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नारदा केस: केंद्र को एक और झटका, कलकत्ता हाईकोर्ट ने दी टीएमसी नेताओं को अंतरिम जमानत

कलकत्ता हाईकोर्ट की पांच न्यायाधीशों की पीठ ने सालिसिटर जनरल तुषार मेहता की यह दलील नहीं मानी कि टीएमसी के चारों नेता बहुत प्रभावशाली हैं और यदि उन्हें जमानत दी जाती है तो वे नारदा स्टिंग मामले को प्रभावित कर सकते हैं और पीठ ने शुक्रवार को तृणमूल कांग्रेस के चारों नेताओं- फिरहाद हकीम, मदन मित्रा, सुब्रत मुखर्जी और सोवन चटर्जी को अंतरिम जमानत दी, जो नारदा मामले में सीबीआई के 17 मई के गिरफ्तारी के बाद से न्यायिक हिरासत में हैं।

सीबीआई की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अंतरिम जमानत देने का विरोध करते हुए कहा कि आरोपी लंबित मुकदमे को प्रभावित करने के लिए पर्याप्त प्रभावशाली हैं। एसजी ने यह भी कहा कि आरोपियों में जनता की भावनाओं को भड़काकर भीड़ इकट्ठा करने की क्षमता है जो जांच या मुकदमे को प्रभावित कर सकती है। पीठ ने इस मौके पर सॉलिसिटर जनरल से पूछा कि क्या गिरफ्तार किए गए नेताओं को हिरासत में रखना आवश्यक है- उनमें से दो कैबिनेट मंत्री और एक विधायक है, जब उन्हें 4 साल से अधिक समय तक जांच के दौरान गिरफ्तार नहीं किया गया था।

पीठ के दूसरे वरिष्ठ न्यायाधीश आईपी मुखर्जी ने पूछा कि, सॉलिसिटर जनरल हम एक अवलोकन करना चाहते हैं। जांच 2017 में शुरू हुई। आरोपियों को जांच के दौरान गिरफ्तार नहीं किया गया। आम तौर पर गिरफ्तारी जांच को सुविधाजनक बनाने के लिए होती है। वे पहले की तरह ही शक्तिशाली हैं। अब गिरफ्तारी क्यों?” न्यायमूर्ति मुखर्जी ने सॉलिसिटर जनरल से पूछा कि 4 साल से अधिक समय से जांच के दौरान गिरफ्तार नहीं किया गए टीएमसी नेताओं को अब हाउस अरेस्ट में क्यों रखा जाना चाहिए, जब उन्हें महामारी के दौरान सार्वजनिक कार्य करने की आवश्यकता है।

कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश राजेश बिंदल, जस्टिस आईपी मुखर्जी, जस्टिस हरीश टंडन, जस्टिस सौमेन सेन और जस्टिस अरिजीत मुखर्जी की पीठ ने गिरफ्तार नेताओं द्वारा दायर याचिकाओं पर विचार करने के बाद यह आदेश पारित किया, जिसमें खंडपीठ के 17 मई के चार टीएमसी नेताओं के जमानत पर रोक लगाने के आदेश को वापस लेने (रिकॉल आवेदन) की मांग की गई थी।

पीठ ने शर्त रखी कि चारों नेता नारदा मामले में लंबित मुकदमे पर प्रेस बयान नहीं देंगे या मीडिया में चर्चा नहीं करेंगे। पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि अंतरिम जमानत मामले में अंतिम आदेश के अधीन होगी और अगर सीबीआई अपनी याचिका में सफल होती है तो वह रद्द हो जाएगी। पीठ ने दो लाख रुपये के एक निजी बॉन्ड भरने और इतनी ही राशि के दो जमानतदार पेश करने की शर्त पर जमानत देने का फैसला सुनवाया। बुलाए जाने पर उन्हें वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए जांच में शामिल होना होगा।

सॉलिसिटर जनरल यह भी चाहते थे कि अदालत एक शर्त रखे कि यदि आरोपियों को जांच या मुकदमे के लिए पेश होने के लिए कहा जाए तो आरोपी भीड़ इकट्ठा न करें या सार्वजनिक विरोध न करें। इसका आरोपी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी ने विरोध किया।

डॉ. सिंघवी ने कहा कि, “भीड़ इकट्ठा होने की स्थिति के संबंध में यदि यह अदालत आदेश देती है, तो यह माना जाएगा कि उन्होंने भीड़ इकट्ठा की थी। यह ऐसा पूछने जैसा है कि क्या आपने अपनी पत्नी को मारना बंद कर दिया है। इस तरह की प्रस्तुतियां केवल प्रेस के लिए उन्हें अपमानित करने के लिए की जाती हैं।आरोपियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा ने भी सुझाव दिया कि उन्हें वीसी के माध्यम से जांच के लिए पेश होने के लिए कहा जा सकता है।

आरोपी की ओर से पेश एक अन्य वकील, वरिष्ठ अधिवक्ता कल्याण बंद्योपाध्याय ने कहा कि उन्होंने सीबीआई द्वारा दायर याचिका को सुनवाई योग्य बनाए रखने पर प्रारंभिक आपत्तियां जताई हैं- जो निचली अदालत से मामले को स्थानांतरित करने की मांग करती है और यह कहने की मांग करती है कि जमानत की सुनवाई भीड़ का दबाव के कारण खराब हुई थी। पीठ ने उनसे कहा कि सभी मुद्दे बहस के लिए खुले हैं।

पीठ मुख्य मामले की सुनवाई सोमवार 31 मई, दोपहर 12 बजे से करेगी। पृष्ठभूमि कलकत्ता उच्च न्यायालय के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश राजेश बिंदल और न्यायमूर्ति अरिजीत बनर्जी की खंडपीठ ने 21 मई को तृणमूल कांग्रेस के चार नेताओं – फिरहाद हकीम, सुब्रत मुखर्जी, मदन मित्रा और सोवन चटर्जी की जमानत से संबंधित मामले की सुनवाई कर रहे थे, जिन्हें नारदा घोटाला मामले में सीबीआई ने उनकी गिरफ्तारी के बाद से 17 मई से हिरासत रखा है।

इस मामले को एक बड़ी पीठ को भेजा गया था। एसीजे बिंदल ने बाद में मामले की सुनवाई के लिए एसीजे बिंदल, और जस्टिस आईपी मुखर्जी, हरीश टंडन, सौमेन सेन और अरिजीत बनर्जी की पांच जजों की बेंच का गठन किया।

इसके पहले जस्टिस बिंदल और जस्टिस अरिजीत बनर्जी की खंडपीठ ने 17 मई को कोकाटा में विशेष सीबीआई अदालत द्वारा तृणमूल कांग्रेस के चार नेताओं फिरहाद हकीम, मदन मित्रा, सुब्रत मुखर्जी और सोवन चटर्जी को दी गई जमानत पर रोक लगा दी थी। इन्हें 17 मई को सीबीआई ने नाटकीय रूप से गिरफ्तार किया था।

खंडपीठ ने सीबीआई द्वारा भेजे गए एक पत्र के आधार पर नाटकीय देर रात सुनवाई के बाद स्थगन आदेश पारित किया था। इसमें मुख्यमंत्री और कानून मंत्री के नेतृत्व में टीएमसी नेताओं की गिरफ्तारी के खिलाफ बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शनों द्वारा निचली अदालत पर “अभूतपूर्व भीड़ दबाव” का हवाला देते हुए मामले को हाईकोर्ट में स्थानांतरित करने की मांग की गई थी।

अगले दिन, टीएमसी नेताओं ने इस आधार पर स्थगन आदेश को वापस लेने की मांग करते हुए आवेदन दायर किया कि यह उन्हें नोटिस जारी किए बिना पारित किया गया था।

पीठ ने 19 मई को सीबीआई के लिए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और गिरफ्तार टीएमसी नेताओं के लिए वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ अभिषेक मनु सिंघवी और सिद्धार्थ लूथरा को सुना था। सिंघवी और लूथरा ने इस आधार पर अंतरिम जमानत के लिए प्रार्थना की थी कि आरोपी वृद्ध व्यक्ति हैं और बीमार हैं। पीठ को बताया गया कि गिरफ्तार किए गए तीन लोगों को अस्पताल में भर्ती कराया गया है और उनमें से एक सोवन चटर्जी अभी भी जेल में है।

21 मई को, कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश राजेश बिंदल और न्यायमूर्ति अरिजीत बनर्जी की कलकत्ता उच्च न्यायालय की खंडपीठ में विभाजन के बाद, तृणमूल कांग्रेस के चार नेताओं – फिरहाद हकीम, सुब्रत मुखर्जी, मदन मित्रा और सोवन चटर्जी की जमानत से संबंधित मामले की सुनवाई कर रहे थे, जिन्होंने नारद घोटाला मामले में सीबीआई द्वारा उनकी गिरफ्तारी के बाद से 17 मई से हिरासत में हैं, इस मामले को एक बड़ी पीठ को भेजा गया था। न्यायमूर्ति बनर्जी ने अंतरिम जमानत की अनुमति देते हुए एक आदेश पारित किया था, जबकि एसीजे बिंदल असहमत थे और कहा था कि गिरफ्तार किए गए चार टीएमसी नेताओं को नजरबंद रखा जाना चाहिए, जिसके कारण संदर्भ हुआ। तदनुसार, कुछ समय के लिए, आरोपियों को नजरबंद रखने का निर्देश दिया गया था और उन्हें फाइलों तक पहुंचने, वीडियो-कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से अधिकारियों से मिलने की अनुमति दी गई थी ताकि उन्हें अपने कार्यों का निर्वहन करने की अनुमति मिल सके।

खंडपीठ ने हाउस अरेस्ट के आदेश पर रोक लगाने के सीबीआई के अनुरोध को खारिज कर दिया था। इसने टीएमसी नेताओं के वकीलों द्वारा अंतरिम जमानत पर रिहा करने के अनुरोध को भी अस्वीकार कर दिया था। सीबीआई ने हाउस अरेस्ट की अनुमति के आदेश को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। हालांकि, सीबीआई ने 25 मई को टीएमसी नेताओं को हाउस अरेस्ट करने की अनुमति देने वाले कलकत्ता हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका वापस ले लिया था।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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This post was last modified on May 28, 2021 4:20 pm

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