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मोदी के ‘कत्ल और कानून’ के राज में कहां खड़े हैं गांधीजन

आज महात्मा गांधी की 72वीं पुण्यतिथि है। 30 जनवरी 1948 को दिल्ली के बिड़ला हाउस में प्रार्थना सभा के लिए जाते हुए महात्मा गांधी की हत्या कर दी गई थी। हिंदू कट्टरपंथी नाथूराम गोडसे और उसके साथियों ने गांधी पर गोली चलाई थी। लेकिन गांधी की हत्या में सिर्फ चंद चेहरे ही शामिल नहीं थे। इसके पीछे एक विचार और संगठन काम कर रहा था। जो गांधी के विचार-दर्शन और राजनीति से असहमत थे। हिंदू कट्टरपंथियों का मानना था कि गांधी मुसलमानों के पक्षधर हैं और मुस्लिम कट्टरपंथियों को लगता था कि गांधी हिंदुओं के हितैषी हैं। हिंदू कट्टरपंथी चाहते थे कि पाकिस्तान बनने के बाद भारत को हिंदू देश घोषित कर देना चाहिए। इस राह में गांधी रोड़ा थे। गांधी हिंदू और मुस्लिम दोनों तरह की सांप्रदायिकता के विरोधी थे।
देश की जो स्थिति आजादी के समय थी कमोबेश आज भी हमारा समाज उसी परिस्थिति से गुजर रहा है। 2014 के बाद से देश में लोकतंत्र कराह रहा है। समाज नफरत और घृणा की राजनिति के शिकंजे में है। अल्पसंख्यकों, आदिवासियों, महिलाओं और छात्रों पर हमले हो रहे हैं। सरकारी और संवैधानिक संस्थाओं को पंगु किया जा रहा है। लोकतंत्र भीड़तंत्र में तब्दील होता दिख रहा है। सरकार मौन है और उसके लठैत असहमति के स्वर को देशविरोधी बता रहे हैं।
सरकारी नीतियों का विरोध करने वालों पर पुलिस के हिंसा का डंडा चल रहा है। मीडिया सरकार का गुणगान कर रही है। महंगाई, बेरोजगारी,मॉब लिंचिंग को लेकर जगह-जगह विरोध की चिंगारी धधक रही है। राजनैतिक नेतृत्व अप्रासंगिक हो गया है और जनता नेतृत्वविहीन है। इस पूरे परिदृश्य में गांधी के अनुयायी खामोश और गांधी संस्थाएं सरकार के सामने नतमस्तक हैं। गांधीजनों की इस चुप्पी पर सवाल उठता है कि क्या वे सत्ता के सामने समर्पण कर चुके हैं या कोई और समस्या है?
गांधी शांति प्रतिष्ठान, दिल्ली के अध्यक्ष कुमार प्रशांत कहते हैं, “गांधीजनों की भूमिका इतनी खराब नहीं है। इस सरकार का सबसे खुला प्रतिरोध गांधीजनों ने किया है। कश्मीर के सवाल पर ‘सर्व सेवा संघ’ और गांधीजनों ने खुलकर बयान दिया और कहा कि यह गलत है। आप कश्मीर में जो कर रहे हैं उसे ठीक करना बहुत मुश्किल है। गांधीजनों ने सरकार के निर्णय पर पूर्ण अस्वीकृति दिखाया। दूसरे मुद्दों पर भी हम अपनी असहमति और विरोध दर्ज करा रहे हैं। आज हम इतने प्रभावी नहीं हैं कि किसी आंदोलन को दिशा दे पाएं। लेकिन ऐसी सभी जगह हम शामिल हैं। हम कम हैं लेकिन जिस जगह हैं वहां से प्रतिरोध कर रहे हैं।”
ऐसा लगता है कि गांधी संस्थाएं भी संघ-भाजपा के आगोश में हैं। अभी हाल ही में जब वरिष्ठ पत्रकार और गांधीवादी नाचिकेता देसाई साबरमती आश्रम में सीएए के विरोध में धरने पर बैठे तो आश्रम के लोग ही उनके पीछे पड़ गए। नाचिकेता देसाई गांधी कथा के माध्यम से देश-समाज को जगाने वाले नारायण भाई देसाई के पुत्र और गांधी जी के सचिव रहे महादेव देसाई के पौत्र हैं।
कुमार प्रशांत कहते हैं कि “साबरमती आश्रम सरकार के हाथ में है। उसमें बैठे लोगों पर सरकार का दबाव है। गांधी संस्थाओं के सरकारीकरण होने से उनका तेवर कम हो गया। गांधीजनों से यह भूल हुई कि उन्होंने गांधी संस्थाओं को सरकार के हाथों में जाने दिया। जिन लोगों औऱ संस्थाओं को अपने साथ रखना था हम नहीं कर पाए। इसलिए हमारी ताकत कम हुई है।”
15 अगस्त 1947 को जब देश आजादी के जश्न में डूबा था तब देश की आजादी के नायक महात्मा गांधी बंगाल की गलियों में सांप्रदायिकता के खिलाफ संघर्ष कर रहे थे। इसके लिए उन्होंने कांग्रेस नेतृत्व को भी सवालों के घेरे में खड़ा किया था। गांधी आजीवन जनता के सावलों पर सत्ता से संघर्ष करते रहे। हर अन्याय के विरोध में वे तन कर खड़े हो जाते थे। सत्य, अहिंसा, सत्याग्रह और अनशन उनके हथियार थे। गांधी के जीवन में उनके अनुयायी भी सत्याग्रह और अनशन का प्रयोग कर जनविरोधी नीतियों का विरोध करते रहे हैं। देश में सैकड़ों गांधीवादी संस्थाएं और संगठन हैं। आज के राजनीतिक माहौल में उनके हस्पक्षेप की अपेक्षा है। लेकिन वे कहीं नजर नहीं आते हैं?
आजादी बचाओ आंदोलन के नेता और गांधीवादी चिंतक रामधीरज कहते हैं, “गांधी, विनोबा या जयप्रकाश नारायण (जेपी) की जनता में पकड़ और प्रभाव था। उनके साथ उनका त्याग-तपस्या और संघर्ष से जुड़ा जीवन था। आज के अधिकांश गांधीवादी सरकारी संस्थाओं से जुड़े हैं और उनका जनता से कोई जीवंत संपर्क नहीं है। हमारे जैसे जो लोग किसी संस्था से नहीं जुड़े हैं और अपने स्तर पर कोशिश कर रहे हैं, उनकी एक क्षेत्र विशेष में पहचान है। पूरे देश भर में किसी की अपील नहीं है। इसलिए आज की परिस्थितियों में कोई ऐसा नहीं दिखता है जो गांधीवादियों का नेतृत्व करने के साथ-साथ देश को दिशा दे सके।”
गांधी की हत्या के बाद सांप्रदायिक शाक्तियों ने सोचा कि गांधी को हमेशा के लिए खत्म कर दिया गया। लेकिन मरा गांधी जिंदा गांधी से ज्यादा ताकतवर साबित हो रहा है। भारत ही नहीं विश्व भर में गांधी नए विकल्प और निरंकुश सत्ता के विरोध के प्रतीक बन गए हैं। तो क्या आज गांधी विचार को अपना कर ऐसी शक्तियों को परास्त किया जा सकता है?
कुमार प्रशांत कहते हैं, “अंधेरा जैसे-जैसे घना होता है प्रकाश के स्रोत अपने आप ही प्रासंगिक हो जाते हैं। गांधी आज के वक्त में प्रकाश,आशा या विकल्प के प्रतीक हैं। और भारत ही नहीं सारी दुनिया के लिए हैं। दुनिया जो विचार एवं वाद की अलग-अलग शैलियों से संचालित हो रही है वह सब ऊपरी फर्क है। और यह फर्क पिछले सालों में घिस-घिस कर बराबर हो गया है। सोवियत संघ के बिखरने के बाद हमारे सामने जो विकल्प था वह भी खत्म हो गया है। जहां तक डायनमिक्स का सवाल है, पूंजीवाद और साम्यवाद दोनों में कोई फर्क नहीं है। इसलिए दोनों एक ही जगह पहुंच गए हैं। अब कोई नई चीज नहीं मिल रही है। एक तरह की बांझ व्यवस्था बन गई है। ऐसे में जब कोई विकल्प नहीं है तो सारी दुनिया गांधी की तरफ देख रही है।”
वह कहते हैं, “गांधी के साथ ऐतिहासिक सुविधा यह है कि आज तक गांधी विचार का परीक्षण करने की कोशिश नहीं की गई। जिससे पता चले कि जिसे हम विकल्प समझ रहे हैं वो विकल्प है कि नहीं। इसे किसी को जांचना पड़ेगा ना! तो गांधी विचार एक अनटेस्टेड फार्मूला है। अभी हमें यह पता नहीं है कि उसमें से कितना हमारे काम का है और कितना फालतू है। बहुत से लोग कहते हैं कि गांधी विचार बहुत अव्यवहारिक है, आदर्श अवस्था है। हमारे जैसे लोग कहते हैं कि गांधी विचार बहुत व्यवहारिक है। लेकिन उसे अपनाने की हिम्मत नहीं हो पा रही है। ये सब जांचने की जरूरत है।”
गांधी की हत्या के समय हिंदू कट्टरपंथियों की संख्या कम थी। आजादी के बाद देश-समाज में दिंनों-दिन उनकी संख्या और प्रभाव में बढ़ोत्तरी होती गयी। आज वे सत्ता में हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मानना है कि देश की समस्याओं के लिए मुस्लिम,गांधी और कांग्रेस जिम्मेदार हैं। इसलिए गांधी, मुस्लिम और कांग्रेस का सफाया जरूरी है। गांधी का सफाया तो वे 72 साल पहले ही कर चुके थे। 2014 में केंद्रीय सत्ता में आने के बाद कांग्रेस भी अप्रासंगिक स्थिति में है। और सत्तारूढ़ दल के नेता दिन-रात मुसलमानों को पाकिस्तान भेजने की बात करते हैं। इसी कड़ी में केंद्र सरकार सीएए, एनपीआर और एनसीआर जैसे कानून लेकर आई है। इस कानून का देशव्यापी विरोध हो रहा है। दिल्ली के शाहीन बाग से लेकर उत्तर प्रदेश के लखनऊ, इलाहाबाद, गुजरात के अहमदाबाद में महिलाएं धरना-प्रदर्शन कर रहीं हैं। लेकिन यहां भी गांधी जनों की उपस्थिति नगण्य है।
सीएए के विरोध में हो रहे आंदोलनों में गांधी जनों की भूमिका के सवाल पर गुजरात के अहमदाबाद में रहने वाले गांधीवादी विचारक प्रकाश भाई शाह कहते हैं, “देश में सीएए के विरोध में हो रहे प्रदर्शनों में गांधी विचार और गांधी जन दोनों काम कर रहे हैं। सत्याग्रही के रूप में भले ही गांधी जन वहां न हों लेकिन वे देश की समस्याओं के लिए जगह-जगह संघर्ष कर रहे हैं। गांधी जनों ने सत्ता के सामने समर्पण नहीं किए हैं।”
आज के समय में गांधी जनों की क्या भूमिका होनी चाहिए? इस सवाल पर कुमार प्रशांत कहते हैं, “गांधी जी के जाने के तुरंत बाद से जांचने की कोशिश करें तो सवाल उठता है कि क्या गांधी के जाने के बाद उनके मानने वालों की कोई भूमिका बचती है। किसी बड़े आदमी के जाने के बाद उसके विचारों को मानने और उसके काम को आगे बढ़ाने के अलावा कोई बहुत भूमिका बचती नहीं। ऐसे में गांधीजनों के सामने प्रश्न था कि गांधी के रचनात्मक कार्य और उनका पुण्य स्मरण करना ही हमारा काम है।” लेकिन गांधी जी की मौत के तुरंत बाद एक आदमी आया और यह बताया कि गांधी के क्या काम हैं।
“आचार्य विनोबा भावे गांधी के क्या काम हैं उसे खोलकर रख दिया। जिसकी हमें कभी समझ नहीं थी। चरखा आदि जो प्रतीक हैं वह गांधी के काम नहीं हैं। गांधी के मूर्ति पर माल्यार्पण भी गांधी का काम नहीं हो सकता। गांधी का काम समाज परिवर्तन है। और गांधी विचारों पर चलना हो तो सामाज परिवर्तन में लगना पड़ेगा। और विनोबा ने ग्राम स्वराज का एक दर्शन सामने रख दिया। तब हमें गांधी के काम का पता चला। इस कसौटी पर हम गांधीजनों को कसने की कोशिश करें तो पता चलेगा कि गांधी के जाने के बाद गांधी जनों ने क्या किया।”
कुमरा प्रशांत कहते हैं,“गांधीजनों ने भूदान आंदोलन शुरू किया और वह विकसित होते-होते ग्राम स्वराज तक पहुंचा। सरकार सीलिंग कानून से जो काम नहीं कर पाई उसे भूदान ने कर दिखाया। गांधी जनों ने यह साबित किया कि “कत्ल और कानून” के अलावा एक तीसरा रास्ता है जो हर मनुष्य के भीतर है आप उसे जगाकर, मन परिवर्तन करके परिणाम पा सकते हैं। यह बहुत बड़ा काम गांधीजनों ने किया है।”
विनोबा के बाद के गांधीजनों में जेपी का नाम आता है। देश में एक आंदोलन खड़ा हुआ जिसे समग्र क्रांति कहते हैं। उस समय छात्र-युवाओं के सामने प्रतिरोध के अलावा कोई दर्शन नहीं था। उसको जेपी ने एक नया दर्शन दिया। उस दौर में गांधी को प्रासंगिक किया। यह सिद्ध किया कि वोट से तानाशाही को हराया जा सकता है। यह प्रयोग दुनिया में पहली बार हुआ। इसमें भी गांधीजनों की भूमिका बहुत महत्व की थी।
कुमार प्रशांत कहते हैं अब जेपी और विनोबा का दौर गुजर गया है और अब हम छोटे लोग बचे हैं। जिनके पास बहुत कीर्ति का भण्डार नहीं है। हम गांधी के विचार सीख भी रहे हैं और सिखा भी रहे हैं। गांधी का रास्ता बहुत जटिल है उसको समझना उसको स्वीकार करना बहुत अभ्यास मांगता है। बंदूक की ट्रेनिंग बहुत आसान है। विचारों की ट्रेनिंग कठिन है। हम इस सफर को आगे ले जाने की कोशिश में हैं।

This post was last modified on January 30, 2020 9:39 pm

प्रदीप सिंह

लेखक डेढ़ दशक से पत्रकारिता में सक्रिय हैं और जनचौक के राजनीतिक संपादक हैं।

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