Friday, April 19, 2024

भारतीय राजनीति के आकाश के सूरज हैं गांधी

30 जनवरी 1948 के दिन भारतीय राजनीति में सबसे त्रासदी पूर्ण घटना घटित हुई। इसी दिन गांधी एक हत्यारे की गोली का शिकार हुए। गांधी ने भारतीय जन को जितना प्रभावित किया, शायद ही किसी और ने किया हो। गांधी की राजनीति के तौर तरीकों से असहमत तब भी थे और आज भी हैं, लेकिन बावजूद इसके, पूरे स्वतंत्रता आंदोलन में एक खास संगठन के अलावा अन्य किसी ने भी गांधी की नीयत पर शक नहीं किया।

यह संगठन कभी भारत के राष्ट्रपिता होने पर सवाल खड़ा करता है, तो कभी उनकी अहिंसा नीति पर ही सवाल खड़ा करता है। तो कभी वह इस गीत, “दे दी हमें आजादी बिना खड्ग बिना ढाल, साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल” को लेकर गांधी पर निशाना साधता है। क्या गांधी ने किसी से कहकर यह गीत लिखवाया था? भाई अगर किसी ने गांधी के प्रति श्रद्धाभाव में शब्दों की भावांजलि अर्पित की है, तो क्या इसके लिए भी गांधी दोषी हो गए?

भाजपा के एक प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी गांधी-नेहरू की जेलों को ऐशो आराम की जगहें बताकर उनका चरित्र हनन करते हैं। लेकिन उन्हीं नेहरू के साथ जेल में बंद पटेल पर वे कुछ नहीं कहते। यह दोमुंहापन है। अगर इन जेलों में इतनी ही ऐश होती थी, तो हिंदू महासभा के लोग भी आराम करने के लिए ही सही, जेल हो आते, कम से कम भावी पीढ़ी के सामने मुंह तो नहीं छुपाना पड़ता।

एक और आरोप कि लाला लाजपत राय के अलावा अन्य किसी कांग्रेसी ने लाठी नहीं खाई और न ही कोई कालापानी गया। कितनी धूर्तता के साथ ये लोग झूठ बोल जाते हैं। सबको पता है कि साइमन कमीशन के खिलाफ हुए आंदोलन में नेहरू सहित तमाम नेताओं पर लाठियां बरसी थीं। नेहरू को लाठियों से बचाने के लिए गोविंद वल्लभ पंत उनके ऊपर लेट गए। पंत इतने ज्यादा चोटिल हुए कि आजीवन उनकी गर्दन हिलती रही।

यही नहीं नेहरू की माताजी पर भी एक आंदोलन में लाठियां चलीं थीं। उनका सर फट गया था। धरासाना आंदोलन में तमाम कांग्रेसी बिना प्रतिकार किए सविनय अवज्ञा कर रहे थे और भीषण लाठीचार्ज के शिकार हुए। जिन शहादतों की बदौलत आज सत्ता का सुख भोगा जा रहा है, उन्हीं शहादातों का मजाक उड़ाना कृतघ्नता नहीं तो और क्या है?

यह विचारधारा गांधी के राष्ट्रपिता पर तो सवाल खड़ा करती है, लेकिन “राष्ट्रपति” शब्द पर इसे कोई आपत्ति नहीं। अगर “राष्ट्रपिता” शब्द अनुचित है, तो उन्हें “राष्ट्रपति” शब्द के खिलाफ भी मुहिम चलानी चाहिए। लेकिन नहीं, उन्हें तो गांधी को निशाना बनाना है! ताज्जुब है कि राष्ट्रपिता शब्द पर आपत्ति करने वाले, सुभाष चंद्र बोस पर कुछ बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पाते, जिन्होंने गांधी को यह संबोधन दिया।

इसके अलावा जिस गीत को लेकर गांधी और उनकी अहिंसा पर तंज कसा जाता है, क्या उसका कोई मतलब है? क्या कभी कांग्रेस और खुद गांधी ने यह दावा किया है कि आजादी सिर्फ गांधी के ही इकलौते प्रयासों का परिणाम है? अगर नहीं तो इस चरित्र हनन का औचित्य क्या?

क्या सुधांशु त्रिवेदी बता सकते हैं कि गांधी के अहिंसक आंदोलन को अपना धर्म बना चुके कांग्रेसियों को, ब्रिटिश सरकार किस धारा के तहत कालापानी भेजती?

ख़ैर, गांधी की राजनीति की खूबसूरती यह है कि यह निषेधवादी न होकर निरंतर प्रगतिशील रही है। खुद गांधी अपनी सोच में निरंतर परिवर्तन कर खुद को प्रगतिशील करते रहे। हर व्यक्ति समय के साथ बदलता रहता है, बस देखना यह रहता है कि यह बदलाव सकारात्मक है या नकारात्मक।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता गांधी के नेतृत्व में ही संभव थी। गांधी ने कभी अपनी आलोचना को रोकने को कोशिश नहीं की। तत्सम्य वैचारिक विरोध को व्यक्तिगत मानापमान से जोड़कर नहीं देखा जाता था। नेहरू जिन्हें कि गांधी के उत्तराधिकारी के रूप में देखा जाता था, ने भी कभी विचार के स्तर पर समझौता नहीं किया। उन्होंने कई बार गांधी की राय से अपनी खुली असहमति जताई।

गांधी के प्रति नेहरू की एक टिप्पणी देखें, “गांधी जी आधुनिक जीवन में कुछ पक्षों के प्रति किसानी अंधता से ग्रसित थे”। अब इस टिप्पणी को कोई गांधी विरोध के चश्मे से देखे तो यह उसकी समस्या है, नेहरू की नहीं। यह गांधी की विवेकपूर्ण उदार दृष्टि थी जो उन्होंने चापलूसों की नहीं, लोकतांत्रिक मनःस्थिति वाले योग्य देशभक्तों की पीढ़ी तैयार की।

गांधी निःसंदेह अहिंसा के प्रति आग्रहशील रहे, लेकिन उन्होंने कभी किसी की अभिव्यक्ति को रोकने का प्रयास नहीं किया। गांधी के विरोधी भी गांधी का सम्मान करते थे और गांधी भी भिन्न विचार वालों को सम्मान देने से कभी पीछे नहीं रहे। क्या कभी क्रांतिकारियों, जो कि गांधीवादी राजनीति के सर्वाधिक मुखर विरोधी थे, ने गांधी की नीयत पर शक किया? क्या कभी भगतसिंह और आजाद ने यह आरोप लगाया कि गांधी अंग्रेजों से मिले हुए हैं?

लेकिन विडंबना है कि जिन्होंने आजादी के आंदोलन में एक दिन तक जेल नहीं काटी, वे आज गांधी की राजनीतिक भूमिका के सबसे बड़े मीमांशक बने हुए हैं। क्या उस दौर की राजनीति में गोडसेवादी राजनीति के अलावा भी कोई ऐसी विचारधारा थी, जिसने गांधी को दशानन के रूप में चित्रित करने का दुःसाहस किया हो? गोडसे की पत्रिका अग्रणी में छपे एक कार्टून में गांधी के दस सिरों में पटेल, नेहरू और सुभाष के सिर भी शामिल किए गए थे। यह विशुद्ध दुर्भावना थी।

गांधी के राजनीतिक व्यवहार से हमें यह शिक्षा लेनी है कि हमें अपने वैचारिक विरोधियों के साथ कैसे गरिमापूर्ण व्यवहार करना चाहिए। गांधी के समय भी पार्टी में गंभीर मतभेद हुआ करते थे और इन मतभेदों के चलते पार्टियां भी टूटी हैं, लेकिन फिर भी यह मतभेद कभी मनभेद की वजह नहीं बने। पार्टियों की टूटन के बावजूद वैयक्तिक सम्मान में कभी कमी नहीं आई।

असहयोग आंदोलन को स्थगित किए जाने के गांधी के निर्णय की घोर आलोचना हुई। यहां तक कि नेहरू और सुभाष ने भी गांधी के निर्णय की सार्वजनिक आलोचना की। पंडित मोतीलाल नेहरू और सी आर दास ने तो आगे चलकर अलग पार्टी ही बना ली थी।

गांधी कांग्रेस नेताओं के चुनाव लड़कर विधान सभाओं में जाने के खिलाफ थे, जबकि पंडित मोतीलाल और दास विधानसभाओं के अंदर जाकर अंग्रेजी व्यवस्था को चुनौती देना चाहते थे। फलतः स्वराज पार्टी का गठन हुआ। लेकिन न तो गांधी ने नेहरू और दास पर अपनी राय थोपी और न ही दूसरे पक्ष ने गांधी पर।

इसी तरह 1939 में त्रिपुरी अधिवेशन में सुभाष बाबू और गांधी के बीच मतभेद कोई छुपी चीज नहीं है। बोस ने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया, क्योंकि जिस तरह की वे लड़ाई लड़ना चाहते थे, वह कांग्रेस में रहते हुए संभव नहीं थी। खैर महत्त्वपूर्ण बात यह है कि इस अलगाव के बाद भी सुभाष बाबू जब आजाद हिंद फौज के जरिए सशस्त्र क्रांति की शुरुआत करते हैं तो सबसे पहले वे अपने प्रिय बापू का आशीर्वाद लेना नहीं भूलते।

हां वे ही सुभाष जिन्होंने कभी कहा था कि “एक राजनीतिक नेता के रूप में महात्मा जी असफल रहे हैं” बाद में सुभाष ही उन्हें राष्ट्रपिता की संज्ञा देते हैं। बोस सेना की ब्रिगेड के नाम नेहरू और गांधी के नाम पर रखते हैं। यह बड़प्पन उस दौर के सभी बड़े नेताओं में था।

तो दूसरी तरफ गांधी बोस को सबसे बड़ा देशभक्त बताते हैं। इसके अलावा क्रांतिकारी आंदोलन के सबसे बड़े प्रतीक भगतसिंह पंजाब के युवाओं को नेहरू का अनुसरण करने को कहते हैं। यह भद्र जन की राजनीति थी, जो विचारों की संकीर्णता से मुक्त थी।

मालवीय जी और गांधी के विचार एकमेव तो नहीं थे, लेकिन क्या कभी मालवीय जी ने गांधी को लांक्षना दी? या गांधी ने उनको दी?

गांधी उस दौर के सबसे बड़े नायक थे। गांधी विरोधों के बीच सामंजस्य स्थापित करने के कुशल शिल्पी थे। 

यद्यपि गांधी के चरित्र हनन की कोशिशें तो तब भी थीं, लेकिन तब अफवाहें गांधी के प्रभावी व्यक्तित्व के आगे बेअसर रहीं। लेकिन आज जब नई पीढ़ी ने उनको पढ़ना छोड़ दिया तब हम अफ़वाहों के शिकार होने लगे।

यह गांधी का व्यक्तित्व था कि पेरियार तक- जो गांधी के कटु आलोचक थे- को गांधी की मौत से गहरा आघात लगा। वे बहुत दुखी हुए।

9 फरवरी 1948 को पेरियार ने अखिल भारतीय कांग्रेस समिति, नेहरू, राजगोपालाचारी, पटेल, जयप्रकाश नारायण और राजेंद्र प्रसाद को एक खत लिखा। इस पत्र में उन्होंने गांधी की स्मृति में स्मारक बनाने के अलावा निम्नलिखित मांगें की थीं –

1. इंडिया नाम बदलकर ‘गांधी देसम’ अथवा ‘गांधीस्तान’ कर दिया जाय।

2. हिन्दू धर्म के नाम को गांधीवाद अथवा गांधी धर्म में बदल दिया जाय।

3. गांधी दर्शन के अनुसार भारत में लोगों का केवल एक ही समुदाय होना चाहिए। उसमें जाति के आधार पर कोई बंटवारा नहीं होना चाहिए। नये धर्म की आधारशिला प्रेम और ज्ञान पर आधारित होनी चाहिए। यही नहीं क्रिश्चियन वर्ष का उपयोग करने के बजाय हम गांधी संवत् भी आरंभ कर सकते हैं।(पेरियार ई वी स्वामी: भारत के वाल्टेयर, पृ‌ ३७२ से उद्धृत)

यह बड़ी बात थी। जिस गांधी ने ब्रिटिश शासन के लिए कहा था, “मैं इस शासन को एक अभिशाप मानता हूं। मैं इस शासन प्रणाली को नष्ट करने पर आमादा हूं, अब राजद्रोह मेरा धर्म बन चुका है”।

उसी शासन प्रणाली के प्रतिनिधि अंग के रूप में माउंटबेटन गांधी के लिए कहते हैं कि “गांधीजी वनमैन बाउंड्री फोर्स हैं।” तो इरविन कहते हैं कि,”जिस नीति के साथ गांधी का नाम जुड़ा है, उसके परिणाम चाहे कितने ही सोचनीय माने जाएं, परंतु यह मानना पड़ेगा कि गांधी को आध्यात्मिक बल से प्रेरणा मिलती है, जिसके कारण वह अपने प्रिय देश भारत के हितार्थ कोई भी त्याग करने को तैयार रहते हैं।”

इसलिए व्यक्तित्व की खूबसूरती तो तब है, जब आपके धुर विरोधी भी आपकी सौमनस्यता के कायल हो जाएं। और गांधी इस परीक्षा में अव्वल रहे।

गांधी को (बल्कि किसी को भी) समझना है तो उनके साथ के तत्कालीन बड़े राजनीतिज्ञों के संस्मरण भी पढ़िए ताकि आप अपने देश के महापुरुषों को संपूर्णता में समझ सकें। वैचारिक अंधता से गांधी की प्रतिष्ठा पर कोई असर नहीं पड़ने वाला आप जरूर प्रतिष्ठा खो देंगे।

(संजीव शुक्ल का लेख।)

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