Saturday, November 27, 2021

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कल हरियाणा के किसान करेंगे चक्का जाम

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नई दिल्ली। केंद्र सरकार के तीन कृषि बिलों के विरोध में हरियाणा और पंजाब के बड़े किसान आंदोलन की ज़मीन तैयार करते नज़र आ रहे हैं। भारतीय किसान यूनियन (चढूनी) की 10 सितंबर की पीपली रैली पर लाठीचार्ज ने आग में घी का काम किया है। पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल की पुत्रवधू हरसिमरत कौर बादल का केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफ़ा आंदोलन के दबाव का ही नतीज़ा रहा। कल शनिवार को बादल गाँव में एक किसान की शहादत ने किसानों के गुस्से को बढ़ा दिया है। भाकियू नेता गुरनाम सिंह चढूनी और अन्य विभिन्न संगठनों ने कल इतवार 20 सितंबर को हरियाणा में चक्का जाम करने का ऐलान कर रखा है। किसान संगठन 25 सितंबर को भारत बंद की तैयारी भी कर रहे हैं।

कृषि अध्यादेशों के विरोध में वामपंथी किसान संगठन लगातार जागरूकता अभियान चला रहे हैं। दूसरी विपक्षी पार्टियां इस मुद्दे पर अमूमन चुप रही हैं। हरियाणा में भारतीय किसान यूनियन (चढूनी) की 10 सितंबर की पीपली रैली पर लाठीचार्ज ने अचानक माहौल में तुर्शी पैदा कर दी थी। सरदार गुरनाम सिंह चढूनी कुरुक्षेत्र जिले के चढूनी गाँव के रहने वाले हैं और उनके नेतृत्व वाली भाकियू जीटी रोड बेल्ट के कुरुक्षेत्र, करनाल, अंबाला, यमुनानगर वगैरह जिलों में ख़ासा असर रखती है।

चढूनी ने कृषि अध्यादेशों के विरोध में 10 सितंबर की पीपली (कुरुक्षेत्र) रैली का ऐलान किया था तो सरकार ने प्रदेश भर में नाके लगाकर किसानों को रोकने की कोशिश की थी। जगह-जगह नाकेबंदी तोड़कर और दमन सहते हुए किसानों ने पीपली रैली को सफल कर दिखाया था। लाठीचार्ज के दौरान पुलिस वर्दीधारियों के साथ सादी वर्दी वाले लाठीधारियों को लेकर भी सवाल खड़े हुए थे।

चढूनी का कहना है कि सादी वर्दी वाले लोगों से मोटे लट्ठों से किसानों के सिरों को निशाना बनाकर वार कराए गए। यह सब एक बड़ी साजिश के तहत किया गया। किसानों ने हौसला नहीं छोड़ा। आंदोलनकारी किसानों पर ही हत्या के प्रयास के मुकदमे दर्ज़ किए गए हैं पर हम मुकदमे वापस लेने की अपील नहीं करने जा रहे हैं। खेती-किसानी को बर्बाद करने के लिए लाए जा रहे अध्यादेशों की वापसी तक आंदोलन जारी रहेगा। 

असल में पीपली रैली लाठीचार्ज ने किसान आंदोलन के लिए ऑक्सीजन सिलेंडर जैसा काम किया है। पीपली रैली के बाद से चढूनी के प्रति उन इलाक़ों में भी समर्थन हैं जहाँ उनकी यूनियन का असर नहीं माना जाता है। हरियाणा के विभिन्न जिलों के साथ वे हरियाणा से लगते पंजाब के इलाक़ों में भी ताबड़तोड़ मीटिंगें कर रहे हैं। पंजाब में भी विभिन्न जिलों में इस मुद्दे पर किसानों के आंदोलन जारी हैं। आलम यह है कि पंजाब का ताक़तवर बादल परिवार इन आंदोलनों से इस कदर घिर गया कि हरसिमरत कौर को को केंद्रीय खाद्य प्रसंस्करण मंत्री पद से त्यागपत्र देना पड़ा।

हालत यह थी कि वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जन्मदिवस बीत जाने का इंतज़ार करने की स्थिति में भी नहीं थीं। कल शुक्रवार को पंजाब के अक्कावाली गांव के 60 साल के किसान प्रीतम सिंह ने बादल गाँव में ही तीनों अध्यादेशों के विरोध में चल रहे धरने पर ही जहर खा लिया था। बठिंडा हॉस्पिटल में उनकी मौत हो गई है तो किसान संगठनों ने उन्हें तीन कृषि अध्यादेशों के ख़िलाफ़ आंदोलन का पहला शहीद घोषित किया। 

 भाकियू (चढूनी) का दावा है कि कल 20 सितंबर के चक्का जाम में 17 संगठन शामिल होंगे। रविवार को रोहतक में चढूनी के कार्यक्रम में अखिल भारतीय किसान सभा के प्रतिनिधियों और आढ़ती यूनियन के लोगों ने भी हिस्सा लिया। माकपा के वरिष्ठ नेता कॉमरेड इंद्रजीत सिंह ने जनचौक से कहा कि वामपंथी किसान संगठन इस मसले पर पहले ही सक्रिय हैं और 25 सितंबर के भारत बंद की भी तैयारी की जा रही है। हरियाणा में कल के चक्का जाम को लेकर भी वामपंथी संगठनों का समर्थन है।

भाकियू (चढूनी) के असर वाले इलाक़ों के अलावा चौटाला परिवार के असर वाले सिरसा जिले में भी चक्का जाम का प्रभाव पड़ने की संभावना है। चढूनी ने शुक्रवार को सिरसा जिले में कई मीटिंगों को संबोधित किया और वे उप मुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला के असर वाले गांवों में भी गए। उन्होंने कहा कि बादल परिवार ने एनडीए का हिस्सा बनकर चुनाव लड़ा था पर उसे आंदोलन के दबाव में मंत्रालय छोड़ना पड़ा है।

दुष्यंत चौटाला ने भाजपा के विरोध में चुनाव लड़ा था और सरकार विरोधी वोट हासिल किए थे जिन्हें सरकार को ही बेच दिया गया। उन्होंने कहा कि दुष्यंत इस्तीफा नहीं देते हैं तो उनकी अपने गाँव तक में पूछ नहीं रह जाएगी। कांग्रेस, अभय चौटाला और कई विपक्षी संगठनों व नेताओं ने आंदोलन को समर्थन दिया है। चढूनी का कहना है कि यह पुराना ट्रेंड है कि जो विपक्ष में होता है, किसानों का हितैषी बन जाता है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष ओमप्रकाश धनखड़ विपक्ष में रहते हुए कपड़े निकालकर स्वामीनाथन आयोग लागू करने की मांग किया करते थे।

(जनचौक ब्यूरो की रिपोर्ट।) 

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