नागरिकों की निजी स्वतंत्रता पर प्रहार के रूप में भी देखे जा रहे हैं, कुछ लोग नियंत्रण और परहेज़ के नियमों का उल्लंघन करने में अपनी विजय देख रहे हैं । लेकिन, क्या अमेरिका संक्रमण के दूसरे दौर के लिए तैयार है?

(लेखक अशोक ओझा अमेरिका के न्यू जर्सी में रहते हैं।)

This post was last modified on May 4, 2020 6:14 pm

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Janchowk Official Journalists in Delhi

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