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क्या कल्याण सिंह की राह पर चल पड़े हैं योगी आदित्यनाथ

देश के सबसे बड़े प्रदेश में सत्तारूढ़ दल के अंदर मचे घमासान पर देश भर की निगाहें लगी हैं। योगी मंत्रीमंडल के विस्तार और विधानसभा चुनाव-2022 की तैयारी को लेकर शुरू हुई बैठक ने सत्ता परिवर्तन का रूप ले लिया, अब जो धीरे-धीरे मोदी-योगी संघर्ष में बदलता जा रहा है। लेकिन अभी तक विवाद की वजह और दिल्ली-लखनऊ में रोजाना हो रही बैठकों का सही कारण और नतीजा सामने नहीं आया है। इसलिए पर्दे के पीछे चल रहे इस सियासी संग्राम ने लोगों की जिज्ञासा को और बढ़ा दिया है। पर्दे के पीछे से छनकर आ रही खबरों से साफ जाहिर है कि मोदी-शाह की जोड़ी उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव के पहले योगी सरकार की सर्जरी करने को ढृढ़ प्रतिज्ञ है ऐसे में यूपी की राजनीति में हलचल तेज होना स्वभाविक है।

ऐसे में सवाल उठता है कि यूपी में चल रहे सियासी संग्राम की वजह क्या है, और इसके प्रमुख किरदार कौन-कौन से हैं? क्या यह मोदी-योगी संघर्ष है या मोदी बनाम संघ? राजनीतिक विश्लेषकों की इस पर अलग-अलग राय है। कुछ लोग इस लड़ाई को मोदी बनाम योगी तो कुछ लोग इसे संघ बनाम मोदी बता रहे हैं। कुछ लोगों का यह भी कहना है कि पश्चिम बंगाल में मुंह की खाने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर कुछ ज्यादा ही सतर्क हो गए हैं क्योंकि दिल्ली की कुर्सी तक पहुंचने का रास्ता यूपी से होकर जाता है। ऐसे में 2022 विधानसभा चुनाव को पार्टी मजबूती से लड़ना चाहती है और उसके लिए किसी भी तरह का फेरबदल किया जा सकता है।

भाजपा में मंथन का विषय यह है कि उत्तर प्रदेश में योगी सरकार के काम-काज ने भाजपा के लिए मुश्किल खड़ा कर दिया है। चार साल से उत्तर प्रदेश में कुछ नहीं हुआ है। मुख्यमंत्री आम आदमी की कौन कहे पार्टी के विधायकों, सांसदों और मंत्रियों तक की नहीं सुनते हैं। कोरोना संक्रमण के दौरान सरकार के स्तर पर कुछ नहीं किया गया जिसके कारण प्रदेश का हर आम और खास आदमी परेशान रहा। योगी प्रदेश में कानून-व्यवस्था तक को ठीक नहीं कर सके। योगी सरकार की नाकामी की वजह से पार्टी को पंचायत चुनाव में करारी हार का सामना करना पड़ा। ऐसे में आलाकमान यदि प्रदेश में पुन: भाजपा की सरकार चाहता है तो 2022 विधानसभा चुनाव के पहले या तो मुख्यमंत्री बदला जाए या योगी आदित्यनाथ के अधिकारों को सीमित कर सब कुछ सक्षम लोगों के हवाले किया जाए। उसी कड़ी में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को बदलने की संभावना भी व्यक्त की जा रही है। लेकिन योगी आदित्यनाथ को बदलकर किसी दूसरे को मुख्यमंत्री बना देना इतना आसान नहीं है जितनी आसानी से यह कहा जा रहा है।

यह बात सही है कि योगी आदित्यनाथ मोदी-शाह की पसंद नहीं हैं। मोदी-शाह पूर्व केंद्रीय मंत्री मनोज सिन्हा को मुख्यमंत्री बनाना चाहते थे लेकिन ऐन वक्त पर योगी आदित्यनाथ ने सबको पीछे छोड़ते हुए मुख्यमंत्री बन गए। मोदी-शाह की जोड़ी अभी तक योगी आदित्यनाथ को पचा नहीं पायी है। संघ के समर्थन और कट्टर हिंदुत्व की छवि से योगी को जो देशव्यापी समर्थन मिल रहा है उससे भी मोदी-शाह खुश नहीं हैं।

फिलहाल, प्रदेश में जारी संघर्ष के कई कारण हैं और यह लड़ाई संघ-बनाम मोदी का है और इसमें शामिल अन्य लोग मोहरे हैं। फिलहाल हम पहले मोहरे की बात करते हैं- इस संघर्ष के सबसे अहम किरदार पूर्व नौकरशाह अरविंद कुमार शर्मा हैं। आईएस की नौकरी से स्वैच्छिक सेवानिवृत्त देकर वे आए और मोदी-शाह की कृपा से विधान परिषद सदस्य बन गए। पिछलेे साल भर से यह चर्चा आम है कि योगी सरकार के कैबिनेट का जल्द ही विस्तार होगा और अरविंद शर्मा उप-मुख्यमंत्री होंगे। लेकिन वह आज तक नहीं हो पाया। सूत्रों का कहना है कि योगी शर्मा को किसी कीमत पर मंत्री नहीं बनाना चाहते। अभी तक वे शर्मा से मिले तक नहीं हैं। योगी खेमा अरविंद शर्मा को मोदी-शाह का जासूस मानता है। अरविंद शर्मा को मंत्रिमंडल में शामिल न करने की घटना ताजा विवाद के केंद्र में है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि योगी ने जिस तरह से इस विषय पर जिद अख्तियार किया है वह किसी को भी नाराज करने के लिए काफी है।

उप-मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य इस लड़ाई के दूसरे सबसे अहम किरदार हैं। 2017 में विधानसभा चुनाव के समय केशव मौर्य पार्टी के अध्यक्ष थे और मुख्यमंत्री पद के सबसे प्रमुख दावेदार थे। लेकिन उनकी जल्दबाजी ने उनको मुख्यमंत्री की कुर्सी से दूर कर दिया। लिहाजा वे हमेशा उप-मुख्यमंत्री से मुख्यमंत्री बनने के लिए षडयंत्र करते रहते हैं। पार्टी की ब्राह्मण लॉबी और स्थानीय पत्रकारों का एक समूह उनका समर्थक है। लेकिन इस दौरान जिस तरह से मीडिया और सोशल मीडिया में उनके नाम की चर्चा हुई उससे उनको भविष्य में लाभ कम हानि अधिक होने वाला है। इसी लॉबी ने केशव के स्थान पर अरविंद शर्मा को उप-मुख्यमंत्री और केशव को प्रदेश अध्यक्ष बनाने का शिगूफा छोड़ा था। इसके साथ ही दूसरे उप-मुख्यमंत्री दिनेश शर्मा, श्रीकांत शर्मा, सिद्धार्थनाथ सिंह, सतीश महाना जैसे आधा दर्जन मंत्री मुख्यमंत्री बनने की कतार में हैं।

योगी खेमा इस बात से भी नाराज है कि विधानसभा चुनाव-2022 की तैयारी बैठक को जिस तरह से किया गया वह बहुत ही अपमानजनक है। समीक्षा बैठक में संघ के सह कार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले (जो मोदी के समर्थक और शुभचिंतक माने जाते हैं) भी शामिल थे। उनके सामने जिस तरह से एक-एक कर विधायकों-मंत्रियों से योगी सरकार के काम-काज के बारे में राय ली गयी उससे योगी खेमा भड़क गया।

होशबोले के बाद संघ ने राष्ट्रीय महासचिव (संगठन) बीएल संतोष को स्थिति को समझने के लिए लखनऊ भेजा गया। योगी की तरफ से प्रदेश नौकरशाही के बड़े पदों पर केंद्र की पसंद से नियुक्ति और संगठन मंत्री सुनील बंसल के समानांतर सत्ता संचालित करने की बात भी जोर-शोर से उठी। इसके साथ ही गुटों में बंटे असंतुष्टों का मामला भी सामने आया।

उत्तर प्रदेश को लेकर दिल्ली में होने वाली बैठकों का सिलसिला अभी थमा नहीं हैं। भाजपा के प्रदेश प्रभारी राधा मोहन सिंह शनिवार को दिल्ली में राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा के साथ मौजूद थे और वे अचानक लखनऊ पहुंचे और रविवार को राज्यपाल आनंदीबेन पटेल से मिले। इस मुलाकात को राधा मोहन सिंह ने शिष्टाचार भेंट बताया। मंत्रिमंडल विस्तार पर उन्होंने कहा कि जो भी पद खाली हैं, उचित समय आएगा तो उन्हें मुख्यमंत्री स्वयं भरेंगे। मुख्यमंत्री के सवाल पर उन्होंने कहा कि सीएम अच्छा काम कर रहे हैं। सभी उनका लोहा मानते हैं, कोरोना से निपटने में उन्होंने किस तरह काम किया है, यह सब जानते हैं। सरकार और संगठन अच्छे से काम कर रहे हैं। कुछ लोगों के अपने दिमाग की खेती है, जो कुछ भी कह रहे हैं।

दिल्ली से लखनऊ आए प्रदेश प्रभारी राधा मोहन सिंह ने शनिवार देर रात प्रदेश मुख्यालय में प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह व महामंत्री सुनील बंसल के साथ बैठक की। सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, बैठक में राष्ट्रीय अध्यक्ष की ओर से मिले दिशा-निर्देश पर चर्चा हुई।

भाजपा-संघ के अंदरखाने चल रहे इस संघर्ष का परिणाम आना बाकी है। उत्तर प्रदेश का सियासी संग्राम क्या मोड़ लेगा अभी कुछ कहा नहीं जा सकता है। लेकिन लड़ाई की शुरूआत जिस तरह से हुई है वह यह बताता है कि तैयारी लंबी है। इस लड़ाई में कौन जीतेगा और किसे मुंह की खानी पड़ेगी कुछ कहा नहीं जा सकता लेकिन उत्तर प्रदेश में चल रहे इस आंतरिक कलह ने अटल बिहारी वाजपेयी बनाम कल्याण सिंह की लड़ाई की याद को ताजा कर दिया है। जब हिंदू ह्रदय सम्राट और पिछड़ों के मसीहा का तमगा लटकाये कल्याण सिंह ने तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को चुनौती दे दी थी। लड़ाई के आगे बढ़ने पर तब उन्हें न संघ बचा पाया था और न ही उनकी कड़क प्रशासक और कट्टर हिंदुत्ववादी छवि। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि क्या इस बार कट्टर हिंदुत्ववादी की छवि वाले मुख्यमंत्री अपनी कुर्सी बचा पायेंगे?

(प्रदीप सिंह जनचौक के राजनीतिक संपादक हैं।)

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This post was last modified on June 7, 2021 10:54 am

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