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सलमान खुर्शीद का सीजेआई को पत्र, पूछा- क्या न्यायिक व्यवस्था में कोई संकट है?

पूर्व कानून मंत्री और उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठ वकील सलमान खुर्शीद ने चीफ जस्टिस बोबडे को पत्र लिखकर कहा है कि ऐसे कई जज हैं, जिनकी न्यायिक समझ हमें परेशान करती है, लेकिन वहीं ऐसे जज और भी ज्यादा हैं जो संवेदना, बौद्धिक ईमानदारी, व्यक्तिगत नैतिकता की सभी उम्मीदों से आगे निकल गए हैं।

सभी संस्थानों की तरह, कोर्ट भी उसमें होने वाले लोगों से बड़ा है। खुर्शीद ने सवाल उठाया है कि क्या न्यायिक व्यवस्था में कोई दिक्कत है? खुद जवाब भी दिया है कि इस बात का खंडन नहीं किया जा सकता, लेकिन सिर्फ कोर्ट ही क्यों, क्या हमारा पूरा समाज तनाव में नहीं है? राज्य को स्थिर रखने में कोर्ट अहम किरदार निभा सकते हैं।

हिंदी क्विंट में प्रकाशित पत्र में खुर्शीद ने कहा है कि संवैधानिक सरकार का बहुमत सहारा होता है, लेकिन अगर हम संविधान को समझें तो सिर्फ वहीं एक सहारा नहीं है। अगर हम समझ पाएं कि संवैधानिक कोर्ट कितने जरूरी हैं। हम संविधान की कसम खाते हैं और राष्ट्रीय ध्वज को देश की इज्जत के तौर पर रखते हैं, लेकिन देश भक्ति के ये सभी लैंडमार्क बेमतलब रह जाएंगे, अगर न्यायपालिका में विश्वास नहीं रहेगा।

पत्र में खुर्शीद ने कहा है कि मैं जानता हूं कि हमारे बीच कुछ ऐसे लोग हैं जो न्यायिक आचरण और प्रदर्शन में कमी बर्दाश्त नहीं कर सकते, लेकिन एक बात ये भी है कि कोई परफेक्ट नहीं होता और यही बात न्यायपालिका के साथ भी है, क्योंकि वो भी समाज का प्रतिबिंब है।

न्यायपालिका के लिए तय किए गए उच्च मानक असल में वो सिद्धांत हैं, जिन पर सहमति बनी है, लेकिन शायद इससे हर कमी का पता न चले जब तक कि अंदरूनी व्यवस्था से प्रतिक्रिया न आए। काफी समय से कई मामलों पर सवाल उठ रहे हैं, लेकिन हमें साफ करना पड़ेगा कि कितने मुद्दों पर बात की जा सकती है कि सिस्टम को क्षति न पहुंचे।

पत्र में कहा गया है कि पूर्व चीफ जस्टिस रंजन गोगोई के राज्य सभा के लिए नामित होने की खबर सामने आने के बाद से लगातार आलोचना और रोष का माहौल बना हुआ है। गोगोई से निकटता के लिए पहचाने जाने वाले कई पूर्व सुप्रीम कोर्ट के जजों ने सार्वजनिक रूप से अभूतपूर्व तरीके और साफदिली से इस पर बात की है।

मेरे कई वकील सहकर्मियों ने भी इस पर निराशा जताई है। इनमें से कई का पूर्व सीजेआई से अब सांसद के तौर पर सामना होगा। उन्हें अब पता चलेगा कि जब दूसरे आपका आकलन करते हैं, तो कैसा लगता है। जाहिर तौर पर गोगोई ने इस मामले पर अपने विचार रख दिए हैं। इस पर उनके विस्तृत विचार हमें कुछ समय में जरूर पता लगेंगे।

पत्र में कहा गया है कि एक इंटरव्यू में रंजन गोगोई ने लुटियन वकीलों की एक लॉबी के न्यायिक स्वतंत्रता के लिए अभिशाप होने के संकेत दिए। इसके अलावा उन्होंने कहा कि कई मुखर जजों को काफी कुछ के बारे में जवाब देना पड़ेगा। मुझसे न्यूज एजेंसियों ने इस मामले पर कुछ कहने को कहा था। मेरा जवाब था कि कोर्ट मेरी समझ में इतना ज्यादा बहुमूल्य और अद्वितीय है कि उसको क्षति पहुंचाने की इजाजत नहीं दी जा सकती।

कोर्ट को मानने वालों के लिए कुछ मुद्दे परेशान करने वाले हो सकते हैं, लेकिन ऐसी कई बातें हैं जिससे वो न्याय का मंदिर स्थापित होता है। इसलिए मैंने जानबूझकर इस मामले पर बयान देने से मना कर दिया, लेकिन इस पर कई जिम्मेदार और आदरणीय लोगों के बयान आने के बाद मैं, नागरिक कानून मंत्री के तौर पर चुप नहीं रह सकता।

जनता की समझ या फिर न्यायिक समुदाय के बीच जो समझ है, वो प्रतिक्रिया का इंतजार कर रहे हैं। मैं इन मामलों को ध्यान में रखते हुए न्यायिक परिवार के प्रमुख होने के तौर पर आपसे इन दिक्कतों का संज्ञान लेने का अनुरोध करता हूं और न्यायिक स्वतंत्रता पर उठ रहे सवालों को भी देखने की गुजारिश करता हूं। मैं केवल अपनी आत्मा की आवाज यहां साझा कर रहा हूं, शायद आप शांत हैं, लेकिन ये आपको भी परेशान कर रहा है।

इसके पहले उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने कहा था कि जस्टिस रंजन गोगोई ने सेवानिवृत्ति के तुरंत बाद राज्यसभा की सदस्यता के केंद्र सरकार के प्रस्ताव को स्वीकार करने और आयोध्या, सबरीमाला, राफेल जैसे मामलों में केंद्र सरकार के पक्ष में फैसले देने के बाद, अपना बचाव करते हुए अपने पुराने सहकर्मियों, जैसे जस्टिस एके पटनायक, जस्टिस जे चेलमेश्वर, जस्टिस एम लोकुर, जस्टिस के जोसेफ और जस्टिस एपी शाह आदि और जिन्हें वह वकीलों की ‘लॉबी’ कहते हैं, जिनमें उन्होंने मुझे और श्री कपिल सिब्बल को शामिल किया है, पर आक्रामक होकर हमला किया है।

उन्होंने मुझ पर सीबीआई निदेशक के रूप में आलोक वर्मा की नियुक्ति पर सवाल उठाने और बाद में आधी रात के तख्तापलट में उनकी बर्खास्तगी, जिसमें उन्हें हटा दिया गया, पर सवाल उठाने का आरोप लगाया।

तथ्य यह है कि हम, रंजीत सिन्हा की सेवानिवृत्ति के बाद राकेश सिन्हा को सीबीआई का कार्यवाहक निदेशक नियुक्त किए जाने और प्रधानमंत्री, लोकसभा में नेता विपक्ष और भारत के मुख्य न्यायाधीश की टीम के जरिए सीबीआई का नियमित निदेशक क्यों नहीं नियुक्त किया गया, इन सवालों को लेकर कोर्ट में गए थे।

हमारी याचिका के बाद ही सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को नियमित निदेशक नियुक्त करने के लिए मजबूर किया और आलोक वर्मा को नियुक्त किया गया था। हमने कभी भी उनकी नियुक्ति पर सवाल नहीं उठाया, बल्कि उस बैठक के मिनट की प्रतियां मांगी, जिसमें उन्हें चुना गया था। इसके बाद, जब आलोक वर्मा को हटाया गया तो हमने उन्हें हटाने को चुनौती दी।

अपने सहयोगियों जस्टिस मदन लोकुर और कुरियन जोसेफ के बारे में गोगोई कहते हैं कि वे महत्वाकांक्षाओं में विफल रहे, हालांकि वे उनके अच्छे दोस्त थे। गोगोई ने अपने सहकर्मियों जस्टिस मदन लोकुर और जस्टिस कुरियन जोसेफ पर इतनी लारवाही से विफल महत्वाकांक्षाओं का आरोप लगाते हैं, जबकि उन्होंने उच्चतम न्यायालय में छह वर्ष से ज्याद वक्त तक उनके साथ काम किया और जनवरी 2018 की प्रेस कॉन्फ्रेंस में उनके साथ शामिल थे।

जब वे गोगोई के बाद सुप्रीम कोर्ट में नियुक्त किए गए थे, तभी वे जानते थे कि गोगोई मुख्य न्यायाधीश बनेंगे और वे नहीं। सरकार ने यह तोहफा केवल उन्हें ही दिया, तब तक विफल महत्वाकांक्षाओं का सवाल कहां उठता है?

जस्टिस गोगोई ने मद्रास और दिल्ली उच्च न्यायालयों मुख्य न्यायाधीश रह चुके जस्टिस एपी शाह के खिलाफ परोक्ष रूप से गंभीर आरोप लगाया है। गोगोई का कहना है कि जस्टिस एपी शाह के खिलाफ ‘एक अभिनेत्री’ के संबंध में, संपत्ति के दो मामलों में शिकायतें थीं। उन्होंने कहा कि ये रिकॉर्ड पर है और अपने साक्षात्कारकर्ता से आग्रह किया कि इन जानकारियों को वह आरटीआई (जाहिर है कि सुप्रीम कोर्ट से) के जरिए मांग लें।

उन्होंने यह नहीं बताया कि 5 अगस्त 2019 को, सुप्रीम कोर्ट के एक रिपोर्टर धनंजय महापात्रा ने अपने एक लेख में गोगोई द्वारा लगाए गए इन आरोपों का उल्लेख किया था, जिसमें उन्होंने कहा था कि मद्रास हाईकोर्ट के कुछ वकीलों की शिकायत में ये आरोप शामिल थे, जो कि उन्होंने उस समय के भारत के मुख्य न्यायाधीश को भेजी थी, जिसकी वजह से उस समय जस्टिस शाह की सुप्रीम कोर्ट में नियुक्ति रोक दी गई थी। हालांकि, जस्टिस शाह ने सभी आरोपों का खंडन किया था।

जस्टिस गोगोई की जस्टिस शाह के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी न केवल निराधार और मानहानिकारक है, बल्कि अपमानजनक भी है और परोक्ष रूप से लगाए गए हैं। यह दीवानी के साथ-साथ आपराधिक मानहानि क मामला भी है।

गोगोई केवल सेवानिवृत्ति के बाद केंद्र सरकार की ओर से दी गई राज्यसभा सीट का उपहार स्वीकार करने के दोषी नहीं हैं, बल्कि वह दोषी भी रहे हैं, जैसा कि जस्टिस लोकुर ने हाल के एक लेख में विस्तार से बताया है, जिसमें तीन बहुत ही खराब काम हैं, जिन्होंने न्यायपालिका की स्वतंत्रता से समझौता किया।

सीलबंद न्यायशास्त्र का उद्भव, जिसके जरिए, सीलबंद लिफाफों में अहस्तक्षरित नोटों पर उन्होंने बार-बार सरकार से सूचनाएं मांगी, उन्हें स्वीकार किया, उन सूचनाओं का उपयोग किया, (जिन्हें विपक्षी पार्टियों के साथ साझा तक नहीं किया गया।) और जिनमें से कई तथ्यात्मक रूप से गलत भी रहे (जैसा कि राफेल मामले में सामने आया था)।

इस सीलबंद न्यायशास्त्र ने कानून और प्राकृतिक न्याय के हर सिद्धांत का उल्लंघन किया है। अदालत को दूसरे पक्ष से छुपाकर फैसले करने की अनुमति दी, दूसरे पक्ष को फैसले का आधार रही सूचनाओं की जानकारी तक नहीं दी गई। 

गोगोई ने सरकार की इच्छा पर मामलों की सुनवाई/सुनवाई न करने की प्राथमिकता तय किया। सरकार की इच्छा पर न्यायाधीशों की नियुक्ति और स्थानांतरण किया। मुख्य न्यायाधीश बनने के और सुप्रीम कोर्ट की एक कर्मचारी का यौन उत्पीड़न करने के बाद गोगोई सरकार की गोद में बैठ गए और न केवल अपनी पूर्ववर्ती की तरह मास्टर ऑफ रोस्टर की अपनी शक्ति का दुरुपयोग किया, बल्कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता को नष्ट करने के लिए उपरोक्त चीजें भी की।

आखिर में, वह वही निकले, जो अर्घ्य सेन गुप्ता ने अपने हालिया लेख में उन्हों कहा था, ‘जज के भेष में विषाणु’। उन्हें इतिहास में एक ऐसे मुख्य न्यायाधीश के रूप में याद किया जाएगा, जिन्होंने माननीय सुप्रीम कोर्ट की प्रतिष्ठा को कम कर उसे एक कार्यकारी अदालत बना दिया।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और कानूनी मामलों के जानकार हैं। वह इलाहाबाद में रहते हैं।)

This post was last modified on April 11, 2020 9:53 am

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