Thursday, October 21, 2021

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एनआरसी पर सरकार का झूठ आया सामने, सुप्रीम कोर्ट में पेश हलफ़नामे में कहा-जरूरी है देश के लिए एनआरसी

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नई दिल्ली। सरकार की ज़ुबान और सच्चाई के बीच गैप की उस समय कलई खुल गयी जब सुप्रीम कोर्ट में दिए गए एक हलफ़नामे में केंद्र ने एनआरसी को देश की ज़रूरत बता दिया। अभी तक सरकार के एक्जीक्यूटिव मुखिया मोदी से लेकर गृहमंत्री शाह तक एनआरसी को लागू करने के विपक्ष के आरोपों को हवा हवाई करार दे रहे थे। पीएम मोदी ने रामलीला मैदान में इसको लेकर विपक्ष पर अफ़वाह फैलाने का आरोप लगाया था। उन्होंने कहा था कि सरकार के भीतर एनआरसी को लेकर कोई चर्चा नहीं हुई है।

लेकिन नागरिकता संशोधन क़ानून को चुनौती देने वाली सुप्रीम कोर्ट में दायर कई याचिकाओं का जवाब देते हुए केंद्र सरकार ने कहा है कि “किसी भी संप्रभु राष्ट्र के लिए एनआरसी बेहद ज़रूरी अभ्यास है”।

इन याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को नोटिस जारी किया था जिसके जवाब में गृहमंत्रालय के निदेशक बीसी जोशी ने 17 मार्च को एक एफिडेविट पेश किया। जिसमें कहा गया है कि “….गैर नागरिकों से इतर नागरिकों की पहचान के लिए किसी भी संप्रभु राष्ट्र के लिए नागरिकों का राष्ट्रीय रजिस्टर बनना बेहद ज़रूरी है ”

याचिकाओं में नागरिकता क़ानून 1955 के सेक्शन 14ए को भी चुनौती दी गयी है जो एनआरसी के लिए क़ानूनी समर्थन मुहैया कराता है। और यह प्रवधान देश की कार्यपालिका को बेहद ज़्यादा शक्ति प्रदान कर देता है।

इस प्रावधान में कहा गया है कि केंद्र सरकार ज़रूरी तौर पर हर नागरिक को रजिस्टर करके उसे एक पहचान पत्र जारी कर सकती है। और इस तरह से भारतीय नागरिकों का एक रजिस्टर बनाया जा सकता है।

इस मसले पर जब पूरे देश में विरोध में खड़ा हुआ तो पीएम मोदी ने दिसंबर में कहा था कि सरकार ने राष्ट्रव्यापी एनआरसी पर कोई बातचीत नहीं की है।

जबकि अब अपने हलफ़नामे में सरकार ने कहा है कि एनआरसी के प्रावधान 1955 के नागरिकता क़ानून में ही निहित हैं।

हलफ़नामे में कहा गया है कि मौजूदा क़ानूनी व्यवस्था के तहत भारत में रहने वाले लोगों का तीन वर्गों में विभाजन किया जा सकता है- नागरिक, अवैध प्रवासी और वैध वीज़ा पर रहने वाले विदेशी। इसलिए यह केंद्र सरकार की ज़िम्मेदारी है कि वह पासपोर्ट एक्ट, 1920 और 1955 के क़ानून के तहत अवैध प्रवासियों की पहचान करे और उसके बाद नियमों का पालन करके उस प्रक्रिया को आगे बढ़ाए।

इस सिलसिले में सरकार ने 1946 के फारेनर्स एक्ट का हवाला दिया जिसमें कहा गया था कि विदेशियों को ख़ारिज करने का संपूर्ण विवेकाधिकार सरकार के पास सुरक्षित है। इसके साथ ही बाक़ी को भी बेरोकटोक ख़ारिज किया जा सकता है।

इसके साथ ही सरकार ने अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश का उदाहरण दिया है जहां नागरिकता कार्ड जारी किया गया है। हलफ़नामे में कहा गया है कि बहुत सारे देशों की उपलब्ध सूचनाओं के आधार पर यहाँ इस बात का ज़िक्र करना गैर मुनासिब नहीं होगा कि वहाँ पर उनके नागरिकों का रजिस्टर बनाए जाने की व्यवस्था है। वास्तव में राष्ट्रीय पहचान पत्र इन देशों में नागरिकों की पहचान को स्थापित करने के बाद ही जारी किया गया है। 

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