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Thursday, September 23, 2021

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सड़ांध मारती व्यवस्था और नफरती-सांप्रदायिक माहौल में न्याय के योद्धा हैं कुणाल कामरा

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क्या कुणाल कामरा ऐसे महानायक बनकर उभरे हैं जो उन तमाम पीड़ितों की नाराजगी का प्रतीक हैं जिन्हें अदालतों से इंसाफ नहीं मिलता। सोशल मीडिया कुणाल कामरा के साथ खड़ा हो गया है। जाने-माने वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण के समय भी यही हुआ था। प्रशांत भूषण ने जब सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस पर तीखी टिप्पणियां की थीं तो उस समय उन पर अवमानना का केस चलाया गया। उस समय सोशल मीडिया प्रशांत भूषण के साथ खड़ा नजर आया। वही स्थिति फिर से बन गई है। न्यायपालिका की भद्द सत्तारूढ़ पार्टी के लोग भी पीटने में पीछे नहीं रहते। आरएसएस विचारक और कथित पत्रकार तरुण विजय के पटाखों की पाबंदी पर ताजा ट्वीट इसी बात की गवाही देते हैं।  

व्यवस्था जब सड़ांध मारने लगती है और न्याय व्यवस्था जब गूंगी बहरी हो जाती है तो उन हालात में कुणाल कामरा और प्रशांत भूषण जैसों की टिप्पणियां लोगों के जख्मों पर मरहम रखने का काम करती हैं। एक कारोबारी दंपति की खुदकुशी के मामले में विवादित एंकर अर्णब गोस्वामी को मुम्बई पुलिस ने गिरफ्तार किया था। अपनी जमानत के लिए गोस्वामी सुप्रीम कोर्ट तक जा पहुंचे। सीनियर वकील हरीश साल्वे ने अर्णब का केस हैंडल किया था। अर्णब को जमानत देते हुए जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ ने अर्णब की आजादी को आम लोगों की आजादी से जोड़ दिया। यहीं पर जस्टिस चंद्रचूड़ कुणाल कामरा ही नहीं आम लोगों की आलोचना का भी शिकार हुए। सोशल मीडिया पर लोगों ने लिखा कि क्या बात सिर्फ अर्णब गोस्वामी की आजादी की है और वो अनगिनत लोग जो कई महीनों और साल से जेलों में बंद हैं, उनकी आजादी का कोई मतलब नहीं है।

बॉलीवुड एक्टर कमाल खान जो अक्सर अपने विवादित ट्वीट्स के लिए जाने जाते हैं, वे कुणाल कामरा के समर्थन में खुल कर सामने आये हैं। उन्होंने कुणाल कामरा को बहादुर बताते हुए लिखा है कि कुणाल कामरा ने अपनी बहादुरी सिद्ध कर दी है। वह सौ फीसदी सही हैं। कमाल ने भी वही बात कही जो आम लोग सोशल मीडिया पर कह रहे हैं। कमाल ने कहा – जब अर्णब गोस्वामी बोलने के लिए आजाद है, जो वह सोचता है ठीक है, तो फिर कुणाल क्यों नहीं?

सोशल वर्कर प्रियरंजन सिंह का यह ट्वीट काबिलेगौर है कि बड़ी अदालतों के जज रिटायर होने के बाद राज्यसभा जाने की वजह से इंसाफ नहीं कर पाते। अयोध्या और अन्य महत्वपूर्ण मामलों पर फैसला सुनाने वाले सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस रंजन गोगोई के मामले में यह बात साबित भी हो चुकी है। प्रियरंजन सिंह ने लिखा है – क्या अब ये ना समझा जाए कि सुप्रीकोर्ट के जज लोग रिटायर होने के बाद राज्यसभा जाने के चक्कर में न्याय नहीं कर पाते? अगर ऐसा नहीं है तो देश को संतुष्ट करें।

उदयपुर कोर्ट पर भगवा झंडा

वाई.एस. शाह नामक ट्वीटर यूजर ने उदयपुर जिला अदालत की बिल्डिंग पर भगवा झंडा फहराने का मामला उठाया है। शाह ने सुप्रीम कोर्ट से लेकर अर्णब गोस्वामी और भाजपा नेताओं की मंशा पर सवाल उठाते हुए लिखा है कि उस समय भी तो कोर्ट की अवमानना हुई थी, तब ये लोग क्यों चुप रहे। पाठकों को तीन साल पहले हुई इस घटना के संदर्भ में याद दिला दें। बीबीसी के मुताबिक 15 दिसम्बर, 2017 को राजसमंद में अफराजुल नामक युवक की हत्या के बाद आरोपी शंभु के समर्थन में  हिन्दू प्रदर्शनकारियों ने गुरुवार को उदयपुर में धारा- 144 लागू होने के बावजूद कोर्ट चौराहे पर उग्र प्रदर्शन किया।

प्रदर्शन के दौरान उत्पाती कोर्ट के पीछे की बिल्डिंगों से छत पर चढ़े और कोर्ट के मुख्य द्वार पर भगवा झंडा  फहराया। काफी देर तक झंडा फहराकर प्रदर्शन किया। इस दौरान कुछ उत्पातियों ने छत से पुलिस पर पत्थर फेंके। तीन साल पहले अदालत की खुली तौहीन करने वाली इस घटना के कितने आरोपियों को अदालत ने सजा सुनाई। इस घटना के पीछे जो दक्षिणपंथी और फासीवादी ताकतें थीं क्या अदालत आज तक उनकी पहचान कर पायी। यह घटना दरअसल अदालत को भगवा रंग में रंगने का संदेश देने के लिए ही कराई गई थी। उदयपुर में तीन साल पहले जमा हुई वह भीड़ सिर्फ भीड़ नहीं थी बल्कि वे सेवक थे जो अदालतों को अपने अनुसार चलाने का संकेत देना चाहते थे।

..और ये सेवक राष्ट्रीय ध्वज का कितना सम्मान करते हैं उसका अंदाजा भी उदयपुर की घटना से होता है। उदयपुर में कोर्ट की ब्लिडिंग से राष्ट्रीय ध्वज नोचकर फेंक दिया गया था, और उसकी जगह भगवा झंडा लगाया गया था। याद कीजिए, भारत में ब्रिटिश हुकूमत के दौरान पैदा हुए आरएसएस ने सिर्फ चंद साल पहले ही राष्ट्रीय ध्वज लगाया, इससे पहले वे भगवा ध्वज को ही प्रणाम करते थे। उनकी शाखाओं में आज भी भगवा ध्वज को ही प्रणाम किया जाता है।

हरीश साल्वे साहब की काबिलियत

सुप्रीम कोर्ट में अर्णब के लिए खड़े होने वाले सीनियर वकील हरीश साल्वे की काबिलियत पर किसी को शक नहीं है। साथ ही सबसे अमीर वकील का भी तमगा उन्हें मिला हुआ है। लेकिन पाठकों को याद दिला दें कि बॉलीवुड के मशहूर एक्टर सलमान खान का केस साल्वे साहब ने ही लड़ा था। फुटपाथ पर सो रहे लोगों को अपनी कार से कुचलने का आरोप सलमान पर लगा था। सलमान ने उस समय शराब पी रखी थी। यह मामला हाई कोर्ट पहुंचा था। सलमान को सजा सुनाई गई। लेकिन हरीश साल्वे के नेतृत्व में कई सौ वकीलों की फौज सलमान के लिए लगी और सलमान को जेल जाने की बजाय घर पहुंचा दिया। यह मामला अभी भी एक उदाहरण बना हुआ है कि अगर अच्छा और महंगा वकील आपके पास हो तो वह आपको जेल जाने से बचा सकता है, बेशक आपका अपराध कैसा भी हो। इस घटनाक्रम से पता चलता है कि आखिर क्यों आम जनता का भरोसा अदालतों पर कम होता जा रहा है।

हरीश साल्वे मुकेश अंबानी से लेकर टाटा तक के केस लड़ते हैं। 2014 में नरेन्द्र मोदी ने प्रधानमंत्री पद संभाला था। 25 जनवरी 2015 को हरीश साल्वे को पद्मभूषण सम्मान देने की घोषणा की गई थी। बताते हैं कि हरीश साल्वे को यह सम्मान देने के लिए उच्चस्तर पर विशेष आग्रह था। हरीश साल्वे की जीवनी पर कोई किताब अब तक नहीं लिखी गई है लेकिन हो सकता है कि उसमें कहीं वो खुद या कोई और जिक्र करे कि कभी किसी गरीब का केस हरीश साल्वे ने एक रुपया लेकर लड़ा हो। यह कहानी तो पढ़ने को मिल जाएगी कि हाई प्रोफाइल कुलभूषण जाधव का केस अंतरराष्ट्रीय अदालत में उन्होंने मात्र एक रुपया फीस लेकर लड़ा था। जाधव पाकिस्तान की जेल में बंद हैं। गरीब का केस लड़ने वाले चोटी के वकीलों की संख्या इस देश में बहुत मामूली है।

एक महीने बाद कप्पन की आजादी पर बात क्यों

केरल के पत्रकार सिद्दीक कप्पन के मामले की आज सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई।  कोर्ट ने कप्पन को गिरफ़्तार करने के मामले में यूपी सरकार को नोटिस जारी कर जवाब माँगा है। उसने केरल श्रमजीवी पत्रकार संघ की याचिका पर पत्रकार कप्पन की रिहाई का आदेश नहीं सुनाया है। सिद्दीक कप्पन की पत्नी और वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कप्पन के मामले में जस्टिस चंद्रचूड़ से अर्णब की आजादी के संदर्भ में सवाल उठाया था। पत्रकार सिद्दीक कप्पन जब हाथरस में दलित लड़की से रेप और हत्या के मामले में रिपोर्टिंग करने पहुंचे तो यूपी पुलिस ने उन्हें 5 अक्तूबर को गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद यूपी पुलिस ने इसे अंतरराष्ट्रीय साजिश बता डाला और कहा कि सिद्दीक कप्पन पीपुल्स फ्रंट आफ इंडिया (पीएफआई) से जुड़े हैं और पीएफआई हाथरस को लेकर चल रहे आंदोलन की फंडिंग कर रहा है। लेकिन अगले ही दिन मामला फुस्स हो गया। केरल श्रमजीवी पत्रकार संघ सामने आया और उसने बताया कि सिद्दीक कप्पन उसके संगठन के सचिव हैं, वे बाकायदा पत्रकार हैं और रिपोर्टिंग के लिए हाथरस गए थे। उसने बाकी आरोपों को खारिज कर दिया। इसके बाद केरल श्रमजीवी पत्रकार संघ मामले को अदालत ले गया। यही वह अदालत है जिसने इस याचिका की सुनवाई चार हफ्ते बाद करने का निर्देश जारी किया था। अर्णब की आजादी की चिन्ता करने वाली अदालत को उस समय कप्पन की व्यक्तिगत आजादी और अभिव्यक्ति की आजादी का ध्यान नहीं आया।

 तरुण विजय के ट्वीट किस श्रेणी में आते हैं

बढ़ते प्रदूषण की वजह से नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने दिवाली के मौके पर पटाखे न छुड़ाने और इस पर पाबंदी लगाने का आदेश तमाम राज्य सरकारों ने दिया था। दिल्ली से सटे हरियाणा और यूपी ने फौरन पटाखे छुड़ाने पर पाबंदी का आदेश जारी कर दिया। लेकिन दिवाली की रात आरएसएस विचारक और कथित पत्रकार तरुण विजय ने जो ट्वीट किये वो एनजीटी जैसी अदालत का अपमान है। तरुण विजय ने लिखा – दिल्ली में पिछले 35 सालों में पटाखों की तेज आवाजें इससे पहले कभी नहीं सुनी थीं।। अगर आप सुनना चाहते हैं तो यह आवाज बहुत तेज और स्पष्ट है। जय भवानी, जय मां काली। उसी रात एक और ट्वीट में उन्होंने लिखा – बहादुर दिवाली।  तरुण विजय का एक और ट्वीट देखिए – पटाखों पर पाबंदी फेल हो गई, यह अवमानना के लायक ही है। 

तरुण विजय के ये ट्वीट क्या बताते हैं…यह सीधे-सीधे एक न्यायिक संस्था का अपमान है या नहीं। संघ विचारक के इन बयानों के आधार पर क्या उन पर कोर्ट की अवमानना का मुकदमा नहीं चलाया जाना चाहिए। लेकिन मैं व्यक्तिगत रूप से इसके खिलाफ हूं। जो आजादी कुणाल कामरा को हासिल है, वही तरुण विजय को भी है। लेकिन अर्णब गोस्वामी को मिली आजादी सुप्रीम कोर्ट की नजर में ज्यादा महत्वपूर्ण है।

हालांकि अर्णब गोस्वामी अपने चैनल पर बैठकर जिस तरह की एकतरफा और मनगढ़ंत पत्रकारिता कर रहे हैं, वह विवाद का अलग विषय है। लेकिन सुप्रीम अदालत के पास अपनी साख बचाने का अभी भी मौका है। उसे चाहिए कि वह कुणाल कामरा के मामले में दायर याचिकाओं को खारिज कर दे।

प्रेस डे की विडम्बना

आज का दिन पत्रकार कप्पन को समर्पित किया जाना चाहिए। 41 दिनों से जेल में बंद इस पत्रकार की व्यक्तिगत आजादी पर बात क्यों नहीं करता सुप्रीम कोर्ट। कप्पन को अपने वक़ील तक से मिलने की इजाज़त नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने आज उनके मामले में यूपी सरकार को महज़ नोटिस किया है। उनकी रिहाई का आदेश नहीं दिया।

(यूसुफ किरमानी वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

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