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मोदी के खिलाफ़ पंजाब के किसानों का फूटा चौतरफा रोष, घेरा बादल का घर

आत्महत्या के कगार पर खड़े किसानों के लिए इसे एक बड़ी खुशखबरी कहा जा सकता है। कृषि सुधार के नाम पर मोदी सरकार की ओर से कृषि मंडीकरण से संबंधित जारी किए तीन अध्यादेशों, बिजली संशोधन बिल और पेट्रोल-डीज़ल की बढ़ती कीमतों के विरोध में सरकार के तमाम प्रतिबंधों के बावजूद देश के भूमिपुत्र सड़कों पर उतर आए हैं। भारतीय किसान यूनियन (राजेवाल) के आह्वान पर भारतीय किसान यूनियन (लक्खोवाल) और अन्य किसान संगठनों ने पंजाब भर में रोष प्रदर्शन किए हैं।

इनके अलावा अकाली दल स्वतंत्र, आम आदमी पार्टी, लोक इंसाफ़ पार्टी, दोआबा किसान समिति, पगड़ी संभाल जट्टा लहर, पंजाब किसान यूनियन एकता ने भी पंजाब के अलग-अलग हिस्सों में प्रधानमंत्री मोदी के पुतले फूँक कर धरना-प्रदर्शन किए। हजारों की तादाद में किसान ट्रैक्टर लेकर सड़कों पर उतर आए। राष्ट्रीय मीडिया में किसान आंदोलन की तमाम खबरें दबा दिये जाने के बावजूद सोशल मीडिया के माध्यम से यह खबरें आ रही हैं कि पंजाब के अलावा हरियाणा, राजस्थान, तमिलनाडु में भी किसान इन अध्यादेशों और पेट्रोल-डीज़ल की बढ़ती कीमतों के विरोध में बड़ी संख्या में सड़कों पर उतर आए हैं।

लाठीचार्ज में घायल किसान।

पंजाब के 13 किसान और मज़दूर संगठनों ने प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ़ ‘अर्थी-फूँक प्रदर्शन’ जारी रखते हुए 27 जुलाई को अकाली-भाजपा नेताओं के घरों का ट्रैक्टर-घेराओ करने का फैसला किया है।

भारतीय किसान यूनियन (राजेवाल) के अध्यक्ष से भाजपा पंजाब के अध्यक्ष ने फोन पर केंद्र सरकार से बातचीत करवाने का भी प्रस्ताव रखा था जिसे उन्होंने साफ शब्दों में अस्वीकार करते हुए कह दिया है कि उन्हें केंद्र की मोदी सरकार पर रत्ती भर भी यकीन नहीं है। केंद्र सरकार जब तक यह अध्यादेश वापस नहीं लेती उनका आंदोलन जारी रहेगा। कोविड-19 की आड़ में बेशक सरकार ने 144 धारा लागू की हुई है लेकिन किसान के हितों को ध्यान में रखते हुए भविष्य में वह अपना संघर्ष और तेज करेंगे, जेल भरो आंदोलन के साथ-साथ वह दिल्ली में केंद्र सरकार का भी घेराव करेंगे।

किसान अकाली नेता प्रकाश सिंह बादल के पुश्तैनी घर का घेराव करने भी गए। हालांकि प्रशासन ने बादल गाँव को पुलिस छावनी में बदल दिया था लेकिन सैकड़ों किसानों ने तमाम घेराबंदियों को तोड़कर अकाली नेता के घर को घेर कर सामने धरना दे दिया। इस पर पुलिस ने जमकर लाठी चार्ज किया जिससे कई किसान ज़ख्मी हो गए। जब किसान सड़कों पर उतर आए तो शिरोमणि अकाली दल के नेता सुखबीर सिंह बादल ने फेसबुक पर लाइव होकर यह भरोसा दिलाया कि न्यूनतम समर्थन मूल्य ख़त्म नहीं हो रहा है पर इन अध्यादेशों के भारतीय संघवाद विरोधी होने के बारे में चुप्पी साध गए।

बादल के गांव में किसान और पुलिस।

अध्यादेशों के जरिए मंडियों को राज्यों के नियंत्रण से बाहर निकालने और बड़ी कंपनियों की घुसपैठ में यह तथ्य निहित है कि केंद्र सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य पर गेंहू और धान की पूरी खरीद से अपने कदम पीछे हटा रही है। जमाखोरी को कानूनी संरक्षण देकर लूट को खुली छूट देने की भी मंशा इन अध्यादेशों में साफ दिखाई दे रही है।

पंजाबी ट्रिब्यून के संपादक स्वराजबीर का मानना है कि आम आदमी पार्टी ने किसान आंदोलन का समर्थन करके यह संकेत दिया है कि वह संघवाद और किसानों की मांगों के पक्ष में है लेकिन पार्टी की हाई कमान ने पिछले दिनों केंद्र के जम्मू-कश्मीर के फैसले समेत संघवाद के खिलाफ़ किए गए अनेक फ़ैसलों का समर्थन किया है। किसान आंदोलन को संघवाद और कृषि संकट को विमर्श के केंद्र में ले आने की स्वागत योग्य शुरुआत के तौर पर देखा जाना चाहिए।

‘अच्छे दिन आने वाले हैं’ जैसे चुनावी जुमलों को सच मान कर जिन किसानों ने अपना बहुमूल्य वोट डालकर नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाया, उनका दिल टूटा है, विश्वास टूटा है। वही किसान आज मोदी के खिलाफ़ उठ खड़े हुए हैं।

(वरिष्ठ पत्रकार देवेंद्र पाल की रिपोर्ट।)

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This post was last modified on July 22, 2020 7:24 am

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