Wednesday, February 8, 2023

बहराइच से ख़ास रपट: भ्रष्ट प्रबंधन और अमर उजाला ने मिलकर अध्यापकों के सिर मढ़ दिया नक्सल-देशद्रोही होने का आरोप

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बहराइच/इलाहाबाद। यूपी के बहराइच में स्थित एक डिग्री कॉलेज में भी जेएनयू जैसा मामला सामने आया है। जहां प्रबंधन तंत्र ने कॉलेज के चार अध्यापकों और एक छात्र पर नक्सली और राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में शामिल होने का आरोप लगाया। मामला सूबे के राज्यपाल तक पहुंच गया। लेकिन जब जांच हुई तो हकीकत कुछ और ही सामने आयी। इसमें मीडिया और खास कर अमर उजाला की भूमिका सवालों के घेरे में रही। जिसमें सत्य को सामने लाने की जगह उसने प्रबंधन तंत्र का साथ दिया।

आपको बता दें कि पूरे बहराइच जिले में 3 गवर्नमेंट एडेड डिग्री कॉलेज हैं। पहला ठाकुर हुकुम सिंह कृषि महाविद्यालय, दूसरा एक महिला महाविद्यालय और तीसरा एक और कॉलेज है। इसके अलावा 44 एडेड डिग्री कॉलेज हैं। यह मामला ठाकुर हुकुम सिंह कृषि महाविद्यालय का है। प्रोफेसर आलोक प्रताप सिंह, आशुतोष शुक्ला, डॉ जीके शुक्ला और विवेक जायसवाल उच्चतर शिक्षा सेवा आयोग द्वारा इसी कॉलेज में नियुक्त किए गए हैं।

सहायक अध्यापक आशुतोष शुक्ला विवाद की शुरुआत का उल्लेख करते हुये बताते हैं, “हम 46 युवा असिस्टेंट प्रोफेसर साथियों ने मिलकर आलोक प्रताप सिंह के 11 अक्टूबर, 2020 को होने वाले जिला महामंत्री के चुनाव के सिलसिले में बैठक की। उस बैठक में तीनों सरकारी महाविद्यालयों के शिक्षकों ने भाग लिया। आलोक प्रताप सिंह जी के समर्थन में 90 प्रतिशत बहुमत था। और उनकी जीत पक्की थी। लेकिन पहले कॉलेज के मैनेजमेंट कमेटी के अध्यक्ष जटाशंकर सिंह के बेटे व कॉलेज में अवैध रूप से क्लर्क के पद पर तैनात देवेंद्र प्रताप सिंह ‘छोटू’ ने 10 अक्टूबर को जिला महामंत्री प्रत्याशी आलोक प्रताप सिंह को चेतावनी दी कि आप चुनाव में बैठ जाइये। आलोक प्रताप ने चुनाव में बैठने से साफ मना कर दिया। अगले दिन यानि 11 अक्टूबर को देवेंद्र प्रताप सिंह ने 10-15 लोगों को साथ लेकर आलोक प्रताप सिंह पर जानलेवा हमला कर दिया”।

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सहायक अध्यापक आशुतोष शुक्ला जिन पर प्रबंधन ने आरोप लगाया था

वह आगे बताते हैं कि हम चार लोगों यानि मैं आशुतोष शुक्ला, जीके शुक्ला, विवेक जायसवाल और आलोक प्रताप सिंह ने हमले का विरोध किया। हमारे पक्ष में उत्तर प्रदेश शिक्षक संघ के लोग खड़े हो गये। 12 अक्टूबर को मेरठ यूनिवर्सिटी, कानपुर यूनिवर्सिटी, गोरखपुर यूनिवर्सिटी, सिद्धार्थनगर यूनिवर्सिटी, इलाहाबाद यूनिवर्सिटी और आगरा यूनिवर्सिटी सबने लेटर जारी करके कहा कि ऐसे प्रबंधन तंत्र को तुरंत बर्खास्त किया जाये। लेकिन अवध यूनिवर्सिटी के जो अध्यक्ष हैं वो हमारे यूनिवर्सिटी के प्रबंधक से परिचित हैं। उन्होंने किसी तरह सब मैनेज कर दिया।

उनका कहना था कि 13 अक्टूबर को शिक्षणेत्तर कर्मचारी संघ, अंशकालिक शिक्षक संघ (जिन्हें मैनेजमेंट रखता है) आदि ने मिलकर चारों शिक्षकों आशुतोष शुक्ला, जीके शुक्ला, विवेक जायसवाल और आलोक प्रताप सिंह के ख़िलाफ़ राष्ट्रद्रोही नक्सलवादी होने और कई फर्जी आरोप लगाकर उसे माननीय राज्यपाल महोदय को भेज दिया। साथ में बतौर छात्र सूफियान और एआईएसएफ का नाम भी डाल दिया गया। राज्यपाल महोदय द्वारा इस बारे में विश्वविद्यालय को जांच सौंपी गई, और कहा गया कि सबूत दीजिये आरोप लगाने से तो कुछ नहीं होता है। तो इसकी जांच के लिये एक कमेटी बनी जज साहेब के नेतृत्व में लेकिन उनकी कोरोना से मौत हो गई।

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आशुतोष शुक्ला द्वारा दर्ज किया गया एफआईआर

उनका कहना था कि दूसरी कमेटी ने क्या रिपोर्ट दिया यह नहीं पता पर हां उसमें कोई साक्ष्य वगैरह नहीं था। इस तरह से वह यूनिवर्सिटी तक फिर लौटकर आ गया। फिर प्रबंधन कमेटी के सदस्य सत्यदेव सिंह की अध्यक्षता में तीन लोगों की कमेटी बनाई गई। जिसमें अशोक श्रीवास्तव जो कि बड़े बाबू के पद से रिटायर हैं और प्रबंधन कमेटी के सदस्य हैं, और एक रावत सर जो कि एसोसिएट प्रोफेसर हैं शामिल थे। इस तरह कमेटी में दो मैनेजमेंट के लोग और एक एसोसिएट प्रोफेसर शामिल थे। कमेटी ने आरोप लगाने वाले सब लोगों से कहा कि आप लोग साक्ष्य लाइये। साक्ष्य के रूप में उनके पास कुछ नहीं था। सिर्फ़ 20 लोगों से उन्होंने लिखित में बयान पेश किया। जिसमें 80 प्रतिशत वही लोग थे जिन्होंने आरोप लगाया था। आरोप लगाने वालों के लिखित बयान और कुछ दबाव देकर कुछ छात्रों के बयान लिखवा लिये गये। लेकिन बयान तो साक्ष्य होता नहीं।

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सहायक अध्यापक आशुतोष शुक्ला का कहना था कि इसमें मीडिया ने भी बेहद पक्षपातपूर्ण भूमिका निभायी। इस मामले में वह अमर उजाला का नाम लेते हैं। अख़बार के ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई की बात करते हुये वो कहते हैं, “उन्होंने साक्ष्य क्रिएट करने के लिये अमर उजाला में फर्जी बयान छपवा दिया। हम लोग उस अख़बार के ख़िलाफ़ हाईकोर्ट में फर्जी बातें छापने के लिये केस दर्ज़ करवाने जा रहे हैं। अगर हमने बच्चों को कुछ ग़लत पढ़ाया है तो उसका ऑडियो-वीडियो कुछ तो दीजिये। 13 अक्टूबर को जब आलोक प्रताप सिंह पर हमला हुआ तो उस समय प्राचार्य विनय सक्सेना वहां मौके पर मौजूद थे”।

प्रबंधन कमेटी के सचिव का बयान

कृषि पीजी कॉलेज की प्रबंधन कमेटी के सचिव शिव प्रकाश यानि एसपी सिंह अपना पक्ष रखते हुये जनचौक को बताते हैं कि “महाविद्यालय में एआईएसएफ संगठन से जुड़े कुछ लोग और शिक्षकों में कुछ लोग छात्रों को कॉलेज का माहौल खराब करने वाली गतिविधियों के लिये प्रोत्साहित करते हैं। कॉलेज में जब कोई राष्ट्रीय कार्यक्रम होता है तो कुछ लोग विरोध में खड़े हो जाते हैं। उससे कुछ गुट बन जाते हैं। यह पढ़ाई लिखाई को क्षति पहुंचाता है”।

कौन प्रोत्साहित करता है इस सवाल के जवाब में एसपी सिंह कॉलेज के ही एक छात्र सूफियान ख़ान का नाम लेते हैं। वो कहते हैं कि हर राष्ट्रवादी कार्यक्रम के समय वो कुछ न कुछ अलग व्यू देने लगता है तो अन्य छात्रों में प्रतिक्रिया होने लगती है। यह हमारे लिये और विद्यालय के लिये नुकसानदेह है। आप जानते हैं कि अध्यापक भी कुछ अलग विचारधारा के होते हैं। तो इधर अमृत महोत्सव जैसे कई राष्ट्रीय कार्यक्रमों में विद्यालय भी शामिल रहा है। कुछ लोगों को यह सही नहीं लगता उन्हें लगता है यह राजनीतिक अड्डा बन गया है।

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सूफियान को पुरस्कार देते सचिव एसपी सिंह

एसपी सिंह हंसकर कहते हैं कि बस यही मामला है कोई बड़ी घटना नहीं हुई है। एक दिन जिलाधिकारी महोदय मतदाता शपथ ग्रहण करवा रहे थे। भारत सरकार की ओर से कोई शपथ का प्रोफॉर्मा है उसमें वो शपथ दिलवा रहे थे। उसमें भी इन लोगों ने आपत्ति की कि यह ठीक नहीं है लोकतंत्र ख़तरे में आ जाएगा इससे। जिलाधिकारी नाराज़ हुए।     

शिक्षक संघ चुनाव विवाद के बारे में पूछने पर वो कहते हैं, शिक्षक संघ का चुनाव कोई मसला नहीं है। हर चुनाव में पक्ष विपक्ष रहते हैं। इसमें तो ऐसा कोई मसला नहीं है। भारत सरकार के हर राष्ट्रीय कार्यक्रम में हमारा विद्यालय बढ़ चढ़कर हिस्सा लेता है। भारत सरकार ने अमृत महोत्सव शुरु किया तो उसमें हमारे विद्यालय के एनसीसी कैडर ने रक्तदान शिविर चलाया। 70 बच्चों ने ब्लड डोनेट किया।

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सूफियान को मिला पुरस्कार और उसकी सर्टिफिकेट

कॉलेज के सहायक अध्यापकों के ख़िलाफ़ राज्यपाल को पत्र लिखने और जांच कमेटी बैठने को अलग प्रकरण बताते हुये वो कहते हैं कि वो बहुत पहले हुआ था। वो सब समाप्त हो चुका है। वो सब भी इन्हीं गतिविधियों को लेकर हुआ है। आपस में फूट कराने वाले जो लोग हैं इसके विरोध में कर्मचारियों और लोगों ने लिखा पढ़ा था। उस मसले का जांच करके राज्यपाल को भेज दिया गया है। उसका अब यहां से कोई मतलब नहीं है।

प्रबंधन के आगे मजबूर प्राचार्य

प्राचार्य की स्थिति दो पाटों के बीच फंसे शख्स की हो गयी है। प्राचार्य विनय सक्सेना से इस संदर्भ में संपर्क किया तो उन्होंने कहा कि उन्हें कुछ नहीं मालूम। फिर मैंने 11 फरवरी को उनके वॉट्सअप पर एक स्थानीय अख़बार “प्रतिक्षण टाइम्स” की 11 जनवरी, 2022 की ख़बर की तस्वीर भेजी। और 13 फरवरी को मैंने सुबह कॉल किया तो उन्होंने अपने व्यस्त होने का हवाला दिया और बातचीत नहीं की। मैंने फिर उन्हें दोबारा दोपहर 2.42 पर कॉल किया। इस बार उनका कहना था कि वो रास्ते में हैं। वो गाड़ी में थे हॉर्न और गाड़ी की आवाज़ बैकग्राउंड से आ रही थी। इस बार उन्होंने बात भी की। अख़बारों में प्रकाशित ख़बरों के हवाले से मैंने उनसे पूछा कि पूरा मामला क्या है? इस पर प्रिंसिपल महोदय ने कहा कि अखबारों के पास अपने क्या प्रूफ हैं और उन्होंने किस आधार पर खबर प्रकाशित की है वह तो वही बात सकते हैं। लेकिन इस मामले में मेरे पास कुछ नहीं है।

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प्रधानाचार्य विनय सक्सेना जो प्रबंधन तंत्र के दबाव में हैं।

मैंने कहा कि मैं आपसे साक्ष्य नहीं मांग रहा। अख़बारों में निकला है कि ठाकुर हुकुम सिंह कृषि महाविद्यालय में नक्सली गतिविधि चल रही है तो प्रिंसिपल होने के नाते आपने क्या किया मैं वो जानना चाहता हूँ। इस पर मेरी बात काटते हुये उन्होंने कहा कि अख़बार में जिसका वर्जन निकला है आप उनकी प्रतिक्रिया लीजिये उसमें प्राचार्य का तो कुछ नहीं निकला है। जिन लोगों का छपा है आप उनसे बात कीजिये। उनकी प्रतिक्रिया लीजिये तो ज़्यादा बेहतर रहेगा। आप देख लीजिये प्राचार्य का कहीं कोई स्टेटमेंट नहीं है। मैंने पूछा कि प्राचार्य होने के नाते आपकी कोई जिम्मेदारी जवाबदेही है कि नहीं ऐसे कैसे आरोप लगाये जा रहे हैं कि आपके कॉलेज में राष्ट्रविरोधी गतिविधियां चल रही हैं? इस पर उन्होंने कहा कि हमारे यहां कार्यक्रम होते हैं उनकी रिपोर्टिंग होती है। आप ग्राउंड पर जाकर देखिये क्या करना है किससे मिलना है।     

छात्र सूफियान का पक्ष

इस बारे में जब हमने छात्र सूफियान से संपर्क किया और उनसे एसपी सिंह के आरोपों के बारे में पूछा तो सूफ़ियान ख़ान का कहना था कि विद्यालय में होने वाले तमाम कथित राष्ट्रीय कार्यक्रमों में न सिर्फ़ मैंने भागीदारी की है बल्कि खुद एसपी सिंह जी के हाथों से पुरस्कार भी ग्रहण किया है। अमृत महोत्सव कार्यक्रम में भी मैंने भाषण प्रतियोगिता में हिस्सा लिया और दूसरी रैंक हासिल की थी। कई कार्यक्रमों में खुद एसपी सिंह जी ने मुझे एप्रूसिएट किया है।

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सूफियान, छात्र, जिसे प्रबंधन तंत्र ने फंसाने की कोशिश की।

गौरतलब है कि सूफियान ख़ान एआईएसएफ के जिला (बहराइच) अध्यक्ष हैं। सूफियान के मुस्लिम होने के नाते स्थानीय अख़बार प्रतिक्षण टाइम्स ने महाविद्यालय में सिमी के स्लीपर सेल को एक्टिव करने की बेबुनियाद और सांप्रदायिक ख़बर भी 11 जनवरी 2022 को छापी है। 

कॉलेज में अवैध नियुक्तियों पर पर्देदारी के लिये बनाया गया निशाना

किसान पीजी कॉलेज बहराइच में अंशकालिक शिक्षकों, कर्माचारियों की अवैध तरीके से नियुक्तियां हुई हैं। इस बाबत स्थानीय अख़बारों में कई ख़बरें प्रकाशित हुई हैं। समाजशास्त्र विभाग, मध्यकालीन इतिहास विभाग, अर्थशास्त्र विभाग, रसायन शास्त्र विभाग, वनस्पति विज्ञान विभाग सहित लगभग सभी विभागों में यूजीसी के नियमों को धता बताते हुये अयोग्य लोगों को नियुक्तियां दी गईं। इन शिक्षकों में खुद प्रबंधन समिति के सचिव एसपी सिंह की पत्नी मालती सिंह का भी नाम है। इनके अलावा अजय त्रिपाठी, धर्मवीर सिंह समेत दर्जनों शिक्षक बिना नेट, टेट व पीएचडी के स्नातक व परास्नातक छात्रों का पढ़ा रहे हैं।

बताया जा रहा है कि जब मध्यकालीन इतिहास विभाग के प्रभारी आशुतोष शुक्ला ने अवैध तरीके से नियुक्त शिक्षकों के कक्षाओं का आवंटन करने से इन्कार किया तो प्राचार्य ने उन्हें विभाग प्रभारी के पद से हटा दिया। खुद ही क्लास का आवंटन कर दिया। इतना ही नहीं अर्थशास्त्र विभाग में सबसे वरिष्ठ शिक्षक होने के बावजूद आलोक प्रताप सिंह को प्रभारी नहीं बनाया गया।

एसपी सिंह के इशारे पर अंशकालिक शिक्षक संघ अध्यक्ष सत्य भूषण सिंह के नेतृत्व में इन शिक्षकों ने महाविद्यालय के 4 नियमित शिक्षकों के ख़िलाफ़ राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में संलिप्तता, नक्सलवाद को बढ़ावा देने जैसे आरोप लगाते हुये राज्यपाल को पत्र लिखा।

बंटवारे का कलंक गांधी के सिर मढ़ने वाले एसपी सिंह

एसपी सिंह दरअसल विचारधारा के स्तर पर दक्षिणपंथी खेमे के हैं। और वो बिल्कुल उसी खांचे में सोचते हैं जैसे एक सांप्रदायिक व्यक्ति सोचता है। यह बात एक पोर्टल को दिए उनके एक साक्षात्कार से स्पष्ट हुई। एक स्थानीय न्यूज पोर्टल जनरथ एक्सप्रेस से बात करते हुये वह देश के बंटवारे का सारा दोष गांधी पर मढ़ते हैं। और कहते हैं इसका कलंक गांधीजी के सिर पर हमेशा रहेगा।

किसान आंदोलन के खिलाफ बोलते हुए एसपी सिंह।

सोशल मीडिया से प्राप्त एक वीडियो में वो आरएसएस-भाजपा की भाषा में मंच से बयान देते हुये कह रहे हैं, “भारत के बढ़ते हुये कद को रोकने के लिये बहुत सारी शक्तियां अलग-अलग आंदोलनों के नाम पर चाहे विदेशों की फंडिंग से किया जा रहा किसान आंदोलन हो।”   

एसपी सिंह गांधी के खिलाफ बोलते हुए।

सोशल मीडिया समेत तमाम स्थानीय न्यूज चैनलों में मेजर शिव प्रताप सिंह के बारे में ढूँढने पर पता चलता है कि वो दक्षिणपंथी विचारधारा के हैं और आरएसएस व आरएसएस के तमाम संगठनों से उनका नजदीकी संबध है। स्थानीय लोगों का कहना है कि वो भाजपा से टिकट चाहते थे पर उन्हें मिला नहीं। वो एबीवीपी की स्थापना दिवस पर एक वीडियो बयान भी जारी करते हैं।

एआईएसएफ ने की निंदा

ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन उत्तर प्रदेश के प्रदेश अध्यक्ष संजय सिंह ने कहा कि इस तरह के बेबुनियाद आरोप लगातार संघी विचारधारा के लोग लगाते रहते हैं इसकी ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन की राष्ट्रीय काउंसिल ने कड़ी निंदा की है और ऐसे लोगों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की मांग की है। ये संगठन 1936 से देश में कई आंदोलनों में सक्रिय रूप से भाग लिया है और ऐतिहासिक किसान आंदोलन में भी सक्रिय रहा है।

(जनचौक के विशेष संवाददाता सुशील मानव की रिपोर्ट।)

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