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स्माल सेविंग्स स्कीमों पर यू-टर्न: पब्लिक के पैसे से कब तक छिपेगी बदहाली?

जुमले उछाल कर तालियां बटोरने और जमीन पर काम करने में बड़ा फर्क है। खुद को अर्थव्यवस्था का फन्ने खां समझने और जीडीपी को ढंग से ड्राइव करने में काफी फासला है। वेल्थ क्रिएटरों को सिर-आंखों पर बिठाने की नसीहत देने और देश में पाई-पाई जोड़ कर छोटी बचत योजनाओं में पैसा जमा करने वालों की वेल्थ को बरकरार रखने में भी बड़ा अंतर है। 

मजबूत आर्थिक फैसलों पर भारी वोटों का लालच

कल तक जो मोदी सरकार खुद को बोल्ड रिफॉर्मर कह कर वाहवाही बटोर रही थी, वो वोटों की राजनीति का जरा सा दबाव पड़ते ही ढह गई। 31 मार्च को सरकार ने पीपीएफ, एनएससी, किसान विकास पत्र, सीनियर सिटिजन सेविंग स्कीम और सुकन्या समृद्धि योजनाओं जैसी, अलग-अलग अवधियों के डिपोजिट पर मिलने वाले ब्याज दरों में भारी कटौती कर दी। लेकिन 24 घंटे के भीतर उसने ये फैसला यह कहते हुए वापस ले लिया कि ऐसा गलती से हो गया था। मानो वह जनता को ‘अप्रैल फूल’ बनाना चाहती थी। 

लेकिन मोदी सरकार को जनता को जितना मूर्ख समझती है, उतनी वो है नहीं। इस रोलबैक का सिरा सीधे पश्चिम बंगाल चुनाव से जुड़ा है, जहां वह चुनाव जीतने के लिए हर तिकड़म आजमाने में लगी हुई है। 

नेशनल सेविंग्स इंस्टीट्यूट के आंकड़ों के मुताबिक (वित्त मंत्रालय के तहत काम करने वाला संस्थान) वर्ष 2017-18 (इसके बाद का आंकड़ा नहीं है) में स्माल सेविंग्स की अलग-अलग स्कीमों में लोगों ने 5.94 लाख करोड़ रुपये जमा किए थे। इसमें सबसे ज्यादा हिस्सेदारी पश्चिम बंगाल की थी। इस राज्य में इन योजनाओं में लोगों ने 90 हजार करोड़ रुपये जमा किए थे। इसके बाद सबसे ज्यादा आबादी वाले राज्य यूपी में 70 हजार करोड़, महाराष्ट्र में 63 हजार करोड़ रुपये और गुजरात में 48 हजार करोड़ जमा किए गए। स्माल सेविंग्स स्कीमों में जितना पैसा जमा होता है, उसका 13 से 15 फीसदी हिस्सा पश्चिम बंगाल के डिपोजिटरों का है। 

जाहिर है, स्माल सेविंग्स स्कीमों की ब्याज दर में कटौती बंगाल में बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन सकता था। तृणमूल और वामपंथी पार्टियां इस सवाल पर उसे घेर सकती थीं इसलिए सरकार ने रातोंरात इस फैसले को वापस ले लिया और सारा ठीकरा वित्त मंत्रालय के बाबुओं पर फोड़ दिया। 

खतरा अभी बरकरार, डिपोजिटरों पर फिर होगा वार 

फिलहाल इस फैसले ने भले ही सरकार की किरकिरी कराई हो लेकिन स्म़ाल सेविंग्स स्कीमों में पैसा जमा करने वाले करोड़ों डिपोजिटरों के सामने खतरा टला नहीं है। ब्याज दरों में कटौती का जो फैसला सरकार अभी नहीं कर पाई, उसे वह जुलाई में करेगी, जब अगली तिमाही की दरों की समीक्षा होगी। आखिर, इस आशंका की बुनियाद क्या है? वजह समझने के कुछ मोटे आंकड़ों पर एक सरसरी निगाह डालना जरूरी होगा। 

सरकार की जो कमाई होती है, उसका एक बड़ा हिस्सा उसके कर्ज पर ब्याज की अदायगी में खर्च हो जाता है। यह तो खुला सच है कि मोदी सरकार की कमाई लगातार घटती जा रही और कर्ज बढ़ता जा रहा है। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (CMIE) के आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष  2015-16 में इसने अपने कर्ज के ब्याज के तौर पर 4.4 लाख करोड़ अदा किए थे। लेकिन 2021-22 में उसे 8।1 लाख करोड़ रुपये का ब्याज अदा करना है। यानी सरकार जितना खर्च करेगी, उसमें से लगभग 23.2 फीसदी यानी लगभग एक चौथाई ब्याज देनदारी का है। यानी जो पैसा खर्च करना है, उसका बड़ा हिस्सा सरकारी स्कीमों के बजाय कर्ज उतारने में खर्च होगा। 

जनता का पैसा कर्ज उतारने में खर्च 

सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी का दूसरा आंकड़ा भी बेहद दिलचस्प है। सरकार का जितना पैसा टैक्स से आता है उसका 52.4 फीसदी 2020-21 के दौरान कर्ज की ब्याज अदायगी में चला जाएगा। वर्ष 2020-21 में सरकार का राजकोषीय घाटा, यानी कमाई और खर्च का अंतर 18.49 लाख करोड़ रुपये रहने वाला है। इसकी भरपाई के लिए सरकार मार्केट से 12.47 लाख करोड़ रुपये का कर्ज उठाएगी। लेकिन बाकी का पैसा कहां से लाएगी? 

सवाल यह है कि अगर सरकार की इस पैसे पर इतनी निर्भरता है तो वह इस पर ब्याज कम करने पर क्यों तुली हुई है। इसकी तीन मोटी वजहें हैं? 

  1. बैंकों की तुलना में सरकार के पास अपने पास जमा पैसों (स्माल सेविंग्स स्कीमों के पैसे की देनदारी सीधे सरकार की बनती है। सारा पैसा इसके पास जाता है) पर ज्यादा ब्याज दे रही है। लोग ज्यादा ब्याज के लिए इन स्कीमों में पैसा जमा करेंगे ही। इसलिए सरकार इन स्कीमों में ब्याज कटौती करने की स्थिति में है। उसे पता है कि लोग बैंकों में पैसा जमा करने के बजाय उसकी स्माल सेविंग्स की स्कीमों को तरजीह देंगे क्योंकि ब्याज दरों में कटौती के बावजूद ये बैंक की ब्याज दरों से ज्यादा हैं।
  2. चूंकि सरकार की कमाई घटती जा रही है और स्मॉल सेविंग्स स्कीमों पर ब्याज का बोझ बढ़ता जा रहा है। इसलिए वह इसकी दरों में कटौती कर इस बोझ को हल्का करना चाह रही है। घटी कमाई पर ज्यादा ब्याज देना अब उसके लिए मुश्किल हो रहा है।
  3. नेशनल स्माल सेविंग्स फंड यानी NSSF से राज्य सरकारें और पीएसयू पैसा लेते रहे हैं। इसकी ब्याज की कमाई केंद्र के पास आती रही है। लेकिन यह सिलसिला भी कम हो गया है क्योंकि एनएसएसएफ की ब्याज दरें भी ज्यादा हैं। लिहाजा राज्य मार्केट से सस्ते दर पर कर्ज ले रहे हैं। इस तरह से ब्याज से होने वाली इसकी कमाई का यह स्रोत भी खत्म हो गया है।

दरअसल, पिछले पांच साल में यानी नोटबंदी के फैसले के बाद से ही अर्थव्यवस्था की हालत बेहद खराब होती चली गई है। सरकार का डायरेक्ट और इनडायरेक्ट टैक्स कलेक्शन घटा है। बगैर सोचे-समझे और आधी-अधूरी तैयारियों के साथ जीएसटी लगा कर सरकार ने छोटे और मझोले उद्योगों की कमर तोड़ डाली है। इसके बाद कोरोना संक्रमण रोकने के लिए मनमाने ढंग से लगाए गए दुनिया के सबसे कड़े और लंबे लॉकडाउन ने अर्थव्यवस्था के असंगठित क्षेत्र को लगभग जमींदोज कर दिया है। 

बगैर सलाह-मशविरे के किए गए इन जिद्दी फैसलों ने सरकार के कमाई के स्रोतों को सुखा डाला है। लेकिन इन फैसलों सजा आम जनता भुगत रही है। सरकारी खजाने को पेट्रोल-डीजल पर भारी टैक्स लगा कर भरने की कोशिश हो रही है। लिहाजा महंगाई की आग भड़कने लगी है। रोजगार के मोर्चे पर नील बटा सन्नाटा का आलम है। नए लेबर कोड और कृषि कानूनों ने श्रमिकों और किसानों को बेचैन कर दिया है। लेकिन बेपरवाह सरकार लोगों की कमाई पर चोट करने के बाद अब उनकी बचत पर घात लगाने के दांव खोज रही है।

(दीपक के मंडल वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

This post was last modified on April 2, 2021 3:00 pm

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