Mon. May 25th, 2020

ख़ास रिपोर्ट: सरकार प्राइवेट ट्रांसपोर्टर के जरिए कर रही कमाई, प्रति व्यक्ति 3-4 हजार रुपए वसूले जा रहे

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प्राइवेट बसें सवारी ढोती हुईं।

एक तरफ सार्वजनिक यातायात के सारे साधन बंद हैं। कई मुख्यमंत्रियों और राजनीतिक दलों द्वारा प्रवासी श्रमिकों के लिए श्रमिक एक्सप्रेस ट्रेन चलाने और बस का परमिशन जारी करने के आग्रह के बावजूद सरकार लॉकडाउन को लेकर सख्त है वहीं सड़कों पर बड़े धड़ल्ले से निजी बस, ट्रक और दूसरे निजी वाहन प्रवासी मजदूरों को खचाखच भरकर बड़े धड़ल्ले से दौड़ रहे हैं। उनके लिए कहीं कोई लॉकडाउन नहीं है। डिस्टेंसिंग की धज्जियां उड़ाती ये गाड़ियां प्रशासन के सामने से गुजर रही हैं। पर क्या मजाल कि प्रशासन किसी गाड़ी को खड़ी करा ले।

किराया प्रति सवारी तीन हजार से लेकर 7 हजार तक फिक्स है। महाराष्ट्र से उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड जाने वाली निजी बसों और ट्रकों को। सवाल उठता है कि आखिर कैसे निजी वाहनों को इतनी आसानी से पास मिल जाता है। जबकि कई राजनीतिक दलों को प्रवासी मजदूरों के लिए बसों को भेजने के लिए मुख्यमंत्री के आगे मिन्नतें करने के बावजूद उन्हें परमिशन नहीं मिलती।

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हम पिछले एक सप्ताह से देख रहे हैं कि कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी उत्तर प्रदेश सरकार से प्रवासी मजदूरों के लिए 1000 बसें भेजने की परमिशन मांग रही हैं लेकिन उन्हें परमिशन नहीं दिया जा रहा है। कांग्रेस द्वारा राजस्थान परिवहन की 600 बसें परसों से उत्तर प्रदेश-राजस्थान की सीमा पर लाकर खड़ा कर दिया गया लेकिन सरकार ने परमीशन नहीं दिया जबकि सीमा पर हजारों की संख्या में प्रवासी मजदूर जमा हुए थे।

वहीं दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने भी दिल्ली कांग्रेस द्वारा यात्रियों को ले जाने के लिए मुहैया करवाई गई 13 बसों को परमिट जारी करने और यात्रियों का मेडिकल स्कैनिंग करवाने के बाद बसों की परमिट कैंसिल कर दी जबकि दिल्ली से लगातार ट्रक मजदूरों को भर भरकर ले जा रहे हैं 3-4 हजार प्रति सवारी की दर से। 

सरकार प्राइवेट ट्रांसपोर्टर के जरिए कर रही कमाई 

दिल्ली कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष अनिल चौधरी केंद्र सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए दावा कर रहे हैं कि “सरकार प्राइवेट बस मालिकों के जरिए कमाई कर रही है। एक एक श्रमिक से 3-4 हजार रुपए वसूला जा रहा है। तभी तो निजी बसों और ट्रकों को फौरन पास मिल जा रहा है। अब किसी भी सड़क पर जाकर देख लीजिए मजदूरों को खचाखच भरी निजी गाड़ियों का तांता लगा है।”

सड़क पर खड़े होकर, या आस पास के गांव मोहल्लों में लौटे मजदूरों से बात करने पर अनिल चौधरी के आरोपों की पुष्टि भी हो जाती है। दिल्ली, मुंबई, सूरत, हरियाणा से लौटे कई मजदूरों ने बताया कि उनसे 3-4 हजार रुपए प्रति व्यक्ति किराया लिया गया। और गारंटी के साथ घर के नजदीक तक छोड़ा गया। मजदूरों का कहना है कि किराये की दर फिक्स है। उससे कम नहीं करते वो। सूरत गुजरात से इलाहबाद (यूपी) लौटी उषा देवी बताती हैं कि दलाल ने प्रति व्यक्ति 3 हजार रुपए लेकर उन लोगों का पास बनवाया। उसके बाद उन लोगों को एक निजी साधन प्रति व्यक्ति 4 हजार रुपए की दर से करके इलाहाबाद आए। 

निःसंदेह पिछले 15 दिन में प्राइवेट वाहनों के चलने की गति बढ़ी है। परसों ही न्यूज18 इंडिया चैनल को दिए इंटव्यू में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने दावा किया है कि पिछले 15 दिन में 6 लाख प्रवासी मजदूर उत्तर प्रदेश में आए हैं।  

सार्वजनिक वाहनों के संचालन में सरकार को किराया छोड़ना पड़ता है जबकि निजी साधनों से दोगुना-तिगुना मिल रहा है।

मार्च के आखिरी दिनों में जब दिल्ली के आनंद बिहार बस अड्डे पर राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली के हजारों की संख्या में प्रवासी मजदूर जनसैलाब बनकर उमड़े हुए थे तब भी उत्तर प्रदेश परिवहन की कुछ बसें उन्हें वहां से निकालने के लिए भेजी गई थीं और बाकायदा सभी यात्री मजदूरों का टिकट काटकर पैसा वसूला गया था। तब भी इस पर विपक्षी दलों और समानांतर मीडिया ने प्रश्न खड़े किए थे कि जिनके पास खाने को रोटी नहीं है आप उनसे किराया वसूल रहे हो।

इसी तरह श्रमिक एक्सप्रेस ट्रेन में यात्रा करने वाले प्रवासी मजदूरों से भी जब किराया वसूला गया तो उस पर सवाल खड़े किए गए। मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने श्रमिक एक्सप्रेस से सफर करने वाले प्रवासी मजदूरों को किराया खुद वहन करने की घोषणा करके सरकार को बैकफुट पर ला दिया। थूक थुकौव्वल होने पर केंद्र सरकार को कहना पड़ा कि केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर मजदूरों के टिकट का खर्च वहन करेंगी। 

लेकिन निजी ट्रांसपोर्ट को चलाने की अनुमति देने से किराया छोड़ने का कोई झंझट नहीं है। निजी ट्रांसपोर्ट के जरिए सरकार मनमाने दाम वसूल लेगी तब भी न मीडिया चूं करेगा, न विपक्ष शोर मचाएगा ये बात सरकार भलीभांति जानती है। इसलिए हम देखते हैं कि यकायक निजी वाहनों की भरमार से लग गई है सड़कों पर, उन्हें फटाफट परमिशन भी मिल जा रहा है और यात्री पास भी।

जिला प्रशासन अपने सिर के बवाल की तरह भगा रहा मजदूरों को 

उत्तर प्रदेश के गोरखपुर का एक वीडियो सोशल मीडिया पर पर वायरल है जिसमें यूपी पुलिस के कर्मचारी एक ट्रक में सैकड़ों मजदूरों को बैठाकर अपनी सीमा के बाहर भेज रहे हैं। ऐसे सैकड़ों वीडियोज हैं जिनमें स्पष्ट दिख रहा है कि पुलिस प्रशासन प्रवासी मजदूरों को ट्रकों में भर भरकर अपने जिले की सीमा के बाहर छुड़वा रहा है। दरअसल जिला प्रशासन प्रवासी मजदूरों को बोझ और आफत समझ रहा है।

लगभग हर जिले का जिला प्रशासन अपनी जिम्मेदारी, अपनी जवाबदेही से भाग रहा है। कोई भी जिला प्रशासन अपनी सीमा में प्रवासी मजदूरों को नहीं रखना चाह रहा है, कोई भी जिला प्रशासन उनके रहने, खाने की व्यवस्था के उत्तरदायित्व से नहीं बँधना चाहता है इसीलिए कहीं से आए मजदूरों को जैसे तैसे एक जिससे से दूसरे जिले में भगाया जा रहा है। इसी भागम-भगाई में रोड एक्सीडेंट हो रहे हैं जिसमें लगभग रोज ही दर्जनों मजदूरों को अपनी जान गँवानी पड़ रही है।

शनिवार 16 मई को औरैया जिले के चिरौली गांव से गुजरने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग-19 पर एक ट्रक के दुर्घटनाग्रस्त होने से उसमें सवार 26 प्रवासी मजदूरों की मौत हो गयी थी जबकि 36 मजदूर बुरी तरह घायल हुए थे। 

इस दुर्घटना में जिंदा बचे प्रवासी मजदूरों द्वारा रविवार को लगाए इस आरोप के बाद कि राजस्थान पुलिस ने इन सभी को जबरन चूने से लदे ट्रक में बैठाया था, उत्तर प्रदेश की कानपुर पुलिस ने राजस्थान पुलिस पर लगाये आरोपों की जांच शुरू कर दी है। कानपुर रेंज के एसपी मोहित अग्रवाल ने टाइम्स ऑफ इंडिया से बताया कि यूपी पुलिस प्रवासी मजदूरों के बयान दर्ज कर रही है, अगर मजदूरों का बयान सत्य पाया गाया तो कानून अपना काम करेगा।

वहीं इस मामले में प्रवासी मजदूरों के आरोपों को पूरी तरह से खारिज करते हुए राजस्थान पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि प्रदेश में हर दिन रोड वेज बसों का परिचालन जारी है। राज्य परिवहन की बसें प्रवासी मजदूरों को बॉर्डर तक छोड़ रही हैं। हम जारी गाइडलाइन का पालन कर रहे हैं। इसके साथ ही किसी को भी ट्रक में जाने की अनुमति नहीं दी जा रही है, ना ही ऐसा करने के लिये किसी को कहा जा रहा है।

बता दें कि राजस्थान में एक पत्थर की खान में काम करने वाले 43 मजदूर पश्चिम बंगाल स्थित अपने घर जाने के लिये चूने की बोरियों को लेकर जा रहे ट्रेलर-ट्रक में सवार होकर राजस्थान से निकले थे। 

यूपी के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ ने पंजाब और राजस्थान की कांग्रेस सरकार के खिलाफ लगाए आरोप

उत्तर प्रदेश की सीमाएं सील करने, प्रवासी मजदूरों पर लाठी चार्ज करवाने और यूपी में हो रही सड़क दुर्घटनाओं में प्रवासी मजदूरों की मौत, उत्तर प्रदेश में बढ़ते कोरोना संकट और भुखमरी व आत्महत्या की घटनाओं पर चौतरफा घिरे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ ने कल एक के बाद एक कई ट्वीट करके पंजाब और राजस्थान की कांग्रेस सरकार पर हमला करते हुए उन्हें औरैया सड़क हादसे में मरे 26 मजदूरों की मौत के लिए जिम्मेदार बताया है। 

योगी ने लिखा है- “कोरोना काल में भी कांग्रेस ओछी राजनीति कर रही है। उन्होंने कांग्रेस शासित राज्यों पर परोक्ष रूप से निशाना साधते हुए कहा कि औरैया में प्रवासी श्रमिकों की मौत के लिए जिम्मेदार एक ट्रक पंजाब से तथा दूसरा राजस्थान से आया था।”

छत्तीसगढ़ की भूपेश सिंह बघेल सरकार ने अपने राज्य में फँसे और दूसरे राज्यों से आने वाले मजदूरों को राज्य की सीमा तक छोड़ने के लिए छत्तीसगढ़ परिवहन की बस सेवा की घोषणा की है। बावजूद इसके छत्तीसगढ़ में प्रवासी मजदूरों को खुद छत्तीसगढ़ प्रशासन द्वारा ट्रकों में भर भरकर भेजा जा रहा है।

मुख्यमंत्री के निर्देश के बाद दर्जनों बसें खड़ी तो कर दी गई हैं, मगर उन्हें भेजा क्यों नहीं जा रहा ? दरअसल जिला प्रशासन ने आरटीओ को बोलकर प्राइवेट ऑपरेटर्स की बसें लगाई हैं। जिला प्रसाशन के बड़े अधिकारी अपने मातहत छोटे अधिकारियों के जरिये आरटीओ और फ़ूड विभाग के अधिकारियों के माध्यम से बसों में खुद ही डीजल डलवाने के लिए बस ऑपरेटर्स पर दबाव डाल रहे हैं। बसों का किराया तो मिलना नहीं है, ऊपर से डीजल डलवाने को भी कहा जा रहा है।

यानि कि बस का किराया और डीजल का पैसा जिला प्रशासन बस ऑपरेटर्स को नहीं देगा। जबकि इसका पूरा बिल सरकार को सबमिट होगा बाकी की कहानी आप खुद समझ लीजिए।

(जनचौक के विशेष संवाददाता सुशील मानव की रिपोर्ट।)

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