Friday, October 22, 2021

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बाइडेन-मोदी चर्चा में ट्रस्टीशिप के मायने

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अमेरिका-दौरे में महात्मा गांधी का भी कई संदर्भों में उल्लेख आया। सबसे पहले अमेरिकी राष्ट्रपति जोसेफ रॉबिनेट बाइडेन ने भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के शीर्ष नेता महात्मा गांधी के कुछ राजनीतिक मूल्यों की चर्चा की। बीते शुक्रवार को राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री मोदी की द्विपक्षीय बैठक में बाइडेन ने लोकतांत्रिक मूल्यों और सामाजिक विविधता के प्रति दोनों देशों की वचनबद्धता और प्रतिबद्धता की चर्चा के क्रम में गांधी जी का खासतौर पर उल्लेख किया। उन्होंने गांधी जी के अहिंसा, परस्पर सम्मान और सहिष्णुता जैसे मूल्यों की प्रशंसा की। उन्होंने इसका खास संदर्भ भी जोड़ा ताकि प्रधानमंत्री मोदी को ये न लगे कि गांधी जी के उद्धरण से वह भारत की मौजूदा स्थिति पर कोई कड़ी टिप्पणी कर रहे हैं। इन मूल्यों की चर्चा के क्रम में उन्होंने कहा कि जल्दी ही गांधी-जयंती आने वाली है। इसी चर्चा में प्रधानमंत्री मोदी ने गांधी जी के विवादास्पद सिद्धांत ट्रस्टीशिप का खासतौर पर उल्लेख किया।

ऐसी मुलाकातों या बैठकों में दुनिया के तमाम देश और उनके नेता अक्सर अच्छी-अच्छी बातें करते रहते हैं। वाशिंगटन की उस बैठक में गांधी जी के अहिंसा, सम्मान और सहिष्णुता जैसे मूल्यों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता उस अमेरिका की तरफ से दोहराई जा रही थी, जो न सिर्फ दुनिया की बड़ी महाशक्ति है अपितु दुनिया के अनेक अविकसित, अर्द्धविकसित और विकासशील देशों में अशांति, उपद्रव और जबरन सत्ता-बदल जैसी परिघटनाओं का मुख्य कारण और कारक भी है। अमेरिका की कथनी और करनी का फर्क पूरी दुनिया के सामने है। लेकिन यहां हम अमेरिकी राष्ट्रपति की उस खास टिप्पणी के एक खास संदर्भ पर बात कर रहे हैं। ऐसे दौर में जब डेमोक्रेसी के ग्लोबल इंडेक्स में भारत का स्थान लगातार गिरता जा रहा है और उसे अब ‘दोषपूर्ण डेमोक्रेसी’ कहा जाने लगा है, बाइडेन का गांधी जी को उद्धृत करते हुए उस तरह का बयान देना खास मतलब रखता है।

अपनी बारी आने पर प्रधानमंत्री मोदी ने अहिंसा या सहिष्णुता जैसे गांधीवादी मूल्यों का उल्लेख करने की बजाय गांधी जी की चर्चा ट्रस्टीशिप जैसे उनके एक खास सिद्धांत की की। ट्रस्टीशिप गांधी जी का एक ऐसा सिद्धांत है, जिस पर उनके जीवनकाल और बाद में भी हमेशा विवाद होते रहे। प्रधानमंत्री मोदी ने ट्रस्टीशिप के गांधी वादी सिद्धांत की चर्चा करते हुए इसे दुनिया की सुरक्षा से जोड़ने की कोशिश की। प्रधानमंत्री के रूप में डॉ. मनमोहन सिंह इसका उल्लेख अक्सर पर्यावरण आदि के खास संदर्भ में किया करते थे। बाइडेन और मोदी में और भी बहुत सारी बातें हुईं।

इस बातचीत में अहिंसा और सहिष्णुता जैसे व्यापक मानवीय मूल्यों का जिक्र बाइडेन की तरफ से आया। डेमोक्रेसी और विविधता की भी चर्चा हुई। बाइडेन के अलावा उपराष्ट्रपति कमला हैरिस ने तो इसकी खासतौर पर चर्चा की कि किस तरह दुनिया के विभिन्न देशों में डेमोक्रेसी का सिमटना चिंता का विषय है। लेकिन अपने प्रधानमंत्री ने ऐसे मुद्दों को छुआ तक नहीं। अमेरिकी राष्ट्रपति ने जैसे ही गांधी जी के हवाले अहिंसा, परस्पर सम्मान और सहिष्णुता के मूल्यों की प्रासंगिकता की बात की, प्रधानमंत्री मोदी ने गांधी जी की ट्रस्टीशिप सैद्धांतिकी की चर्चा की। उन्होंने कहा कि गांधी जी की यह धारणा आज और आने वाले दिनों में हमारी समूची पृथ्वी के लिए बहुत प्रासंगिक है। मोदी ने ट्रस्टीशिप की गांधीवादी धारणा की अपनी व्याख्या को ज्यादा विस्तार नहीं दिया पर उन्होंने उसे विश्व और भारत-अमेरिका सम्बन्धों से भी जोड़ा। अपने खास अंदाज में उन्होंने फाइव-टीः ट्रेडिशन, टैलेंट, टेक्नालाजी और ट्रेड के साथ ट्रस्टीशिप का भी उल्लेख किया। इस तरह उनके वक्तव्य में ट्रस्टीशिप का जिक्र दो संदर्भ में आया-समूची पृथ्वी के संदर्भ में और भारत-अमेरिका सम्बन्धों के संदर्भ में।
ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि लोकतंत्र, परस्पर सम्मान, अहिंसा और सहिष्णुता जैसे मूल्यों की चर्चा आने पर प्रधानमंत्री ने अचानक ट्रस्टीशिप जैसी विवादास्पद धारणा को क्यों सामने लाया? प्रधानमंत्री मोदी ने गांधी जी के दर्शन और विचारधारा के अनेक महत्वपूर्ण पहलुओं के बीच ट्रस्टीशिप जैसी धारणा को इतना महत्व क्यों दिया? क्या वह लोकतंत्र, विविधता, अहिंसा और सहिष्णुता के मूल्यों से ध्यान हटाने के प्रति सचेष्ट थे या कोई और मकसद था ? क्या वैश्विक कारपोरेटवाद के नये दौर में उन्हें ट्रस्टीशिप की गांधीवादी धारणा में कोई खास बात दिखी? हालांकि मोदी ने ट्रस्टीशिप के अपने उल्लेख में मालिक-मजदूर या कंपनी-कर्मी सम्बन्धों का हवाला नहीं दिया।

पहले देखें कि महात्मा गांधी जी की नजर में ट्रस्टीशिप के क्या अर्थ हैं? ट्रस्टीशिप को व्याख्यायित करते हुए गांधी जी कहते हैं: ‘फर्ज कीजिये कि विरासत के या उद्योग-व्यवसाय के द्वारा मुझे प्रचुर सम्पत्ति मिल गई। तब मुझे यह जानना चाहिए कि वह सब सम्पत्ति मेरी नहीं है, बल्कि मेरा तो उस पर इतना ही अधिकार है कि जिस तरह दूसरे लाखों आदमी गुजर करते हैं, उसी तरह मैं भी इज्जत के साथ अपना गुजर भर करूं। मेरी शेष सम्पत्ति पर राष्ट्र का हक है और उसी के हितार्थ उसका उपयोग होना आवश्यक है। इस सिद्धांत का प्रतिपादन मैंने तब किया था, जब कि जमींदारों और राजाओं की सम्पत्ति के सम्बन्ध में समाजवादी सिद्धांत देश के सामने आया था। समाजवादी इस सुविधा प्राप्त वर्गों को खत्म कर देना चाहते हैं जबकि मैं यह चाहता हूं कि वे (जमींदार और राजा-महराजा) अपने लोभ और सम्पत्ति के बावजूद उन लोगों के समकक्ष बन जायें, जो मेहनत करके रोटी कमाते हैं।’(मेरे सपनों का भारतः महात्मा गांधी, पृष्ठ-60, राजपाल, दिल्ली)

गांधी जी को मालूम था कि उनकी ट्रस्टीशिप की यह थीसिस एक ऐसी कल्पना है, जो किसी यूटोपिया की तरह कुछ लोगों को सुंदर लग सकती है पर जिसे व्यवहार में लाना असंभव है। यह महज संयोग नहीं कि आज तक पूरी दुनिया में ट्रस्टीशिप का सिद्धांत कहीं भी व्यवहार में नहीं लाया जा सका। समाजवाद के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता। कई मुल्कों में उसे आजमाया गया। शुरुआती कामयाबी भी मिली। बाद के दिनों में कुछ देशों में वह प्रयोग नाकाम हो गया तो कई मुल्कों में आज भी वह मॉडल कुछ कमियों और विकृतियों के साथ बरकरार है। पर ट्रस्टीशिप कहां है? पूरी दुनिया में एक भी देश ऐसा नहीं है, जहां ट्रस्टीशिप जैसी गांधीवादी धारणा को अमलीजामा पहनाया गया हो या जहां वह आधी-अधूरी भी लागू हो!

अपने इस सिद्धांत की अव्यावहारिकता से गांधी जी भी वाकिफ थे। अपने उसी आलेख में वह लिखते हैं –‘आप कह सकते हैं कि ट्रस्टीशिप तो कानून-शास्त्र की एक कल्पना मात्र है। व्यवहार में उसका कहीं कोई अस्तित्व नहीं दिखाई पड़ता——बेशक, पूर्ण ट्रस्टीशिप तो युक्लिड की बिन्दु की व्याख्या की तरह एक कल्पना ही है और उतनी ही अप्राप्य भी है। लेकिन यदि उसके लिए कोशिश की जाय तो दुनिया में समानता की स्थापना की दिशा में हम दूसरे किसी उपाय से जितनी दूरी तक जा सकते हैं, उसके बजाय इस उपाय से ज्यादा दूर तक जा सकेंगे।’

गांधी जी के अपने वक्तव्य और व्याख्या से भी साफ होता है कि ट्रस्टीशिप की सैद्धांतिकी कहीं न कहीं समाजवादी सिद्धांतों से उनकी असहमति और उसके विकल्प के तौर पर उनके दिमाग में पैदा हुई। यह आकर्षक दिखने वाली एक असंभव कल्पना है। एक ऐसा यूटोपिया, जिसे अमलीजामा पहनाना मौजूदा विश्व में बिल्कुल नामुमकिन है। यही कारण है कि राष्ट्रपिता के जीवनकाल में ही ट्रस्टीशिप की उनकी सैद्धांतिकी का विरोध होना शुरू हो चुका था। डॉ बी आर अम्बेडकर भारतीय राष्ट्रराज्य को पश्चिम की आधुनिक धारणा के अनुरूप एक ऐसा लोकतंत्र बनाने के पक्षधर थे, जिसमें समानता, भाईचारा और स्वतंत्रता हो। उन्होंने डेमोक्रेसी की आधुनिक धारणा में बौद्ध दर्शन की वैचारिकता का भी समावेश किया। वह जाति-विहीन समाज चाहते थे। गांधी जी की ट्रस्टीशिप की सैद्धांतिकी का मजाक उड़ाते हुए डॉ अम्बेडकर ने कहाः ‘ श्री गांधी का यह ट्रस्टीशिप विषयक विचार बहुत हास्यास्पद है कि धनवान लोग अपनी सम्पत्ति समाज के निर्धन या गरीब लोगों के लिए ट्रस्ट की तरह रखेंगे।’डॉ अम्बेडकर ट्रस्टीशिप की धारणा पर और आक्रामक होते हुए आगे कहते हैं : ‘यह सिद्धांत अमीरों या धनवानों के लिए विचारधारात्मक जुगाड़ करता है कि उनके पास जो भी जमा है, वह उनके पास बरकरार रहे। जिन्हें कुछ नहीं मिला या नहीं मिल रहा है और जिन्हें पाने का हक है, उन्हें हासिल करने की कोशिश से रोकता है।’ एक अन्य विमर्श में डॉ अम्बेडकर कहते हैं-‘ गांधीवाद में वर्गभेद संयोगवश नहीं आ घुसा है। वह उसका आधिकारिक सिद्धांत है।—-ट्रस्टीशिप का सिद्धांत हास्यास्पद है, जिसे गांधीवाद सभी विकारों को दूर करने का रामबाण नुस्खा होने की बात करता है और जिसके द्वारा धनी वर्गों के लोग अपनी सम्पत्ति को न्यास के रूप में रखकर उसे गरीबों का न्यास और स्वयं को उसका न्यासी बनाकर मालिक ही बने रहेंगे। ’(बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर संपूर्ण वांग्मय, खंड-16, पृष्ठ 294)।

शहीद भगत सिंह की पूरी वैचारिकी महात्मा गांधी की ट्रस्टीशिप की धारणा के उलट है। वह किसी ट्रस्टीशिप जैसी वायवीय धारणा में नहीं, समानता और स्वतंत्रता के उसूलों के पैरोकार हैं। अपने एक मशहूर लेखः “अंतर्राष्ट्रीय क्रांतिकारी चितनः अराजकतावाद-2” में लिखते हैं : ‘सम्पत्ति बनाने का विचार मनुष्यों को लालची बना देता है। वह फिर पत्थरदिल होता चला जाता है। दयालुता और मानवता उसके मन से मिट जाती है।‘ स्वाधीनता आंदोलन के एक अन्य योद्धा और मार्क्सवादी विचारक एम एन रॉय ने भी गांधी जी के इस विचार का पुरजोर विरोध किया। इसे काल्पनिक और खतरनाक कहा। उन्होंने कहाः ‘गांधी द्वारा व्यक्त विचार बेहद चकित करने वाले हैं। वह चाहते हैं कि काम करने वाले लोग अपने मालिकों पर भरोसा करें और उन्हें अपना बड़ा भाई समझें। गांधी जी के इन विचारों से जमींदार भी बहुत खुश हैं कि उन्हें किसानों का संरक्षक माना जा रहा है।‘ ई एम एस नंबूदिरीपाद ने अपनी मशहूर किताब ‘ द महात्मा एंड हिज इज्म’ में लिखा हैः ‘दुर्भाग्यवश महात्मा गांधी की नजर में वे मजदूर और किसान अपने शोषकों और उत्पीड़कों के भाई और हिस्सेदार हैं!’ वामपंथियों की छोड़िये गांधी के परम शिष्य और समर्थक जवाहर लाल नेहरू ने भी ट्रस्टीशिप के उनके सिद्धांत से असहमति जताई थी।(गांधी एंड नेहरूः सिद्धार्थ दास, ओडिशा रिव्यू, दिसम्बर, 2006)

पर हमारे मौजूदा प्रधानमंत्री मोदी सितम्बर, सन् 2021 के अपने अमेरिकी दौरे में लोकतंत्र, अहिंसा और सहिष्णुता की चर्चा छिड़ने पर ट्रस्टीशिप को आगे करते हैं। राष्ट्रपति बाइडेन ने द्विपक्षीय बैठक में लोकतंत्र और सहिष्णुता की चर्चा की तो मोदी जी ने अपनी तरफ से गांधी जी के ट्रस्टीशिप के सिद्धांत का हवाला दिया। उन्होंने इसे पूरी पृथ्वी के लिए प्रासंगिक बताया। क्या वाकई ट्रस्टीशिप इतना प्रासंगिक है? क्या यह दुनिया के देशों के आपसी सम्बन्धों, पर्यावरण संरक्षण और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों के संदर्भ में भी कारगर हो सकता है? तमाम वैश्विक मंचों की गतिविधियों और नतीजों पर नजर डालें तो यह बात आइने की तरह साफ है कि ऐसी बड़ी वैश्विक चुनौतियों का सामना करने के लिए दुनिया के देशों की साझा पहल से ज्यादा कारगर कदम और कुछ भी नहीं हो सकता। ‘वैश्विक-मालिकाना बोध’ से ग्रस्त दुनिया के कुछ ताकतवर देशों के लिए ट्रस्टीशिप जैसी धारणा का कोई मतलब होता तो आज दुनिया न तो पर्यावरण संकट और जलवायु-परिवर्तन की चुनौतियों से जूझ रही होती और न ही अनेक अविकसित, अर्द्धविकसित या विकासशील देशों में बड़ी वैश्विक ताकतों की दादागिरी चल रही होती। हथियारों की होड़, युद्ध और तरह-तरह के तख्ता-पलट भी नहीं होते।

ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है-लोकतंत्र, अहिंसा और सहिष्णुता पर मंडराते खतरों के उल्लेख के क्रम में यह ट्रस्टीशिप की धारणा कहां से आ गयी? क्या यह वैश्विक पूंजीवाद की तेजी से फैलती कारपोरेट-संस्कृति को नया ‘वैचारिक उपहार’ देने की कोशिश है? क्या मालिक-मजदूर रिश्तों पर बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध का यह पिटा-पिटाया फार्मूला आज कहीं से भी कारगर हो सकता है? अगर नहीं तो क्या यह महज जुमलों के उपहार की आकर्षक पैकेजिंग है? पैकेजिंग चाहे जितनी आकर्षक हो, अगर अंदर ठोस सामग्री नहीं है तो किसी भी क्षेत्र में उसकी कोई उपयोगिता नहीं होती। ट्रस्टीशिप के फार्मूले की उपयोगिता गांधी जी के समय भी नहीं थी और आज तो हरगिज नहीं है।

(उर्मिलेश वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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